भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 190

१४० योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः लकारात् पृथिवी जाता तस्माद् विश्वमयी च सा । हकाराद् व्योम संभूतं प्रथमं विमर्शशक्तेराकाशवाचको हकारो जातः, ^१हकारानन्तरं तद्वाच्यं व्योम प्रकाशात्मनः परशिवात् संभूतम् । पश्चाद् वायु- वाचकः ककारो जातः ककारानन्तरं ककारवाच्यः प्रभञ्जनः संजातः । तत्पश्चा- दग्निवाचको रेफः संजातः, तदनन्तरं रेफवाच्योऽग्निः ^२संजातः । ततो जलतत्त्ववाचकः सकारः संजातः, ^३तदनन्तरं तद्वाच्यजलतत्त्वस्य संभवः । तदनन्तरं पृथिवीवाचको लकारो जातः, ^४तदनन्तरं तद्वाच्या पृथिवी जातेत्यर्थः । ^५तस्मात् शिवशक्तिसामरस्यरूपपरावयवप्रकाशविमर्शाभ्यां ^६पञ्चमहाभूतानि तद्वाचकान्यक्षराणि च यस्माज्जातानि, तस्मात्तदुभयसामरस्यरूपा सा परा स्वावयवभूतवर्ण^७मयी विश्वमयीत्यर्थः । तदुक्तं कामकलाविलासे— 'स्फुरितारुणाद् बिन्दोर्नादब्रह्माङ्कुरो^८ रवो व्यक्तः । तस्माद् गगनसमीरणदहनोदकभूमिवर्णसंभूतिः ॥९॥ सकार से जलतत्त्व उत्पन्न होता है। लकार से पृथिवी पैदा होती है। इस तरह से वह परा देवी विश्वमय हो जाती है ॥२९-३०॥ हकार से व्योम पैदा हुआ, अर्थात् पहले विमर्श शक्ति से आकाशवाचक हकार वर्ण की और तब उस हकार के वाच्य व्योम की उत्पत्ति प्रकाशात्मक परम शिव से हुई । बाद में वायु का वाचक ककार और तदनन्तर ककार के वाच्य वायु की उत्पत्ति हुई । इसके बाद अग्नि का वाचक रेफ और उस रेफ का वाच्य अग्नि उत्पन्न हुआ । इसी क्रम से जलतत्त्व का वाचक सकार और तब सकार के वाच्य जलतत्त्व की और तब पृथिवी- वाचक लकार और लकार के वाच्य पृथिवीतत्त्व की उत्पत्ति हुई । इस तरह से शिव और शक्ति के सामरस्यमय स्वरूप परा भगवती के प्रकाश और विमर्श नामक अवयवों से पांच महाभूत और उनके वाचक अक्षरों की भी उत्पत्ति होती है, अतः शिवशक्तिसामरस्य- स्वरूपा परा भगवती के ये पाँच महाभूत और उनके वाचक वर्ण अवयव हैं । इस तरह से यह परा भगवती ^१शब्दात्मक और अर्थात्मक विश्व का स्वरूप धारण कर लेती है । कामकलाविलास में भी इस विषय का वर्णन किया गया है— १ तदनन्तरं-ने. ज. झ. उ. । २. संभूतः। पुनर्जलतत्त्व-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. सकाराज्जलतत्त्वं संभूतम्-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. लकारात् पृथिवी-ख. ने. झ. उ. । ५. यस्मात्-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. पञ्चभूतानि पञ्चभूताक्षराणि च जातानि-ख. ने. ज. झ. उ. । ७ मयविश्व-ख. ने. ज. । ८. स्फुटिता-क. ग. मु. । ९. ह्वयो-ख. ने. ज. झ. ।

  1. शास्त्रों में षडध्व के विवेचन के प्रसंग में इस विषय की चर्चा आई है। विज्ञान भैरव के २५वें श्लोक की व्याख्या में यह विषय देखा जा सकता है।