योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४० योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः लकारात् पृथिवी जाता तस्माद् विश्वमयी च सा । हकाराद् व्योम संभूतं प्रथमं विमर्शशक्तेराकाशवाचको हकारो जातः, ^१हकारानन्तरं तद्वाच्यं व्योम प्रकाशात्मनः परशिवात् संभूतम् । पश्चाद् वायु- वाचकः ककारो जातः ककारानन्तरं ककारवाच्यः प्रभञ्जनः संजातः । तत्पश्चा- दग्निवाचको रेफः संजातः, तदनन्तरं रेफवाच्योऽग्निः ^२संजातः । ततो जलतत्त्ववाचकः सकारः संजातः, ^३तदनन्तरं तद्वाच्यजलतत्त्वस्य संभवः । तदनन्तरं पृथिवीवाचको लकारो जातः, ^४तदनन्तरं तद्वाच्या पृथिवी जातेत्यर्थः । ^५तस्मात् शिवशक्तिसामरस्यरूपपरावयवप्रकाशविमर्शाभ्यां ^६पञ्चमहाभूतानि तद्वाचकान्यक्षराणि च यस्माज्जातानि, तस्मात्तदुभयसामरस्यरूपा सा परा स्वावयवभूतवर्ण^७मयी विश्वमयीत्यर्थः । तदुक्तं कामकलाविलासे— 'स्फुरितारुणाद् बिन्दोर्नादब्रह्माङ्कुरो^८ रवो व्यक्तः । तस्माद् गगनसमीरणदहनोदकभूमिवर्णसंभूतिः ॥९॥ सकार से जलतत्त्व उत्पन्न होता है। लकार से पृथिवी पैदा होती है। इस तरह से वह परा देवी विश्वमय हो जाती है ॥२९-३०॥ हकार से व्योम पैदा हुआ, अर्थात् पहले विमर्श शक्ति से आकाशवाचक हकार वर्ण की और तब उस हकार के वाच्य व्योम की उत्पत्ति प्रकाशात्मक परम शिव से हुई । बाद में वायु का वाचक ककार और तदनन्तर ककार के वाच्य वायु की उत्पत्ति हुई । इसके बाद अग्नि का वाचक रेफ और उस रेफ का वाच्य अग्नि उत्पन्न हुआ । इसी क्रम से जलतत्त्व का वाचक सकार और तब सकार के वाच्य जलतत्त्व की और तब पृथिवी- वाचक लकार और लकार के वाच्य पृथिवीतत्त्व की उत्पत्ति हुई । इस तरह से शिव और शक्ति के सामरस्यमय स्वरूप परा भगवती के प्रकाश और विमर्श नामक अवयवों से पांच महाभूत और उनके वाचक अक्षरों की भी उत्पत्ति होती है, अतः शिवशक्तिसामरस्य- स्वरूपा परा भगवती के ये पाँच महाभूत और उनके वाचक वर्ण अवयव हैं । इस तरह से यह परा भगवती ^१शब्दात्मक और अर्थात्मक विश्व का स्वरूप धारण कर लेती है । कामकलाविलास में भी इस विषय का वर्णन किया गया है— १ तदनन्तरं-ने. ज. झ. उ. । २. संभूतः। पुनर्जलतत्त्व-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. सकाराज्जलतत्त्वं संभूतम्-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. लकारात् पृथिवी-ख. ने. झ. उ. । ५. यस्मात्-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. पञ्चभूतानि पञ्चभूताक्षराणि च जातानि-ख. ने. ज. झ. उ. । ७ मयविश्व-ख. ने. ज. । ८. स्फुटिता-क. ग. मु. । ९. ह्वयो-ख. ने. ज. झ. ।
- शास्त्रों में षडध्व के विवेचन के प्रसंग में इस विषय की चर्चा आई है। विज्ञान भैरव के २५वें श्लोक की व्याख्या में यह विषय देखा जा सकता है।