भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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१४८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः ] याऽस्य स्वतन्त्राख्या शक्तिः संकोचशालिनी सैव । कृत्याकृत्येष्ववशं नियतममुं नियमयन्त्यभून्नियतिः ॥ इच्छादित्रिसमष्टिः१ शक्तिः शान्ताऽस्य संकुचद्रूपा । २संकुचितेच्छाद्यात्मकसत्त्वादिमाम्यरूपिणी तु सती ॥ बुद्ध्यादिसामरस्य३रूपा चित्तात्मिका मता प्रकृतिः । इच्छाऽस्य रजोलूपाऽहङ्कृतिरासीदहंप्रतीतिकरी ॥ ज्ञानाऽस्य सत्त्वरूपा निर्णयबोधस्य कारणं बुद्धिः । तस्य क्रिया तमोमयमूर्तिर्मन इत्युच्यते विकल्पकरी ॥ ४वामादिपञ्चभेदः स एव संकुचितविग्रहो देवः । ज्ञानक्रियोपरागप्राधान्याद् विविधविषय५रूपोऽभूत् ॥ श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनजिह्वाघ्राणानि बोधकरणानि । वाक्पाणिपादपायूपस्था६ख्याकानि कर्मकरणानि ॥ भले-बुरे की पहचान से भी वंचित कर देती है। इस तरह से पुरुष का नियमन करने वाली यह शक्ति 'नियति' के नाम से जानी जाती है। इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्ति को अपने में समेटे हुए शान्ता शक्ति जब अपने स्वरूप को संकुचित करती है, तो उसमें विद्यमान संकुचित इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्तियां सत्त्व, रज और तमोगुण के रूप में और स्वयं शान्ता शक्ति साम्यावस्था वाली प्रकृति के रूप में परिणत हो जाती है। यह प्रकृति बुद्धि, मन और अहंकार को अपने में समेटे हुए चित्त का स्वरूप धारण करती है। इच्छा शक्ति ही पहले रजोगुण के रूप में और बाद में अहंकार के रूप में परिणत होती है। यह अहंकार ही अहमात्मक अभिमान है। ज्ञानशक्ति पहले सत्त्वगुण के रूप में और बाद में बुद्धि के रूप में परिणत होती है। यह निश्चयात्मक ज्ञान की जननी है। क्रियाशक्ति पहले तमोगुण के रूप में और बाद में मन के रूप में परिणत होती है। यह मन संकल्पविकल्पात्मक व्यापार का साधन है। १वाम- देव आदि पाँच मन्त्रों का शरीर धारण करने वाला संकुचित स्वरूप का यह शिव ज्ञान और क्रियाशक्ति की छाया पड़ने पर ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय बन जाता है। श्रोत्र, चक्षु, स्पर्शन, जिह्वा और घ्राण ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ १. ष्टिाशक्ति-क. ग. उ. । २. संकलिते-ख. ग. ने. झ. उ. । ३. रस्यस्वरूप- ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ४. वागादिपञ्चभेदैः-क. ख. मु. । ५. विषयि-ख. ग. ने. ज. उ. । ६ स्थकनामानि-ख., स्थाख्यानि-मु. ।