यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
by डा. रेखा व्यास
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
उनतालीसवां अध्याय
उनतालीसवां अध्याय स्वाहा प्राणेभ्यः साधिपतिकेभ्यः. पृथिव्यै स्वाहाग्नये स्वाहान्तरिक्षाय स्वाहा वायवे स्वाहा दिवे स्वाहा सूर्याय स्वाहा.. (१) प्राणों के लिए स्वाहा. प्राणों के अधिपति सहित (प्राणों के लिए) स्वाहा. पृथ्वी के लिए स्वाहा. अग्नि के लिए स्वाहा. अंतरिक्ष देव के लिए स्वाहा. वायु के लिए स्वाहा. स्वर्गलोक के लिए स्वाहा. सूर्य के लिए स्वाहा. (१) दिग्भ्यः स्वाहा चन्द्राय स्वाहा नक्षत्रेभ्यः स्वाहाद्भ्यः स्वाहा वरुणाय स्वाहा. नाभ्यै स्वाहा पूताय स्वाहा.. (२) सभी दिशाओं के देवों के लिए स्वाहा. चंद्र देव के लिए स्वाहा. नक्षत्र देवों के लिए स्वाहा. जल देव के लिए स्वाहा. वरुण देव के लिए स्वाहा. यज्ञ देव की नाभि (केंद्र) के लिए स्वाहा. पवित्र करने वाले सभी देवताओं के लिए स्वाहा. (२) वाचे स्वाहा प्राणाय स्वाहा प्राणाय स्वाहा. चक्षुषे स्वाहा चक्षुषे स्वाहा श्रोत्राय स्वाहा श्रोत्राय स्वाहा.. (३) वाणी देव के लिए स्वाहा. (बाईं) प्राण वायु के लिए स्वाहा. (दाईं) प्राण वायु के लिए स्वाहा. (बाएं) चक्षु (आंख) के लिए स्वाहा. (दाएं) चक्षु के लिए स्वाहा. (बाएं) कान के लिए स्वाहा. (दाएं) कान के लिए स्वाहा. (३) मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीय. पशूना ँ४ रूपमन्नस्य रसो यशः श्रीः श्रयतां मयि स्वाहा.. (४) मन की इच्छा पूरी हो. वाणी सत्य को धारण करे. पशुओं, रूप व अन्न के रस की बढ़ोतरी हो. यश, शोभा व श्रेय बढ़े. हम इन सब की बढ़ोतरी के लिए आहुति अर्पित करते हैं. (४) प्रजापतिः सम्भ्रियमाणः सम्राट् सम्भृतो वैश्वदेवः स ँ४ सन्नो घर्मः प्रवृक्त स्तेज ऽ उद्यत ऽ आश्विनः पयस्यानीयमाने पौष्णो विष्यन्दमाने मारुतः क्लथन् मैत्रः शरसि सन्ताय्यमाने वायव्यो ह्रियमाण ऽ आग्नेयो हूयमानो वाग्घुत:... (५) ४१४ - यजुर्वेद
उत्तरार्ध उनतालीसवां अध्याय
उत्तरार्ध उनतालीसवां अध्याय हे यज्ञ देवता! यज्ञ से परिपुष्ट होने वाले प्रजापति देव के लिए स्वाहा. संभ्रांत राजा के लिए स्वाहा. सभी देवों ( विश्व देव ) के लिए स्वाहा. सन्मार्ग पर चलने वालों के लिए स्वाहा. धर्मपरायणों के लिए स्वाहा. तेजस्वियों के लिए स्वाहा. जल से अभिषिक्त किए जाते हुए अश्विनीकुमारों के लिए स्वाहा. हितकारी पूषा देव के लिए स्वाहा. शत्रुनाशी मरुद्गणों के लिए स्वाहा. खेतीबाड़ी की समृद्धि करने वाले मित्र देव के लिए स्वाहा. चलायमान वायु के लिए स्वाहा. अग्नि के लिए स्वाहा. वाग्देवता के लिए स्वाहा. ( ५ ) सविता प्रथमेऽहन्नग्निर्द्वितीये वायुस्तृतीय ऽ आदित्यश्चतुर्थे चन्द्रमाः पञ्चम ऽ ऋतुः षष्ठे मरुतः सप्तमे बृहस्पतिरष्टमे. मित्रो नवमे वरुणो दशम ऽ इन्द्र ऽ एकादशे विश्वेदेवा द्वादशे.. ( ६ ) पहले दिन सविता देव के लिए स्वाहा. दूसरे दिन अग्नि के लिए स्वाहा. तीसरे दिन वायु के लिए स्वाहा. चौथे