विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका १६५ नयन मलिन परनारि निरखि, मन मलिन विषय सँग लागे । हृदय मलिन वासना-मान-मद, जीव सहज सुख त्यागे ॥२॥ परनिन्दा सुनि श्रवन मलिन भे, वचन दोष पर गाये । सब प्रकार मलभार लाग निज, नाथ-चरन बिसराये ॥३॥ तुलसिदास व्रत-दान, ग्यान-तप, सुद्धि हेतु श्रुति गावै । राम-चरन-अनुराग-नीर बिनु मल अति नास न पावै ॥४॥ शब्दार्थ—मल = पाप । नयन = नेत्र । श्रवन = कान । नीर = जल । भावार्थ—मोह-जनित अनेक प्रकारके लगे हुए पाप करोड़ों यत्न करनेपर भी नहीं छूटते। जन्म-जन्मान्तरसे अभ्यास-रत चित्त (पापमें) अधिकाधिक लिपटता जाता है ॥१॥ परायी स्त्रियोंको देखनेसे नेत्र मलिन हो गये हैं, और मन विषयोंके साथ लगा रहनेसे मलिन हो गया है। मान-मदादिक वासनाओंसे हृदय मलिन हो गया है, इसलिए जीवन अपने स्वाभाविक आनन्द-(आत्मानन्द) को त्याग बैठा है ॥२॥ दूसरोंकी निन्दा सुननेसे कान अपवित्र हो गये हैं तथा दूसरोंके दोष कहते-कहते वाणी भी मलिन हो गयी है। अपने स्वामी (श्रीरामजी) के चरणोंको भूल जानेसे ही यह मलका भार सब तरहसे मेरे पीछे लग गया है ॥३॥ ऐ तुलसीदास, वेदका कथन है कि व्रत, दान, ज्ञान और तप आदि शुद्धिके कारण अवश्य हैं, पर श्रीरामजीके चरणोंके प्रेम-जलके बिना पापोंका समूल नाश नहीं हुआ करता ॥४॥ राग जैतश्री [ ८३ ] कछु ह्वै न आइ गयो जनम जाय ।१ अति दुरलभ तनु पाइ कपट तजि, भजे न राम मन-बचन-काय ॥१॥ १. ऐसा ही भाव महात्मा सूरदासने भी व्यक्त किया है— दो मैं एकौ तौ न भई । ना हरि भजे न गृह सुख पाये, वृथा विहाइ गई ॥ ठानी हुती और कछु मनमें, औरै आनि ठई । अविगत गति कछु समुझि परति नहिं, जो कछु करत दई ॥