भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

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पृष्ठ 193

पूर्वार्ध पंद्रहवां अध्याय परमेष्ठी त्वा सादयतु दिवस्पृष्ठे ज्योतिष्मतीम्. विश्वस्मै प्राणायापानाय व्यानाय विश्वं ज्योतिर्यच्छ. सूर्यस्तेधिपतिस्तया देवतयाऽङ्गिरस्वद् ध्रुवा सीद.. (५८) हे अग्नि! आप परम इष्ट और ज्योतिष्मान हैं. आप स्वर्गलोक के पृष्ठ में विराजें. सारे विश्व के प्राण, अपान व व्यान के लिए विश्व ज्योति प्रदान करें. सूर्य आप के अधिपति हैं. आप अंगिरा ऋषि की तरह ध्रुव हो कर विराजिए. ( ५८ ) लोकं पृण छिद्रं पृणाथो सीद ध्रुवा त्वम्. इन्द्राग्नी त्वा बृहस्पति रस्मिन्योनावसीषदन्.. (५९) इंद्र देव, अग्नि और बृहस्पति देव ने आप को यहां अधिष्ठित किया है. आप लोक के छिद्र पूरिए. आप ध्रुव होइए और यहां विराजने की कृपा कीजिए. ( ५९ ) ता अस्य सूददोहसः सोम १४ श्रीणन्ति पृश्नयः. जन्मन्देवानां विशस्त्रिष्वारोचने दिवः.. (६०) वे इन सूर्य की किरणें हैं. वे सोमरस को पकाती हैं. सोमरस को शोभा और श्रेष्ठ रंग प्रदान करती हैं. देवताओं के जन्म में स्वर्गलोक को प्रकाशित करती हैं. ( ६० ) इन्द्रं विश्वा अवीवृधन्समुद्रव्यचसं गिरः. रथीतम १४ रथीनां वाजाना १४ सत्पतिं पतिम्.. (६१) सभी इंद्र देव की बढ़ोत्तरी करते हैं. सभी अपनी वाणी से इंद्र देव के गुण गाते हैं. उन की स्तुति करते हैं. श्रेष्ठ रथी, अन्नस्वामी सत्पति आदि सभी इंद्र देव की स्तुति करते हैं. ( ६१ ) प्रोथदश्वो न यवसेविष्यन्यदा महः संवरणाद्व्यस्थात्. आदस्य वातो अनुवाति शोचिरध स्म ते व्रजनं कृष्णमस्ति.. (६२) अग्नि प्रज्वलित हो कर भूखे घोड़े द्वारा घास के लिए की जाने वाली आवाज की तरह आवाज करते हैं. वायु का अनुकरण करते हैं, जिस से और अधिक प्रज्वलित हो जाते हैं. उन का काला धुआं सर्वत्र व्याप्त हो जाता है. ( ६२ ) आयोष्ट्वा सदने सादयाम्यवतश्छायाया १४ समुद्रस्य हृदये. रश्मीवतीं भास्वतीमा या द्यां भास्या पृथिवीमोर्वन्तरिक्षम्.. (६३) समुद्र के हृदय में व यज्ञ सदन में आप को प्रतिष्ठित किया जाता है. आप किरणमयी व प्रकाशमयी हैं. आप पृथ्वीलोक और अंतरिक्षलोक को अपने प्रकाश से परिपूर्ण कर देते हैं. ( ६३ ) यजुर्वेद - १९३