दिन आदित्य देव के लिए स्वाहा. पांचवें दिन चंद्र देव के लिए स्वाहा. छठे दिन ऋत देव ( सत्य ) के लिए स्वाहा. सातवें दिन मरुद्गणों के लिए स्वाहा. आठवें दिन बृहस्पति देव के लिए स्वाहा. नौवें दिन मित्र देव के लिए स्वाहा. दसवें दिन वरुण देव के लिए स्वाहा. ग्यारहवें दिन इंद्र देव के लिए स्वाहा. बारहवें दिन विश्वों के लिए स्वाहा. ( ६ ) उग्रश्च भीमश्च ध्वान्तश्च धुनिश्च. सासह्वांश्चाभियुग्वा च विक्षिपः स्वाहा.. ( ७ ) वायु उग्र, भीम, घनघोर शब्द करने वाले हैं, कंपकंपा देने वाले सभी को हरा देने वाले व शत्रुओं पर आक्रमण करने वाले हैं. शत्रुओं को छिन्नभिन्न कर सकने वाले हैं. उन वायु के लिए हम आहुति समर्पित करते हैं. ( ७ ) अग्नि १७ हृदयनाशनि १७ हृदयाग्रेण पशुपतिं कृत्स्नहृदयेन भवं यक्ना. शर्वं मतस्नाभ्यामीशानं मन्युना महादेवमन्तः पार्श्व्येनोग्रं देवं वनिष्ठुना वसिष्ठहनुः शिङ्गीनि कोश्याभ्याम्.. ( ८ ) हम यजमान हृदय से अग्नि को प्रसन्न करते हैं. हृदय के आगे के भाग से प्रकाश देव को प्रसन्न करते हैं. पूरे हृदय से पशुपति देव को प्रसन्न करते हैं. हम यकृत से आकाश देव को प्रसन्न करना चाहते हैं. गुरदों से जल देव को प्रसन्न करना चाहते हैं. मन से ईशान देव को प्रसन्न करना चाहते हैं. हम अंतःकरण से महादेव, अंतड़ियों से उग्र देव व हनु से वसिष्ठ को प्रसन्न करना चाहते हैं. हृदय के कोषों से सिद्धि पाना चाहते हैं. ( ८ ) उग्रँल्लोहितेन मित्र १७ सौब्रत्येन रुद्रं दौर्ब्रत्येनेन्द्रं प्रक्रीडेन मरुतो बलेन साध्यान् प्रमुदा. भवस्य कण्ठ १७ रुद्रस्यान्तः पार्श्व्यं महादेवस्य यकृच्छर्वस्य वनिष्ठुः पशुपतेः पुरीतत्.. ( ९ ) यजुर्वेद - ४१५
उत्तरार्ध उनतालीसवां अध्याय लहू से उग्र देव को संतुष्ट करना चाहते हैं. श्रेष्ठ व्रतों से मित्र देव को प्रसन्न करना चाहते हैं. दुराचार दूर कर के उस संकल्प से रुद्र देव को प्रसन्न करना चाहते हैं. हम सदाचार से इंद्र देव को रिझाना चाहते हैं. बल से मरुद्गणों को प्रसन्न करना चाहते हैं. श्रेष्ठ कर्मों से साध्य देवों को प्रसन्न करना चाहते हैं. कंठ से भव देव को खुश रखना चाहते हैं. पार्श्व ( पीछे ) से रुद्र देव, उत्तम आचरण से महा देव, यकृत से शर्व देव व हम नाड़ी से पशुपति को प्रसन्न करना चाहते हैं. ( ९ ) लोमभ्यः स्वाहा लोमभ्यः स्वाहा त्वचे स्वाहा त्वचे स्वाहा लोहिताय स्वाहा लोहिताय स्वाहा मेदोभ्यः स्वाहा मेदोभ्यः स्वाहा. मा ꣳ सेभ्यः स्वाहा मा ꣳ सेभ्यः स्वाहा स्नावभ्यः स्वाहा स्नावभ्यः स्वाहास्थभ्यः स्वाहास्थभ्यः स्वाहा मज्जभ्यः स्वाहा मज्जभ्यः स्वाहा रेतसे स्वाहा. पायवे स्वाहा.. (१०) रोम के लिए स्वाहा. त्वचा के लिए स्वाहा. लहू के लिए स्वाहा. चरबी के लिए स्वाहा. मांस के लिए स्वाहा. नाड़ियों के लिए स्वाहा. हड्डियों के लिए स्वाहा. मज्जा के लिए स्वाहा. वीर्य के लिए स्वाहा. गुदा के लिए स्वाहा. ( १० ) आयासाय स्वाहा प्रायासाय स्वाहा संयासाय स्वाहा वियासाय स्वाहोद्यासाय स्वाहा. शुचे स्वाहा