योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १४५ स्वरव्यञ्जनभेदेन प्रथमबीजेऽकारचतुष्टयमीकारश्चेति पञ्च स्वराः, शिष्टानि षड् व्यञ्जनानि, एवमेकादश । द्वितीयबीजेऽकारपञ्चकमीकारश्चेति षट् स्वराः, शिष्टानि व्यञ्जनानि सप्त, एवं त्रयोदश । तृतीयबीजेऽकारत्रयमीकारश्चेति चत्वारः स्वराः, शिष्टानि व्यञ्जनानि पञ्च, एवं नव । इत्येवं विभागेनाक्षरावयवा- स्त्रयस्त्रिंशत् । बीजत्रयान्ते बिन्दवस्त्रय इति षट्त्रिंशत् । तत्समष्टिरेका । एवं सप्तत्रिंशत्प्रभेदिनो विद्या समष्टिरूपा । एवं सप्तत्रिंशत्प्रभेदेन षट्त्रिंशत्तत्त्व- रूपिणी तत्त्वातीतस्वभावा च विद्यैषा । व्यष्टिसमष्टिभेदेन षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मिका तदतीता (च) इयम् । षट्त्रिंशत्तत्त्वान्यवयवभूतानि, तेषां रूपवती, सप्तत्रिंशत्प्र- भेदेन तत्त्वातीतस्वभावा च । स्वस्य भावः स्वभावः, शिवस्य यादृशो भावस्तादृशोऽ- स्या¹ इति भावयितव्यमित्यर्थः । तत्त्वानां लक्षणानि मयैव सौभाग्यसुधोदये निरूपितानि । यथा— स्वर और व्यंजन के भेद से विद्या में ३७ वर्ण होते हैं । जैसे प्रथम बीज में चार अकार और ईकार मिलकर पाँच स्वर हुए, बाकी छः व्यंजन हैं । इस तरह से प्रथम बीज में ११ अक्षर हुए । द्वितीय बीज में पाँच अकार और ईकार मिल कर छः स्वर हुए, बाकी सात व्यंजन हैं । दोनों मिलकर द्वितीय बीज में १३ अक्षर हुए । तीसरे बीज में तीन अकार और ईकार मिलकर चार स्वर और बाकी पाँच व्यंजन हैं । इस तरह से यहाँ अक्षरों की संख्या ९ हुई । सब मिलाकर अक्षरों की संख्या ३३ हुई । तीन बीजों के अन्त में तीन बिन्दु हैं । इनको भी मिलाने से यह संख्या छत्तीस हुई । इन सबकी समष्टि भी एक है । इस तरह से यह समष्टि विद्या ३७ भेद वाली है । इन ३७ भेदों के कारण यह विद्या ३६ तत्त्वों वाली और तत्त्वातीत स्वभाव वाली भी है । व्यष्टि रूप में यह ३६ तत्त्वों वाली और समष्टि रूप में तत्त्वातीत है । यह ३६ तत्त्वों को अपना अवयव बनाकर उनका स्वरूप धारण कर लेती है और ३७ वें स्वरूप में प्रवेश कर उनसे ऊपर उठ जाती है, तत्त्वातीत विश्वोत्तीर्ण स्वरूप धारण कर लेती है । स्वभाव शब्द का अर्थ है अपना भाव । अपना, अर्थात् शिव का जैसा स्वरूप है वैसा ही स्वरूप इस विद्या का भी है, ऐसी भावना करनी चाहिये । तत्त्वों के लक्षण मैंने ही ¹सौभाग्यसुधोदय में बताये हैं । जैसे कि— १. स्याः स्वभाव-ख. ने. ज. उ. ।
- यह विस्तृत उद्धरण भी नित्याषोडशिकार्णव के परिशिष्ट (पृ० ३०६-३२१) में प्रकाशित इस ग्रन्थ के प्रथम प्रपंच (श्लो० २८-४८) में पाठभेदों के साथ उपलब्ध है । इस ग्रन्थ का प्रथम संस्करण सन् १९६८ में प्रकाशित हो चुका था । यह खेद का विषय है कि कश्मीर ग्रन्थमाला में सन् १९१४ में प्रकाशित श्री जगदीश चन्द्र चटर्जी के 'कश्मीर शैविज्म' के तथा सन् १९३८ में प्रकाशित सटीक प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (पृ० १६३- १०