भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १४३ मिका देवी परा, स स सर्वः पदार्थो महेश्वरो विश्वजगन्नियामकः परमशिवः । ^१लोके यद्यद्वस्तु यत्किञ्चित्करणसामर्थ्यशालि तत्सामर्थ्यरूपेण परैव परिणता, तत्तत्सामर्थ्यवद्वस्तुरूपेण परमशिवः परिणत इति वक्तुं शक्यते । किं वक्तव्यमेत- दुभयमयविद्यावर्णसमानसंख्यावत्पदार्थरूपेण तावेव परिणतावित्यर्थः । तदुक्त- मभियुक्तैः— त्वं चन्द्रिका शशिनि तिग्मरुचौ रुचिस्त्वं त्वं चेतनासि पुरुषे पवने बलं त्वम् । त्वं स्वादुताऽसि सलिले शिखिनि त्वमूष्मा निःसार^२मम्ब निखिलं त्वदृते यदि स्यात् ॥ इति ॥३१॥ (अ० स्त० २०) नियमन करने वाली परा देवी के और वे सब पदार्थ महेश्वर के, सारे जगत् का नियमन करने वाले परम शिव के स्वरूप हैं । लोक में जिस किसी वस्तु में जो कुछ विशेष कार्य करने की शक्ति दिखाई पड़ती है, वह सामर्थ्य परा शक्ति का ही परिणाम है और उस उस सामर्थ्य से सम्पन्न पदार्थ परम शिव का परिणाम है । अर्थात् प्रत्येक पदार्थ का अपना स्वरूप परम शिव का और उस पदार्थ की सामर्थ्य परा शक्ति का परिणाम है, उनसे अभिन्न है । इस प्रकार प्रत्येक पदार्थ शिवमय और उसकी सामर्थ्य शक्तिमय है । ऐसी स्थिति में यह कौन असंभव बात है कि शिवशक्तिमय इस विद्या के वर्णों के और समान संख्या वाले पदार्थों के रूप में परम शिव और परा शक्ति ही परिणत होते हैं । ^१अम्बास्तव में कहा गया है— तुम चन्द्रमा में चाँदनी के रूप में, सूर्य में प्रभा के रूप में, पुरुष में चेतना के रूप में, पवन में वेग के रूप में, जल में स्वाद के रूप में और अग्नि में उष्णता के रूप में निवास करती हो । ओ मा ! तुम्हारे बिना यह सारा जगत् सूना हो जायगा ॥३१॥ १. सर्वलोके-ख. ज. झ. उ. । २. मेतदखिलं-ख. ने., मेव-ज. झ. ।

  1. पञ्चस्तवी के विषय में हम अन्यत्र (आगम और तन्त्रशास्त्र, पृ० ८६-८७) लिख चुके हैं कि लघुस्तव के कर्ता धर्माचार्य ही इसके रचयिता हैं । इन पाँच स्तवों में से तीन स्तवों (लघुस्तव, चर्चास्तव और सकलजननीस्तव) के पंडित हरभट्ट शास्त्री कृत पाण्डित्यपूर्ण टीका के साथ कश्मीर के प्रसिद्ध विद्वान् पंडित श्री दीनानाथ यक्ष द्वारा संपादित संस्करण प्रकाश में आ चुके हैं । यह दुःख का विषय है कि बाकी के दो स्तव (घटस्तव और अम्बास्तव) अभी प्रकाशित नहीं हो सके । अम्बास्तव का अठारहवां श्लोक (लक्ष्मीवशीकरण) भोज के सरस्वतीकण्ठाभरण (निर्णयसागर प्रेस, द्वितीय संस्करण, पृ० ३०६-३०७) में उद्धृत है।