शोचते स्वाहा शोचमानाय स्वाहा शोकाय स्वाहा.. (११) आयास देव के लिए स्वाहा. प्रयास देव के लिए स्वाहा. संन्यास देव के लिए स्वाहा. वियास देव के लिए स्वाहा. उद्यास देव के लिए स्वाहा. शुच देव के लिए स्वाहा. शोच देव के लिए स्वाहा. शोचमान और शोक देव के लिए स्वाहा. ( ११ ) तपसे स्वाहा तप्यते स्वाहा तप्यमानाय स्वाहा तप्ताय स्वाहा घर्माय स्वाहा. निष्कृत्यै स्वाहा प्रायश्चित्यै स्वाहा भेषजाय स्वाहा.. (१२) तप के लिए स्वाहा. तप्यमान के लिए स्वाहा. तृप्त के लिए स्वाहा. धर्म के लिए स्वाहा. निष्कृति और प्रायश्चित्त के लिए स्वाहा. भेषज के लिए स्वाहा. ( १२ ) यमाय स्वाहान्तकाय स्वाहा मृत्यवे स्वाहा. ब्रह्मणे स्वाहा ब्रह्महत्यायै स्वाहा विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा द्यावापृथिवीभ्या ꣳ स्वाहा.. (१३) यम देव के लिए स्वाहा. अंतक के लिए स्वाहा. मृत्यु के लिए स्वाहा. ब्राह्मण के लिए स्वाहा. ब्रह्महत्या की शांति के लिए स्वाहा. विश्वों के लिए स्वाहा. स्वर्गलोक के लिए स्वाहा. पृथ्वीलोक के लिए स्वाहा. ( १३ ) ४१६ - यजुर्वेद
चालीसवां अध्याय
चालीसवां अध्याय ईशा वास्यमिद १७ सर्वं यत्किं च जगत्यां जगत्. तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम्.. (१) इस जड़चेतन जगत् में जो कुछ भी है, वह ईश्वर की कृपा से है. उस ईश्वर के द्वारा त्यागे गए का भोग कीजिए. बहुत ज्यादा लालच मत करो. यह धनादि सब किस का है ? ( अर्थात् ईश्वर के अलावा किसी का नहीं ). ( १ ) कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत १४ समाः. एवं त्वयि नान्यथेतोस्ति न कर्म लिप्यते नरे.. (२) हे ईश्वर! हम कर्म करते हुए सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करें. इस के अलावा कल्याण का कोई अन्य मार्ग नहीं है. कर्म मनुष्य को लिप्त नहीं करते. ( २ ) असुर्या नाम ते लोका ऽ अन्धेन तमसावृताः. ताँस्ते प्रेत्यापि गच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः.. (३) जो गहन अंधकार से घिरे रहते हैं, वे लोग असुर्य कहलाते हैं. जो आत्मा का हनन करने वाले हैं, वे लोग प्रेत रूप में वैसे ही लोकों को प्राप्त होते हैं. ( ३ ) अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा ऽ आप्नुवन् पूर्वमर्षत्. तद्धावतोन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति.. (४) अजन्मा ईश्वर एक है. वह मन से भी ज्यादा गतिवान और फुरतीला है. देवगण भी इसे प्राप्त नहीं कर पाते हैं. स्थिर रह कर भी वह दौड़ता हुआ गतिशीलों को पछाड़ देता है. वह जल में रहता है. वायु को धारण करता है. ( ४ ) तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके. तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः.. (५) वह ( परम तत्त्व ) गतिशील है और स्थिर भी है. वह दूर भी है और निकट भी है वह जड़ और चेतन दोनों के भीतर भी है और बाहर भी है. ( ५ ) यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्नेवानुपश्यति. सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न वि चिकित्सति.. (६) यजुर्वेद - ४१७
