भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 410, कुल 421 में से

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पृष्ठ 410

उत्तरार्ध अड़तीसवां अध्याय विश्वा ऽ आशा दक्षिणसद्विश्वान् देवानयाडिह. स्वाहाकृतस्य घर्मस्य मधोः पिबतमश्विना.. (१०) यज्ञ में होता दक्षिण दिशा में विराजमान हैं. उन होताओं ने सभी दिशाओं में निवास करने वाले देवताओं को आमंत्रित किया है. हे अश्विनीकुमारो! यज्ञ के विस्तार के लिए जो रसमयी आहुतियां समर्पित की जा रही हैं, आप उन्हें पीने की कृपा कीजिए. ( १० ) दिवि धा ऽ इमं यज्ञमिमं यज्ञं दिवि धाः. स्वाहाग्नये यज्ञियाय शं यजुर्भ्यः.. (११) हे यजमानो! आप इस यज्ञ व आहुति को स्वर्गलोक तक पहुंचाइए. यजमान अग्नि के लिए आहुति अर्पित करते हैं. यजमान अपनी सुखशांति के लिए मंत्र पढ़ते हुए आहुतियां समर्पित कर रहे हैं. ( ११ ) अश्विना घर्मं पात १४ हार्द्दानमहर्दिवाभिरूतिभिः. तन्त्रायिणे नमो द्यावापृथिवीभ्याम्.. (१२) हे अश्विनीकुमारो! आप अपनी शक्ति से इस यज्ञ की रक्षा करने की कृपा कीजिए. आप अपनी रक्षण शक्तियों के साथ इस हृदय को प्रिय लगने वाले यज्ञ में पधारने की कृपा कीजिए. सूर्य, स्वर्गलोक व पृथ्वीलोक के सभी देवों को नमन है. ( १२ ) अपातामश्विना घर्ममनु द्यावापृथिवी अम १४ साताम्. इहैव रातयः सन्तु.. (१३) हे अश्विनीकुमारो! आप आपाततः ( पूर्ण और हर रूप से ) हमारे यज्ञ की रक्षा करने की कृपा कीजिए. स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक के देवता भी आप के साथ यज्ञ का विस्तार करने की कृपा करें. आप अपने निवास स्थल से ही हमें धन प्रदान ( भांतिभांति के ) करने की कृपा कीजिए. ( १३ ) इषे पिन्वस्वोजें पिन्वस्व ब्रह्मणे पिन्वस्व क्षत्राय पिन्वस्व द्यावापृथिवीभ्यां पिन्वस्व. धर्मासि सुधर्मामेन्यस्मे नृम्णानि धारय ब्रह्म धारय क्षत्रं धारय विशं धारय.. (१४) हे परब्रह्म! हम आप का अनुसरण करते हैं, ताकि आप हमारी और यजमानों की रक्षा करें. आप ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों की रक्षा कीजिए. आप प्रजा को धर्म से संचालित कीजिए. उस धर्म मार्ग का हम सब भी अनुकरण कर सकें. उस धर्म मार्ग पर चल कर हम कर्तव्य पालन करते हुए अपना लक्ष्य प्राप्त कर सकें. ( १४ ) स्वाहा पूष्णे शरसे स्वाहा ग्रावभ्यः स्वाहा प्रतिरवेभ्यः. स्वाहा पितृभ्य ऽ ऊर्ध्वबर्हिभ्यों घर्मपावभ्यः स्वाहा द्यावापृथिवीभ्या १४ स्वाहा विश्वेभ्यो देवेभ्यः.. (१५) प्रेम करने वाले पूषा, शब्द करने वाले प्राणियों, सोम रस पीने वाले देवताओं, ४१० – यजुर्वेद

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