भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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१५० योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेत स्तनानां भूतानां व्यापकम्, अधिकवृत्तित्वात् । अन्यान्यपि चत्वारि भूतानि व्याप्यानि, न्यूनवृत्तित्वात् । एवं वायुरग्न्यादीनां त्रयाणां व्यापकः, तानि त्रीणि व्याप्यानि । एवं तेजोऽप्यधस्तनयोर्व्यापकम्, ते द्वे व्याप्ये । एवमापः पृथिव्या व्यापिकाः, पृथवी व्याप्येत्यर्थः ॥३४-३५॥ तेन व्यापकगुणा व्याप्ये¹ स्थिता इत्याह— तद्गुणा व्यापकाश्रयाः । व्याप्येष्ववस्थिता देवि स्थूलसूक्ष्मविभेदतः ॥३५॥ व्यापकाश्रयास्तद्गुणा व्यापकगुणाः, व्याप्येष्ववस्थिताः स्थूलसूक्ष्मविभेदतः । स्थूलमधिकवृत्ति व्यापकम्, सूक्ष्ममल्पवृत्ति व्याप्यम् । व्यापकव्याप्ययोः स्थूलसूक्ष्म- विभेदाद् व्यापकगुणा व्याप्येषु तिष्ठन्तीत्यर्थः ॥३५॥ नीचे-नीचे का भूत व्याप्य है, कम जगह घेरता है। इसका अभिप्राय यह है कि आकाश अपने नीचे के सभी भूतों में व्यापक रूप से रहता है। सभी में इसकी स्थिति रहने से यह सभी तत्त्वों को घेरे हुए है। इसकी अपेक्षा अन्य चार भूत व्याप्य हैं, क्योंकि आकाश में रहने से उनका घेरा आकाश की अपेक्षा कम है। इसी तरह वायु शेष तीन अग्नि आदि की दृष्टि से व्यापक है और वे तीन भूत व्याप्य हैं। इसी प्रकार तेज नीचे के दो भूतों की अपेक्षा व्यापक है और वे दोनों व्याप्य हैं। इन दोनों में भी जल पृथिवी की अपेक्षा से व्यापक है और पृथिवी व्याप्य है ॥ ३४-३५ ॥ इससे निष्कर्ष यह निकलता है कि व्यापक भूत के गुण व्याप्य भूत में रहते हैं। इसी विषय को स्पष्ट करते हैं— हे देवि ! व्यापक भूत में रहने वाले उसके गुण व्याप्य भूत में भी रहते हैं, क्योंकि स्थूल और सूक्ष्म के भेद से इनमें परस्पर व्याप्यव्यापकभाव संबन्ध है ॥ ३५ ॥ व्यापक आश्रय (भूत) के गुण भी व्यापक होते हैं, अर्थात् व्याप्य आश्रिय (भूत) में भी वे रहते हैं, क्योंकि ये ¹स्थूल और सूक्ष्म के भेद से विभक्त हैं। स्थूल शब्द का अर्थ यहाँ व्यापक है, जो कि अधिक जगह घेरता है। सूक्ष्म का अर्थ व्याप्य है, जो कि कम जगह घेरता है। व्यापक और व्याप्य भूत की इस स्थूलता और सूक्ष्मता के कारण व्यापक भूत के गुण व्याप्य भूत में भी रहते हैं ॥ ३५ ॥ १. व्याप्येष्वर्थेषु—ख. ने. ज. झ. उ. । 1 इस प्रकरण में अनेक स्थलों पर स्थूल और सूक्ष्म शब्दों का प्रयोग प्रचलित अर्थ से सर्वथा भिन्न रूप में हुआ है। दर्शन शास्त्र में सर्वत्र स्थूल की अपेक्षा सूक्ष्म तत्त्व श्रेष्ठ