उत्तरार्ध चालीसवां अध्याय
उत्तरार्ध चालीसवां अध्याय जो सभी प्राणियों ( जड़चेतन ) में अपने को ( आत्मतत्त्व को ) देखता है तथा उस का अनुभव करता है, उसे कभी भी कोई भ्रम नहीं होता. ( ६ ) यस्मिन्त्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः. तत्र को मोहः कः शोक ऽ एकत्वमनुपश्यतः.. (७) जिस ( स्थिति ) में मनुष्य यह जान लेता है कि सभी भूतों में एक ही आत्मतत्त्व है, तब क्या मोह ? क्या शोक ? उसे सर्वत्र एक जैसी स्थिति दिखाई देती है. ( ७ ) स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविर १७ शुद्घमपापविद्धम्. कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः.. (८) वह परमपिता सर्वव्यापक, चमकीला, ( दीप्तिमान ), काया रहित, नाड़ियों से रहित है. वह घावों से रहित, पवित्र, पाप रहित, विद्वान्, मननशील, सर्वव्यापक व स्वयंभू ( स्वयं उत्पन्न होने वाला ) है. उस ने सृष्टि के आरंभ से ही सब के लिए यथायोग्य साधन सुविधाओं की व्यवस्था की है. ( ८ ) अन्धं तमः प्र विशन्ति ये संभूतिमुपासते. ततो भूय ऽ इव ते तमो य ऽ उ सम्भूत्या १७ रताः.. (९) जो व्यक्ति विनाश की उपासना करते हैं, वे घोर अंधकार में प्रवेश करते हैं. जो संभूति ( सृजन ) के उपासक हैं, वे भी वैसे ही अंधकार में प्रवेश करते हैं. ( ९ ) अन्य देवाहुः सम्भवादन्यदाहुरसम्भवात्. इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे.. (१०) अन्य देवों ने संभव से असंभव के बारे में विशेष रूप से कहा है. हम ने उन धीर पुरुषों से जाना है कि संभव से असंभव का प्रभाव उस से अलग है. ( १० ) सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभय १७ सह. विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्यामृतमश्नुते.. (११) सृजन और विनाश इन दोनों को साथसाथ ही समझिए. विनाश से मृत्यु को तैरकर और सृजन से अमृत की प्राप्ति की जाती है. ( ११ ) अन्धं तमः प्र विशन्ति येविद्यामुपासते. ततो भूय ऽ इव ते तमो य ऽ उ विद्याया १७ रताः.. (१२) जो अज्ञान की उपासना करते हैं, वे गहरे अंधकार में प्रवेश करते हैं. जो ज्ञान की उपासना करते हैं, वे भी फिर वैसे ही गहरे अंधकार में प्रवेश करते हैं. ( १२ ) अन्य देवाहुर्विद्याया ऽ अन्यदाहुरविद्यायाः. इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे.. (१३) ४१८ - यजुर्वेद
उत्तरार्ध चालीसवां अध्याय
उत्तरार्ध चालीसवां अध्याय हम ने धीर पुरुषों से विशेष रूप से जाना है कि विद्या का प्रभाव कुछ और होता है. अविद्या का प्रभाव कुछ और होता है. ( १३ ) विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभय ᳪ सह. अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते.. (१४) विद्या और अविद्या दोनों को ही साथसाथ समझिए. अविद्या से मृत्यु को पार किया जाता है. विद्या से अमृत तत्त्व को पाया जाता है. ( १४ ) वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्त