भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १४७ सम्पूर्णकर्तृताद्या या बह्व्यः सन्ति शक्तयस्तस्य । संकोचात् संकुचिताः कलादिरूपेण रुषन्त्येनम् ॥ १तत्सर्वकर्तृता सा संकुचिता कतिपयार्थमातृपरा । किञ्चित्कर्तारममुं कलयन्ती कीर्त्यते कलानाम्ना२ ॥ सर्वज्ञताऽस्य शक्तिः परिमिततनुरल्पवेद्यमातृपरा । ज्ञानमुपपादयन्ती विद्येति निगद्यते बुधैराद्यैः ॥ नित्यपरिपूर्णतृप्तिः शक्तिस्तस्यैव परिमिता तु सती । भोगेषु रञ्जयन्ती सततममुं रागतत्त्वतां याता ॥ या नित्यताऽस्य शक्तिर्निष्कृष्य निधनोदयप्रदानेन । नियतपरिच्छेदकरी क्लृप्ता स्यात् कालतत्त्वरूपेण ॥ छिपा हुआ स्वयं अपने को भी प्रकाशित करने में असमर्थ हो जाता है। सम्पूर्णकर्तृता आदि जो इसकी अनेक शक्तियाँ हैं, स्वयं इसके इस स्वरूप-संकोच के कारण वे भी संकुचित हो जाती हैं और वे ही कला आदि का स्वरूप धारण कर इसको घेर लेती हैं। उस परम शिव की सर्वकर्तृता शक्ति जब संकुचित होती है, तो यह कुछ विषयों तक ही सीमित हो जाती है। इसी के कारण पुरुष की कर्तृत्वशक्ति भी सीमित हो जाती है। १सर्वकर्तृता का किंचित्कर्तृता के रूप में कलन करने वाली यह शक्ति कलातत्त्व के नाम से जानी जाती है। सर्वज्ञता शक्ति जब अपने स्वरूप का संकोच करती है, तो वह कुछ ही विषयों को जान पाती है। ज्ञान के इस संकोच को पैदा करने वाली शक्ति को आगमशास्त्र के प्राचीन विद्वानों ने 'विद्या' नाम दिया है। उसी परम शिव की नित्य- परिपूर्णतृप्ति नामक शक्ति जब परिमित (संकुचित) होती है, तो वह पुरुष को सदा भोगों में लगाये रहती है। अपनी इसी रंजकता के कारण इस तत्त्व का नाम 'राग' पड़ गया है। इसकी नित्यता शक्ति जब निकल जाती है, तो पुरुष जन्म-मृत्यु के चक्कर में पड़ जाता है। तब हम उसे नियत (निश्चित) समय में ही देख पाते हैं। पुरुष के इस समयकृत संकोच को करने वाली शक्ति ही 'कालतत्त्व' के रूप में प्रकट होती है। इस परम शिव की निरावरण स्वातंत्र्य शक्ति जब संकुचित हो जाती है, तो वह पुरुष को १. यत्-मु. । २. नाम-ख. ग. ने. झ. उ. । १. शिव के सर्वज्ञता आदि छः गुणों का वर्णन आगम-तन्त्रशास्त्र, पुराण आदि में अनेक स्थानों पर मिलता है। प्रथमतः उसका अनादि बोध माया के कारण लुप्त हो जाता है और कला आदि के कारण बाकी बचे पाँच गुण भी संकुचित हो जाते हैं। इसी- लिये अनेक आचार्यों ने माया का भी कंचुकों में समावेश कर उनकी संख्या छः मानी है। इस प्रसंग में विज्ञानभैरव भाषानुवाद, पृ० ८ की पहली टिप्पणी भी देखिये।