यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 242, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय वेद्या वेदिः समाप्यते बर्हिषा बर्हिरिन्द्रियम्. यूपेन यूप ऽ आप्यते प्रणीतो अग्निरग्निना.. (१७) इस यज्ञ में वेदी से वेदी को प्राप्त किया जाता है. इस यज्ञ में कुशा से कुशा को प्राप्त किया जाता है. इस यज्ञ में इंद्रियों से इंद्रिय ज्ञान प्राप्त किया जाता है. इस यज्ञ में स्तंभ से स्तंभ को प्राप्त किया जाता है. इस यज्ञ में अग्नि से अग्नि को प्राप्त किया जाता है. ( १७ ) हविर्धानं यदश्विनाग्नीध्रं यत्सरस्वती. इन्द्रायेन्द्र ९४ सदस्कृतं पत्नीशालं गार्हपत्यः.. (१८) अश्विनीकुमार से हवि का धान प्राप्त होता है. सरस्वती देवी से आग्नीध्र प्राप्त होता है. यज्ञ सदन में, पत्नीशाला में तथा गार्हपत्य अग्नि में इंद्र देव के ऐश्वर्य के अनुकूल हवि देवगणों द्वारा प्रस्तुत की जाती है. ( १८ ) प्रैषैभिः प्रैषानाप्नोत्याप्रीभिराप्रीर्यज्ञस्य. प्रयाजैर्भिरनुयाजान् वषट्कारेभिराहुतीः.. (१९) प्रैष ( कष्ट या प्रेरणा ) आदि से प्रैष प्राप्त होता है. प्रिय से प्रियदायी की प्राप्ति होती है. यज्ञ से यज्ञ की प्राप्ति होती है. यजन से यज्ञ का अनुकरण करने वाले की प्राप्ति होती है. वषट्कारों से आहुतियों की प्राप्ति होती है. ( १९ ) पशुभिः पशूनाप्नोति पुरोडाशैर्हवी ९४ ष्या. छन्दोभिः सामिधेनीर्याज्याभिर्वषट्कारान्.. (२०) पशुओं से पशु प्राप्त होते हैं. पुरोडाश से हवि प्राप्त होती है. छंदों से सामधेनी ( विशेष प्रकार के मंत्र ) की प्राप्ति होती है. यज्ञ से संबंधित क्रियाओं से वषट्कारों को प्राप्त किया जाता है. ( २० ) धानाः करम्भः सक्तवः परीवापः पयो दधि. सोमस्य रूप ९४ हविष ऽ आमिक्षा वाजिनं मधु.. (२१) धान, धान की लपसी, सत्तू आदि, जलमय दूध व दही आदि सोम का रूप है. हवि, ईक्षु ( गन्ना ) आदि, अन्न हवि व शहद आदि सोम का रूप हैं. ( २१ ) धानाना ९४ रूपं कुवलं परीवापस्य गोधूमाः. सक्तूना ९४ रूपं बदरमुपवाकाः करम्भस्य.. (२२) धान का रूप ही यज्ञ में अन्न के रूप में प्रयुक्त किया जाता है. चारों ओर उस से ही गोधूम फैलता है. बेर सत्तू के रूप में तैयार किया जाता है. जौ को लपसी के रूप में तैयार किया जाता है. इन्हें हवि के रूप में प्रयोग में लाया जाता है. ( २२ ) २४२ - यजुर्वेद