ᳪ शरीरम्. ओ३म् क्रतो स्मर. क्लिबे स्मर. कृत ᳪ स्मर.. (१५) यह शरीर वायु, अमृत आदि से बना हुआ है. शरीर नाशवान है. हे यजमान! आप ओम् तथा अपनी क्षमता और किए गए कर्मों का स्मरण करो. ( १५ ) अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्. युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम ऽ उक्तिं विधेम.. (१६) हे अग्नि! आप हमें श्रेष्ठ मार्ग पर ले जाइए. आप हमें ऐसे ही मार्ग से धन दिलाइए. हे विश्व! आप विद्वान् हैं. हम बारबार आप को नमन करते हैं. हम बारबार आप से अनुरोध करते हैं. आप हमें पापों से बचाने की कृपा करें. ( १६ ) हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्. योसावादित्ये पुरुषः सोसावहम्. ॐ खं बह्म.. (१७) सत्य का मुंह स्वर्णमय पात्र से ढका हुआ है. वह जो आदित्य पुरुष है, वह मैं हूं. आकाश में ओम् रूप में ब्रह्म ही व्याप्त है. ( १७ ) ( यजुर्वेद संपूर्ण ) यजुर्वेद - ४१९
विश्व बुक्स द्वारा प्रकाशित अन्य वेद भारतीय साहित्य एवं संस्कृति में वेदों की मान्यता चिरकाल से चली आ रही है. ऋग्वेद जहां विश्व की सब से प्राचीन पुस्तक है, वहीं यजुर्वेद, सामवेद व अथर्ववेद को इस का पूरक माना जाता है. ऋग्वेद आर्यों एवं भारतीयों की ही नहीं, विश्व की सब से प्राचीन पुस्तक है. इस का अनुवाद सायण भाष्य पर आधारित है. सामवेद को वेदत्रयी ( ऋक्, यजु और सामवेद ) में गिना जाता है. गीता में उपदेशक कृष्ण ने ‘वेदानां सामवेदोऽस्मि’ कह कर सामवेद की विशिष्टता की ओर संकेत किया है. अथर्ववेद में लौकिक जीवन से संबंधित औषधियों, जादू, टोनोटोटकों आदि का विस्तृत वर्णन किया गया है. अतः सभी वर्गों के पाठकों के लिए मंत्रों सहित चारों वेदों का सायण भाष्य पर आधारित सरल, सरस एवं सुबोध हिंदी अनुवाद पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है. www.vishvbook.com 632/27
सामवेद ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ वेद ॥ अथर्ववेद ॥ द ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजु ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजुवे वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ य वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजु ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववे गवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ र्णवेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ ॥ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ य ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद २॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजु वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजु ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ द ॥ सामवेद ॥ अथर्ववे गवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजु ऋग्वेद ॥ सामवे वेद ॥ अथर्ववेद ॥ डा. रेखा व्यास एम.ए. (संस्कृत), पी-एच.डी.