भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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१४४ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः ननु भूतगुणमयी शिवेत्युक्तम्, शिवाया तत्संख्या कुत ²इत्यत आह— व्याप्ता पञ्चदशार्णैः सा विद्या भूतगुणात्मिका । पञ्चभिश्च तथा षड्भिश्चतुर्भिरपि चाक्षरैः ॥३२॥ सा शिवा ³परैव विद्या, वाच्यवाचकयोरभेदात्⁴ । पञ्चभिरक्षरैर्वाग्भव- बीजस्यावयवैः, षड्भिरक्षरै कामराजबीजस्यावयवैः, चतुर्भिरक्षरैः शक्तिबीजस्या- वयवैः । न क्षरन्तीत्यक्षराणि, तेषां नित्यत्वात् । ⁵स्वांशैर्नाशरहितैः पञ्चदशार्णे- र्व्याप्ता, अत एव ⁶भूतगुणात्मिका ॥ ३२ ॥ बीजत्रयमक्षरशो विभज्य भूतगुणात्मकतावासनामुक्त्वेदानीमक्षराण्यरवयवशो विभज्य षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मकतावासनामाह— स्वरव्यञ्जनभेदेन सप्तत्रिंशत्प्रभेदिनी । सप्तत्रिंशत्प्रभेदेन षट्त्रिंशत्तत्त्वरूपिणी ॥ ३३ ॥ तत्त्वातीतस्वभावा च विद्यैषा भाव्यते सदा । इस पर प्रश्न उठता है कि विद्या में तो पन्द्रह अक्षर हैं, तब यहाँ ३६ संख्या कहाँ से आवेगी ? इसका उत्तर आगे देते हैं— वह भूतगुणात्मिका विद्या पन्द्रह वर्णों से व्याप्त है । यह पाँच, छः और चार अक्षरों के तीन बीजों में विभक्त है ॥३२॥ वाच्य और वाचक की अभिन्नता के कारण परा शक्ति और परा विद्या में कोई भेद नहीं है। पाँच अक्षर वाग्भव बीज के, छः अक्षर कामराज बीज के और चार अक्षर शक्ति बीज के अवयव हैं। अक्षर शब्द का अर्थ है जिसका क्षरण (नाश) न हो। अक्षर नित्य हैं, अतः इनका क्षरण नहीं होता। यह विद्या इन नाशरहित पन्द्रह वर्णों से व्याप्त है, इसलिये प्रधानतः यह भूतगुणात्मिका कहलाती है ॥३२॥ इस प्रकार यहाँ तीन बीजों के क्रम से अक्षरों का विभाग और उनकी पन्द्रह भूत- गुणों के रूप में भावना को बताने के बाद अब इन अक्षरों के भी अवयवों का विभाग कर कर उनकी ३६ तत्त्वों के रूप में वासना बताई जा रही है— स्वर और व्यंजन के भेद से यह विद्या ३७ अवयवों वाली हो जाती है। विद्या के ये सैंतीस अवयव परा देवी के छत्तीस तत्त्वों वाले विश्वमय स्वरूप का और एक तत्त्वातीत विश्वोत्तीर्ण स्वरूप का बोध कराते हैं। इस तरह से श्रीविद्या की सदा इन्हीं रूपों में भावना करनी चाहिये ॥३३-३४॥ १. शिवायाः-ख. ज. झ. उ. । २. इत्याह-ज. झ. उ. । ३. परैवाम्बिका या वाच्य- ख. ने. ज. झ. उ. । ४. रभेदिनी-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. एवंविधस्वांशैः-ख. ने.ज. झ. उ. । ६. भूतात्मिका-ख. ने. ज. झ उ. ।