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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 170, कुल 475 में से

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पृष्ठ 170

विनय-पत्रिका १५९ सभाके पाँच सदस्यों द्वारा सम्पादित रामचरितमानसमें लिखा है कि “इससे हमारा यह भी अनुमान होता है कि इनका विवाह नहीं हुआ था। माता- पिताको छोड़ देना तथा बचपनसे गुरुके साथ घूमना रामायण आदिसे भी प्रमाणित होता है और उसकी दृढ़ता इस पदसे भी होती है।” २—'रोटी लूगा'—के स्थानपर श्रीरामेश्वर भट्टने तो 'रोटी लूँगा' अर्थ किया ही है, वियोगी हरिजीने भी टीकाके प्रथम संस्करणमें 'सिर्फ रोटी लूँगा' (और कुछ नहीं चाहिये), अर्थ लिखा है। उक्त टीकाकारोंने यह नहीं सोचा कि 'लेना' क्रियाका 'लूगा' रूप हो सकता है या नहीं। इसीसे ऐसी भद्दी भूल हुई है। ( ७७ ) जानकी-जीवन, जग जीवन, जगत हित, जगदीस, रघुनाथ, राजीवलोचन राम। सरद-बिधु-वदन, सुखसील, श्रीसदन, सहज सुंदर तनु, सोभा अगनित काम ॥१॥ जग-सुपिता, सुमातु, सुगुरु, सुहित, सुमीत, सबको दाहिनो, दीनबन्धु, काहू को न बाम। आरतिहरन, सरनद, अतुलित दानि, प्रनतपाल, कृपालु, पतित-पावन नाम ॥२॥ सकल विस्व बंदित, सकल सुर-सेवित, आगम-निगम कहैं रावरेई गुनग्राम। इहै जानिकै तुलसी तिहारो जन भयो, न्यारो कै गनिबो जहाँ गने गरीब गुलाम ॥३॥ शब्दार्थ—बिधु = चन्द्रमा। श्रीसदन = लक्ष्मीका निवासस्थान। दाहिनो = अनु- कूल। आगम = वेद। निगम = शास्त्र। कै = या, अथवा। सरनद = शरण देनेवाले। भावार्थ—हे रामजी ! आप जानकीजीके, और संसारके जीवन, जगत्के हितकारी, जगदीश, रघुकुलके स्वामी तथा कमलके समान नेत्रवाले हैं। आपका मुख शारदीय पूर्णिमाके समान है। आप सुख प्रदान करनेवाले हैं और लक्ष्मीजी-

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