भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १४९ शब्दस्पर्शौ रूपं रसगन्धौ चेति भूतसूक्ष्माणि। अयमेवातिनिकृष्टो जातो भूतात्मनाऽपि भूतेशः॥ गगनमनिलश्च तेजः सलिलं भूमिश्च पञ्चभूतानि। श्रोत्रादिकरणवेद्याः शब्दाद्यास्तानि वेदकान्येषाम्॥ वचनकरी वागासीत् पाणिः स्यात् करणभूतमादाने। गमनविसर्गानन्दत्रितये पादा¹दिकत्रिकं करणम्॥ गन्धवती भूमिः स्यादापः सांसिद्धिकद्रवास्तेजः। उष्णस्पर्शं²मरूपस्पर्शो वायुरम्बरं शब्दः॥ इति॥३३-३४॥ (सौ० सु० १।२८-४८) पुनरपि सिंहावलोकनन्यायेन भूतगुणानां पञ्चदशतां विद्यायाश्च तन्मय- रूपतां विवृणोति— पृथिव्यादिषु भूतेषु व्यापकं चोत्तरोत्तरम् ॥३४॥ भूतं त्वधस्तनं व्याप्यं पृथिव्यादिषु। आदिशब्देनाप्तेजोवाय्वाकाशा गृह्यन्ते। ⁴तेषूत्तरोत्तरं व्यापकमधिकवृत्ति। अधस्तनं भूतं व्याप्यं न्यूनवृत्ति। कोऽर्थः? आकाशमध- ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये पाँच सूक्ष्मभूत (तन्मात्राएँ) हैं। यही भूतेश शिव अपनी अत्यन्त निकृष्ट (जड़) अवस्था में आकर स्थूल भूतों का भी स्वरूप धारण कर लेता है। आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी ये पाँच भूत हैं। शब्द आदि विषयों का ज्ञान श्रोत्र आदि इन्द्रियों से होता है। इस तरह से ये विषय वेद्य और इन्द्रियाँ वेदक कही जाती हैं। वागिन्द्रिय वचन की और पाणि आदान क्रिया की साधन है। पाद, पायु और उपस्थ क्रमशः गमन, विसर्ग और आनन्द के साधन हैं। भूमि गन्ध गुणवाली, जल सांसिद्धिक (स्वभावसिद्ध) द्रव (रस) वाला, तेज उष्ण स्पर्शवाला, वायु अरूप स्पर्शवाला और आकाश शब्द गुणवाला है ॥३३-३४॥ प्रस्तुत प्रकरण का सिंहावलोकन करते हुए पुनः पाँच भूतों के पन्द्रह गुणों और विद्या के पन्द्रह वर्णों का विवरण प्रस्तुत करते हैं— पृथिवी आदि पाँच महाभूतों में ऊपर ऊपर के भूत व्यापक रूप में और नीचे के भूत व्याप्य रूप में रहते ३४-३५॥ पृथिवी शब्द के साथ जो आदि शब्द लगा है, वह जल, तेज, वायु और आकाश का संग्राहक है। इन सबमें आगे आगे का तत्त्व व्यापक है, अधिक जगह घेरता है और १. दिकं-ख. ग. ने. ज. झ. उ.। २. विशिष्टं सस्पर्शो-मु.। ३. शब्दाद-ने. ज. झ. उ.। ४. पृथिव्यादिषु भूतेषूत्तरं भूतं व्यापक-ख. ने. ज. झ.।