योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४६ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः यदयमनुत्तरमूर्तिर्निजेच्छया निखिलमपि जगत् स्रष्टुम्। १पस्पन्दे स स्पन्दः प्रथमं शिवतत्त्वमुच्यते तज्ज्ञैः ॥ इच्छा सैव स्वच्छा सन्ततसमवायिनी २सती शक्तिः। सचराचरस्य जगतो बीजं निखिलस्य निज३निलीनस्य ॥ स्वेच्छाशक्त्युद्गीर्णं ४जगदात्माहन्तया समाच्छाद्य । निवसन् स एव निखिलानुग्रहनिरतः सदाशिवोऽभिमतः ॥ ५विश्वं स एव पश्यन्निदन्तया निखिलमीश्वरो जातः। सा भवति शुद्धविद्या येदन्ताहन्तयोरभेदमतिः ॥ माया विभेदबुद्धिर्निजांशभूतेषु६ निखिलभूतेषु७ । नित्यं तस्य निरङ्कुशविभवं वेलेव ८वारिधिं रुन्धे ॥ स तया परिमितमूर्तिः संकुचितसमस्तशक्तिरेष पुमान्। रविरिव सन्ध्यारक्तः संहृतरश्मिः स्वभासनेऽप्यपटुः ॥ यह जो अनुत्तरमूर्ति परम शिव है, वह अपनी इच्छा से इस सारे जगत् को बनाने के लिये जब स्पन्दनशील होता है, तो इस स्पन्दनव्यापार को ही आगम शास्त्र के ज्ञाता प्रथम शिवतत्त्व के नाम से जानते हैं। उस अनुत्तर तत्त्व की स्वच्छ इच्छा शक्ति शिव के साथ सदा अविनाभाव सम्बन्ध से जुड़ी रहती है। यही शक्तितत्त्व है। अपने में छिपे हुए सारे स्थावरजंगमात्मक जगत् को यही पैदा करती है। अपनी इच्छा शक्ति से निकले हुए इस जगत् को अपनी अहन्ता से आच्छादित कर, अर्थात् अपना ही स्वरूप मान कर सब पर अनुग्रह करने में लगा हुआ तत्त्व सदाशिव माना गया है। इस सारे जगत् को इदन्ता के रूप में देखने वाला, अर्थात् अपने से भिन्न मानने वाला तत्त्व ईश्वर कहलाता है। ऊपर बताई गई अहन्ता और इदन्ता में अभेद दृष्टि को जगाने वाला तत्त्व शुद्धविद्या है। अपने ही अंग से उत्पन्न हुए समस्त प्राणियों में भेद बुद्धि को पैदा करने वाला तत्त्व माया है। समुद्र की वेला (किनारा) जैसे समुद्र को आगे बढ़ने से रोक देती है, उसी तरह से यह माया उस परम शिव के समस्त वैभव को छिपा देती है। इस माया शक्ति के कारण परिमित स्वरूप वाले पुरुष की समस्त शक्तियाँ संकुचित हो जाती हैं। उसकी स्थिति सन्ध्याकालीन उस सूर्य के समान हो जाती हैं, जो कि अपनी ललाई में १. प्रस्यन्दे स स्यन्दः-क. ख. ने. । २. परा-मु. । ३. विली-क. ख. । ४. जगदात्म- तया-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ५. विश्वं पश्चात् पश्यन्-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ६. जातेषु-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ७. जीवेषु-ख. ने. ज. झ. उ. । ८. वारिधे-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । पर कुछ विद्वान् अब भी इसको क्षेमराज की कृति मान कर स्वतन्त्र ग्रन्थ के रूप में इसके प्रकाशन और अनुसन्धान में प्रवृत्त हैं।