यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 326, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरार्ध छब्बीसवां अध्याय हे अग्नि! आप ऋतु के अनुसार इच्छानुसार सोमरस पीने की कृपा कीजिए. आप धनदाता हैं. आप भी यज्ञ में सोमरस को पीने की इच्छा कीजिए. सोमरस पीने के लिए प्रतिष्ठित होइए. ( २२ ) तवाय ꣪ सोमस्त्वमेह्यर्वाङ् शश्वत्तम ꣪ सुमना ऽ अस्य पाहि. अस्मिन् यज्ञे बर्हिष्या निषद्या दधिष्वेमं जठर ऽ इन्दुमिन्द्र.. (२३) हे इंद्र! आप हमारे यज्ञ में पधारिए और कुश के आसन पर विराजिए. यह आप के पीने योग्य सोमरस है. आप आनंदपूर्वक उसे पीजिए. आप अच्छे मन से उस की रक्षा कीजिए. ( २३ ) अमेव नः सुहवा ऽ आ हि गन्तन नि बर्हिषि सदतना रणिष्टन. अथा मदस्व जुजुषाणो अन्धसस्त्वष्टर्देवैर्जनिभिः सुमद्गणः.. (२४) हे देव पत्नियो! आप इस यज्ञ मंडप को अपने घर की तरह समझिए. हम आप का आह्वान करते हैं. आप पधार कर कुश के आसन पर विराजिए. आप आनंदित होइए. आप हवि को ग्रहण करने की कृपा कीजिए. ( २४ ) स्वादिष्ठया मदिष्ठया पवस्व सोम धारया. इन्द्राय पातवे सुतः.. (२५) हे सोम! आप स्वादिष्ट और मददायी हैं. आप अपनी पवित्र धाराओं से इंद्र देव के पीने के लिए बहें. ( २५ ) रक्षोहा विश्वचर्षणिर्भि योनिमयोहते. द्रोणे सधस्थमासदत्.. (२६) हे सोम! आप विलक्षण, सर्वद्रष्टा व रक्षक हैं. आप अपने मूल निवास स्थान द्रोण कलश में स्थापित होने की कृपा कीजिए. ( २६ ) ३२६ - यजुर्वेद