भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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१६२ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः वासनावत्त्वाद् वर्णानाम् । ननु तर्हि भूत¹संख्याकान्यक्षराणि किमिति न भवन्ति, अन्यान्यपि बहूनि श्रूयन्त एवेत्यत आह— गुणाः पञ्चदश प्रोक्ता² भूतानां तन्मयी शिवा ॥३०॥ भूतानां पञ्चानां व्याप्यव्यापकभावेन पञ्चदश गुणाः स्युः । अतस्तन्मयी तदात्मिका तत्संख्यावर्णवतीयं विद्या, शिवा शोकमोहमयसंसाररूपाऽमङ्गलपरि- पन्थिपरमाद्वैतप्रथा³परमार्थरूपा, परममङ्गलात्मकत्वात् ॥३०॥ ननु विद्याक्षरसंख्यया⁴ यावन्तः परिगणिताः पदार्थाः⁵, किं तन्मयतावासना वक्तुं शक्यते ? ⁶इत्यत आह— यस्य यस्य पदार्थस्य या या शक्तिरुदीरिता । सा सा सर्वेश्वरी देवी स स सर्वो महेश्वरः ॥३१॥ लोके यस्य यस्य पदार्थस्य ⁷यत्किञ्चित्करणसामर्थ्यलक्षणा या या शक्ति- र्विद्यते, सा सा शक्तिः सर्वेश्वरी देवी सर्वस्य शिवादिक्षित्यन्त⁸स्येश्वरी निया- पाँच महाभूतों की उत्पत्ति होती है । यहाँ तो और भी बहुत से वर्ण सुनाई पड़ते हैं ? इस प्रश्न का अब उत्तर देते हैं— पाँच भूतों के पन्द्रह गुण होते हैं । अतः पंचभूतमयी यह कल्याणी विद्या भी पन्द्रह अक्षरों वाली है ॥३०॥ पाँच भूतों की व्याप्यता और व्यापकता के आधार पर इनमें गुणों की संख्या १५ हो जाती है। अतः पंचभूतात्मिका यह विद्या भी उतने ही संख्या के वर्णों वाली है। यह विद्या शिवा है, शोक और मोह से भरे इस अमंगलमय संसार का समूल नाश कर देने वाले परम अद्वय ज्ञान के वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करा देने वाली यह विद्या परम मंगलमय है ॥३०॥ अब प्रश्न उठता है विद्या के इन पन्द्रह अक्षरों से क्या सभी ३६ पदार्थों की विद्या- मयता की भावना की जा सकती है ? इसका उत्तर है— जिस जिस पदार्थ को जो जो शक्ति कही गई है, उनमें की सभी शक्तियाँ सर्वेश्वरी परा देवी और सभी पदार्थ महेश्वर शिव के स्वरूप हैं ॥३१॥ लोक में जिस जिस पदार्थ की जो जो कार्य करने की सामर्थ्य प्रसिद्ध है, वे सब शक्तियाँ (सामर्थ्य) सर्वेश्वरी देवी के, शिव से लेकर पृथिवी पर्यन्त समस्त पदार्थों का १. संख्ययैवाक्षराणि-ख. ने. झ. उ. । २. ख्याताः-ख., शाख्याताः-ग. च. छ. ज. झ. । ३. प्रथारूपपरममङ्गलार्थत्वात्-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. संख्याया-क. ग. झ. । ५. 'पदार्थाः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. इत्याह-ख. ने. ज. झ. उ. । ७. या या शक्तिः किञ्चित्-ख. ने. ज. झ. उ. । ८. स्येशान-क. ख. ने. ज. झ. उ. ।