भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १४१ अथ विशदादपि बिन्दोर्गगननिलवह्निवारिभूमिजनिः । एतत्पञ्चक'विकृतिर्जगदिदमण्वाद्यजाण्डपर्यन्तम् ॥१०॥ माता मानं मेयं बिन्दुत्रयभिन्न२बीजरूपाणि । धामत्रयपीठत्रयशक्तित्रयभेदभावितान्यपि च ॥१३॥ तेषु क्रमेण लिङ्गत्रितयं तद्वच्च मातृकात्रितयम् । इत्थं त्रितयमयी सा तुरीयपीठादिभेदिनी विद्या ॥१४॥ इति ॥२९-३० नन्वेवंविधक्रमेण विद्यायां वर्णाः किमिति न स्थिताः ? उच्यते—सत्यमेवं- विधक्रमो न भवति, तथापि पूर्वोक्तसृष्टिस्थितिसंहारानाख्यावभासनार्थं विद्याया- मक्रमेण वर्णाः पठ्यन्ते । तेन भूतवर्णक्रमो वर्णवासनाक्रमं बाधितुं नोत्सहते, अरुण (रक्त) बिन्दु में स्फुरण (स्पन्दन) होने पर नादब्रह्म (शब्दब्रह्म) रूपी अंकुर से शब्द की पश्यन्ती आदि के क्रम से अभिव्यक्ति होती है। इसी शब्द से गगन, पवन, ज्वलन, सलिल और पृथिवी के वाचक वर्णों की उत्पत्ति होती है॥ अब शुक्ल बिन्दु में स्पन्दन होने पर गगन, अनिल, वायु, जल और भूमि इन पाँच भूतों की सृष्टि होती है। इन पाँच महाभूतों के परिणामस्वरूप अणु से लेकर ब्रह्माण्ड पर्यन्त समस्त जगत् की सृष्टि पूरी हो जाती है॥ माता (ज्ञाता) महेश्वर, मान (ज्ञान) विद्या, मेय (ज्ञेय) भगवती त्रिपुरसुन्दरी—ये तीनों स्वरूप रक्त, शुक्ल और मिश्र बिन्दुओं के रूप में विभक्त तुरीय स्वरूप को, समष्टि स्वरूप को जानने के साधन हैं। तीन धाम, तीन बीज, तीन शक्तियाँ इत्यादि रूपों में भी इनकी भावना की जाती है॥ इन्हीं में क्रम से तीन लिङ्गों और तीन मातृकाओं की भी भावना की जाती है। इस तरह से इन तीन- तीन संख्या वाले पदार्थों का स्वरूप धारण करने वाली यह विद्या वास्तव में तुरीय स्थान में रहती है और इस तरह तुरीय धाम, पीठ आदि में निवास करने वाली यह परा विद्या तीन संख्यावाले सारे प्रपंच को तिरोहित कर देती है ॥२९-३०॥ यहाँ प्रश्न उठता है कि यदि विद्या के वर्णों से ही पाँच महाभूतों की उत्पत्ति हुई है, तो विद्या में वर्णों का क्रम वही होना चाहिये ? प्रश्नकर्ता की बात सही है कि विद्या में वर्णों का वह क्रम नहीं है, जिस क्रम से पाँच भूतों की सृष्टि हुई है, तो भी सृष्टि, स्थिति, संहार और अनाख्या क्रम की ऊपर चर्चा आई है। इसी क्रम से विद्या में वर्णों की स्थिति है। वर्णों की भावना इसी क्रम से की जाती है, अतः वासना क्रम ही यहाँ प्रधान है। वर्णों की वासना के इस क्रम को भूतों की उत्पत्ति बताने वाला वर्णों का क्रम बाधित नहीं कर सकता, क्योंकि यहाँ वर्णों की वासना ही प्रधान है, भूत क्रम गौण। पुनः प्रश्न उठता है कि तब विद्या में पाँच ही अक्षर होने चाहिये, जिनसे १. विकृति-क०। २. रूपिणम्-क०। ३. सा तु-क०। ४. सृष्टीत्यादि-ख०।