१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 152, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपदेश ६ मन्त्र ३ १५८ में प्रतिष्ठित हुआ पुरुष 'मेरे सिवाय जो भी है, वह सभी कुछ काल्पनिक होने के कारण नाशवान् है', ऐसा समझकर सदैव 'अहं ब्रह्मास्मि' (मैं ब्रह्म ही हूँ) का उच्चारण करे। अपनी अन्तरात्मा के अलावा दूसरी अन्य कोई भी वस्तु ज्ञात नहीं है, इस प्रकार से दृढ़ निश्चय करके जीवन्मुक्त होकर विचरण करे। इस तरह से जीवन- यापन करने वाला परिव्राजक कृतकृत्य हो जाता है। अपने व्यावहारिक जगत् में भी इस प्रकार न कहे कि "मैं ब्रह्म नहीं हूँ।" वरन् निरन्तर इस धारणा को पुष्टि प्रदान करता रहे कि "मैं स्वयं ही ब्रह्म हूँ।" इन तीन अवस्थाओं-जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति को क्रमशः पार करके तुरीयावस्था में पहुँचकर परिव्राजक तुरीयातीत परमात्मा के पद में प्रविष्ट होता है ॥ २ ॥ दिवा जाग्रन्नक्तं स्वप्नं सुषुप्तमर्धरात्रं गतमित्येकावस्थायां चतस्रोऽवस्थास्त्वेकैक - करणाधीनानां चतुर्दशकरणानां व्यापारश्चक्षुरादीनाम्। चक्षुषो रूपग्रहणं श्रोत्रयोः शब्दग्रहणं जिह्वाया रसास्वादनं घ्राणस्य गन्धग्रहणं वचसो वाग्व्यापारः पाणेरादानं पादयोः संचारः पायोरुत्सर्ग उपस्थस्यानन्दग्रहणं त्वचः स्पर्शग्रहणम्। तदधीना च विषयग्रहणबुद्धिः बुद्ध्या बुद्ध्यति चित्तेन चेतयत्यहंकारेणाहंकरोति। विसृज्य जीव एतान्देहाभिमानेन जीवो भवति। गृहाभिमानेन गृहस्थ इव शरीरे जीवः संचरति। प्राग्दले पुण्यावृत्तिराग्नेय्यां निद्रालस्यौ दक्षिणायां क्रौर्यबुद्धिर्नैर्ऋत्यां पापबुद्धिः पश्चिमे क्रीडारतिर्वायव्यां गमने बुद्धिरुत्तरे शान्तिरीशान्ये ज्ञानं कर्णिकायां वैराग्यं केसरेष्वात्मचिन्ता इत्येवं वक्त्रं ज्ञात्वा ॥ ३ ॥ दिन जाग्रत्-अवस्था है, रात्रि स्वप्नावस्था है तथा सुषुप्ति अर्द्धरात्रि स्वरूप है। ये तीनों अवस्थाएँ तुरीयावस्था में विद्यमान हैं। तुरीयावस्था तुरीयातीत में प्रतिष्ठित है। इस तरह से एक ही अवस्था में चार अवस्थायें निहित हैं। मन, बुद्धि, चित्त एवं अहंकार-इन चार अन्तःकरणों में से हर एक के अधीन जो नेत्र आदि चौदह करण आगे स्पष्ट किये गये हैं, उनके पृथक्-पृथक् कार्य बतलाये जाते हैं। चक्षुओं का कार्य रूप को आकृष्ट करना है, श्रोत्रों का कार्य-क्षेत्र शब्द की उपलब्धि अर्जित करना है, जिह्वा का कार्य रसास्वादन लेने का है, गन्ध की अनुभूति नासिका का कार्य है, वाक्शक्ति का कार्य बोलना है। हाथों का कार्य किसी वस्तु को प्राप्त करना, उठाना व पहुँचाना है, पैरों का कार्य निरन्तर चलते रहना है, गुदा का काम मल विसर्जन है तथा विषय जनित आनन्दानुभव जननेन्द्रिय का काम है। स्पर्शानुभव त्वचा का कार्य है। इनके आश्रित विषय-ग्रहण की बुद्धि है। बुद्धि के द्वारा जानकारी प्राप्त करता है। चित्त से चैतन्यता की प्राप्ति करता है। अहंकार से अहंता का अनुभव होता है। इन सभी (चौदह) भावों की विशेषरूप से सृष्टि करके इनके समूह रूपी देह में आत्माभिमान करने के कारण तुरीय-चेतनतत्त्व ही जीवरूप में हो जाता है। जिस प्रकार गृह में अभिमानपूर्वक व्यक्ति गृहस्थ बन जाता है, उसी प्रकार देह में अभिमानपूर्वक तुरीय चेतन जीव होकर विचरण करता है। शरीर के अन्तःकरण में अष्टपंखुड़ियों से युक्त हृदय रूपी कमल है, उस हृदय में प्रतिष्ठित रहने वाला जीव जब उक्त कमल के पूर्ववर्त्ती दल में विचरण करता है, तब उसमें पुण्यरूपी अनुष्ठान की प्रवृत्ति होती है। आग्नेय कोण वाले दल में स्थित होने पर वह पुरुष आलस्य एवं निद्रा से ग्रस्त हो जाता है। दक्षिण दिशा के दल में प्रतिष्ठित होने पर उस व्यक्ति में क्रूरता का भाव आ जाता है। नैर्ऋत्य कोण का आश्रय प्राप्त करने पर उस पुरुष में सद्बुद्धि जाग्रत् हो जाती है। पश्चिम दिशा के दल में प्रतिष्ठित होने पर वह क्रीड़ा में अत्यधिक आसक्त हो जाता है। वायव्य कोण के दल में गमन करने पर उस पुरुष की बुद्धि श्रेष्ठ मार्ग में गमन करने लगती है। उत्तर दिशा के दल में प्रविष्ट होने पर उसे शान्ति की अनुभूति होती है। ईशानकोण में स्थिति होने पर विशेष ज्ञान की प्राप्ति