याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ
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७०८ | याज्ञवल्क्यस्मृतिः
| श्लोकाः | पृष्ठम् | श्लोकाः | पृष्ठम् |
|---|---|---|---|
| त्रिणाचिकेतदौहित्र | ९९ | दत्त्वा तु ब्राह्मणायैव | २०३ |
| त्रिः प्राश्यापो द्विरुन्मृज्य | ९ | दत्त्वाऽन्नं पृथिवीपात्रं | १०७ |
| त्रिरात्रमा व्रतादेशात् | ४१७ | दत्त्वा भूमिं निबन्धं वा | १४३ |
| त्रिरात्रं दशरात्रं वा | ४०७ | दत्त्वाऽर्घ्यं संस्रवांस्तेषां | १०५ |
| त्रिरात्रान्ते घृतं प्राश्य | ५८५ | दत्त्वोदकं गन्धमाल्यं | १०४ |
| त्रिरात्रोपोषितो जप्त्वा | ६१६ | दद्याच्चतुष्पथे शूर्पे | १३१ |
| त्रिरात्रोपोषितो हुत्वा | ६१७ | दद्यात्त्रिरात्रं चोपोष्य | ५५१ |
| त्रिवित्तपूर्णपृथिवी | १७ | दद्याद्ग्रहक्रमाद्देवं | १३७ |
| त्रिंशद्दिनानि शूद्रस्य | ४१६ | दद्यादपहरेंच्चांशं | २९८ |
| त्रीन्कृच्छ्रानाचरेद्ब्रात्यः | ५८७ | दद्यादृते कुटुम्बार्थान् | २०५ |
| त्रैकाल्यसंध्याकरणात् | ६२१ | दद्यान्माता पिता वा यं | २८६ |
| त्रैवार्षिकाधिकान्नो यः | ५५ | दद्युर्वा स्वकृतां वृद्धिं | २०० |
| त्रैविद्यनृपदेवानां | ३४४ | दद्युस्तद्रिक्थिनः प्रेते | २०४ |
| त्रैविद्यं वृत्तिमद्ब्रूयात् | ३३१ | दध्यन्नं पायसं चैव | १३१ |
| त्र्यङ्गहीनस्तु कर्तव्यो | ३८६ | दध्योदनं हविश्चूर्णं | १३७ |
| त्र्यवराः साक्षिणो ज्ञेयाः | २२४ | दन्तोदूखलिकः काल | ४३९ |
| त्र्यहं प्रेतेष्वनध्यायः | ६४ | दन्दशूकः पतङ्गो वा | ४८९ |
| त्वं तुले सत्यधामासि | २४८ | दम्भिहेतुकपाखण्डि | ५८ |
| त्वमग्ने सर्वभूतानाम् | २५३ | दशकं पारदेश्ये तु | ३६० |
| त्वं विप्र ब्रह्मणः पुत्रः | २५९ | दशपूरुषविख्यातान् | २२ |
| द | दर्शनप्रतिभूर्यत्र | २१२ | |
| दण्डः क्षुद्रपशूनां तु | ३५० | दर्शने प्रत्यये दाने | २११ |
| दण्डं च तत्समं राज्ञे | १८९ | दशैकपञ्चसप्ताह | ३२५ |
| दण्डं च स्वपणं चैव | १८० | दाक्षायणी ब्रह्मसूत्री | ६० |
| दण्डं दद्यात्सवर्गासु | ३७९ | दातव्यं प्रत्यहं पात्रे | ९२ |
| दण्डनीत्यां च कुशलम् | १४१ | दातारो नोऽभिवर्धन्तां | १११ |
| दण्डनीया तदर्धं तु | ३१३ | दाताऽस्याः स्वर्गमाप्नोति पू | ९३ |
| दण्डप्रणयनं कार्यं | ३४१ | दाताऽस्याः स्वर्गमाप्नोति व | ९३ |
| दण्डं स दाप्यो द्विशतं | ३५७ | दानं दमो दया क्षान्तिः | ५४ |
| दण्डाजिनोपवीतानि | १२ | दानं दातुं चरेत्कृच्छ्रं | ५७३ |
| दत्तात्मा तु स्वयंदत्तो | २८६ | दाने विवाहे यज्ञे च | ४२३ |
| दत्तामपि हरेत्पूर्वात् | २६ | दान्तस्त्रिषवणस्नायी | ४३९ |
| दत्तर्णं पाटयेल्लेख्यं | २४१ | दापयित्वा हृतं द्रव्यं | ३६९ |
| दत्त्वा कन्यां हरन्दण्ड्यो | ३०४ | दाप्यः सर्वं नृपेणार्थं | १८१ |
| दत्त्वा चौरस्य वा हन्तुः | ३७४ | दाप्यस्तु दशमं भागं | ३३५ |
| दत्त्वा तु दक्षिणां शक्त्या | १११ | दाप्यस्त्वष्टगुणं यश्च | ३६५ |
| दाप्यो दण्डं च यो यस्मिन् | ३४९ |