१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१५७ नारदपरिव्राजकोपनिषद् भी किसी से बैर न रखते हुए ब्राह्मण, गौ, अश्व एवं मृग आदि समस्त जीवों में समान दृष्टि रखे। मन ही मन सभी परमपिता सर्वव्यापी परमात्मस्वरूप का ही ध्यान करते हुए मैं ही 'परमानन्द स्वरूप परब्रह्म हूँ' ऐसी भावना करनी चाहिए। 'यति' परिव्राजक इस तरह से समझकर मनोमय ज्ञानरूपी दण्ड धारण करके समस्त आशाओं से मुक्त हो जाता है तथा वस्त्र रहित होकर सदैव मन, वचन, कर्म एवं शरीर के द्वारा सम्पूर्ण जगत् का परित्याग करके, मायाजनित प्रपञ्चों की ओर से मुख मोड़कर भ्रमर कीटक न्याय के अनुसार (ब्रह्म में निमग्न) रहकर मुक्ति प्राप्त करता है। ऐसा ही यह उपनिषद् है ॥ ६०-६६ ॥ [ 'भ्रमरकीटक-न्याय' का उल्लेख ध्यान-धारणा के क्रम में बहुधा आता है। भृंगी नामक कीट किसी कीट को पकड़कर अपने बिल में ले जाता है। वहाँ वह उसे भ्रमर गुंजार से इतना प्रभावित कर लेता है कि वह कीट भी भृंगी बन जाता है। यति को सतत ब्रह्म चिन्तन में लीन रहकर स्वयं को ब्रह्मरूप अनुभव करना चाहिए। यह इस उक्ति का भाव है।] ॥ षष्ठोपदेशः ॥ (तुरीयातीत पद एवं उसकी प्राप्ति के उपाय तथा परिव्राजक की जीवनचर्या) अथ नारदः पितामहमुवाच । भगवन् तदभ्यासवशात् भ्रमरकीटन्यायवत्तदभ्यासः कथमिति। तमाह पितामहः। सत्यवाग्ज्ञानवैराग्याभ्यां विशिष्टदेहावशिष्टो वसेत् ॥ १ ॥ तत्पश्चात् पितामह ब्रह्मा जी से देवर्षि नारद ने पूछा- "हे पितामह ! आपने यह कहा है कि भ्रमर-कीट- न्याय द्वारा अपने स्वरूप को जान लेने के पश्चात् मुक्ति को प्राप्त कर लेता है, परन्तु उस स्वरूप को जान लेने का अभ्यास कैसे किया जाये ?" ऐसा श्रवण कर पितामह ब्रह्माजी ने कहा- "हे नारद ! जीवन में सत्य को धारण करते हुए ज्ञान एवं वैराग्य के द्वारा इस शरीर की आसक्ति का परित्याग करे, शेष बचे हुए एक अतिश्रेष्ठ शरीर में प्रतिष्ठित होकर रहे ॥ १॥" ज्ञानं शरीरं वैराग्यं जीवनं विद्धि शान्तिदान्ती नेत्रे मनो मुखं बुद्धिः कला पञ्चविंशति- तत्त्वान्यवयवा अवस्था पञ्चमहाभूतानि कर्म भक्तिज्ञानवैराग्यं शाखा जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तितुरीया- श्चतुर्दशकरणानि पङ्कस्तम्भाकाराणीति। एवमपि नावमतिपङ्कं कर्णधार इव यन्तेव गजं स्वबुद्ध्या वशीकृत्य स्वव्यतिरिक्तं सर्वं कृतकं नश्वरमिति मत्वा विरक्तः पुरुषः सर्वदा ब्रह्माहमिति व्यवहरेन्नान्यत्किंचिद्वेदितव्यं स्वव्यतिरेकेण। जीवन्मुक्तो वसेत्कृतकृत्यो भवति। न नाहं ब्रह्मेति व्यवहरेत्किंतु ब्रह्माहमस्मीत्यजस्रं जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु। तुरीयावस्थां प्राप्य तुरीयातीतत्वं व्रजेत् ॥२ ॥ ज्ञान ही वह अवशिष्ट शरीर है। वैराग्य ही उस देह का प्राण है, शम एवं दम ही दो नेत्र हैं। पूर्णरूपेण शुद्ध मन ही मुख है, बुद्धि कला है, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच प्राण, पाँच विषय, चार अन्तःकरण एवं अव्यक्त प्रकृति-यही पच्चीस तत्त्व उस अवशिष्ट शरीर के अंग-अवयव हैं। उस शरीर के पंचमहाभूत जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय एवं तुरीयातीत ये पाँच अवस्थायें हैं। इस शरीर की शाखाएँ अर्थात् भुजाएँ कर्म, भक्ति, ज्ञान एवं वैराग्य कही गयी हैं अथवा ये चारों अवस्थायें जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति एवं तुरीय ही चार भुजाएँ हैं। पूर्व में कहे हुए चौदह करण पङ्क में विद्यमान जीर्ण खम्भों के सदृश हैं। इस तरह की स्थिति में भी, जिस प्रकार कीचड़ में पड़ी हुई नाव को भी श्रेष्ठ नाविक ठीक रास्ते पर ढकेल कर ला ही देता है, वैसे ही संसार रूपी सागर के कीचड़ में फँसी हुई इस जीवन रूपी नौका को श्रेष्ठ बुद्धि के द्वारा अपने वश में रख कर ठीक उसी प्रकार पार लगायें, जैसे महावत हाथी को अपने अंकुश में रखकर सही मार्ग से ले जाता है। ज्ञानस्वरूप उस श्रेष्ठ शरीर