१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१५९ नारदपरिव्राजकोपनिषद्
होती है। उस कमल की कर्णिका में विद्यमान रहने पर उस पुरुष के अन्तः में वैराग्य-भाव की जागृति होती है तथा केसरों में प्रविष्ट होने पर उस पुरुष श्रेष्ठ का मन आत्मा के ध्यान में लगता है। इस तरह से जिसमें चैतन्यतत्त्व ही मुख के सदृश प्रमुख है, ऐसे उस आत्मस्वरूप को समझ कर ज्ञानवान् मनुष्य (परिव्राजक) तुरीयातीत ब्रह्म के रूप में प्रतिष्ठित हो जाता है॥ ३॥ जीवदवस्थां प्रथमं जाग्रद्द्वितीयं स्वप्नं तृतीयं सुषुप्तं चतुर्थं तुरीयं चतुर्भिर्वरहितं तुरीयातीतम्। विश्वतैजसप्राज्ञतटस्थभेदैरेक एव एको देवः साक्षी निर्गुणश्च तद्ब्रह्माहमिति व्याहरेत्। नो चेज्जाग्रदवस्थायां जाग्रदादिचतस्रोऽवस्थाः स्वप्ने स्वप्नादिचतस्रोऽवस्थाः सुषुप्ते सुषुप्त्यादिचतस्रोऽवस्थाः तुरीये तुरीयादिचतस्रोऽवस्थाः न त्वेवं तुरीयातीतस्य निर्गुणस्य। स्थूलसूक्ष्मकारणरूपैर्विश्वतैजसप्राज्ञैश्वरैः सर्वावस्थासु साक्षी त्वेक एवावतिष्ठते। उत तटस्थो द्रष्टा तटस्थो न द्रष्टा द्रष्टृत्वात् द्रष्टैव कर्तृत्वभोक्तृत्वाहंकारादिभिः स्पृष्टो जीवः जीवेत्तरो न स्पृष्टः। जीवोऽपि न स्पृष्ट इति चेन्न। जीवाभिमानेन क्षेत्राभिमानः शरीराभिमानेन जीवत्वम्। जीवत्वं घटाकाशमहाकाशवद्व्यवधानोऽस्ति। व्यवधानवशादेव हंसः सोऽहमिति मन्त्रेणोच्छ्वासनिः- श्वासव्यपदेशेनानुसन्धानं करोति। एवं विज्ञाय शरीराभिमानं त्यजेन्न शरीराभिमानी भवति। स एव ब्रह्मेत्युच्यते॥ ४॥ जीव की चार अवस्थाओं में से पहली जाग्रत् अवस्था, दूसरी स्वप्नावस्था, तीसरी सुषुप्ति तथा चौथी तुरीयावस्था है। इन चारों अवस्थाओं से परे तुरीयातीत अवस्था है। एक ही आत्मा विश्व, तैजस, प्राज्ञ एवं तटस्थ के भेद से चार तरह का प्रतीत होता है। इस कारण एक ही परमात्मदेव सभी के साक्षी स्वरूप एवं सत्त्वादि गुणों से परे माने गये हैं तथा वह ब्रह्म मैं स्वयं हूँ, ऐसा ही कहे। तुरीयातीत अवस्था से युक्त पुरुष को उपर्युक्त चारों अवस्थाओं के अनुभव से रहित मानना चाहिए। अन्यथा जिस तरह से जाग्रत् अवस्था में जाग्रत् आदि चार अवस्थायें होती हैं, स्वप्न में स्वप्नादि चार अवस्थाएँ होती हैं, सुषुप्ति में सुषुप्ति आदि चार अवस्थाएँ होती हैं तथा तुरीय में तुरीयादि चार अवस्थाएँ होती हैं, वैसे ही तुरीयातीत में भी इन चारों अवस्थाओं के होने की स्थिति हो सकती है; किन्तु यथार्थ में तुरीयातीत के निर्गुण होने से उसमें अवस्था भेद संभव नहीं है। स्थूल, सूक्ष्म एवं कारणरूप जो विश्व, तैजस एवं प्राज्ञ ब्रह्मरूप हैं, इन सभी के साथ समस्त अवस्थाओं में एक ही साक्षी रहता है; किन्तु तटस्थ ईश्वर द्रष्टा नहीं, क्योंकि तटस्थ मायाधारी ईश्वर के रूप में होता है, किन्तु उसका कोई द्रष्टा नहीं है, अतः तटस्थ ही द्रष्टा नहीं हो सकता। इस कारण वह द्रष्टा नहीं है, ऐसा ही मानना चाहिए। तब जीव को ही द्रष्टा मान लिया जा सकता है। नहीं, जीव द्रष्टा नहीं हो सकता है; क्योंकि वह कर्तृत्व, भोक्तृत्व एवं अहंकार आदि से युक्त है। जीव के अतिरिक्त जो तुरीयातीत परमात्मसत्ता है, वह ऊपर कहे हुए दोषों के सम्पर्क से परे है। यदि यह कहें कि जीव भी स्वरूपानुसार शुद्ध चैतन्य ही है, इस कारण वह भी कर्तृत्व आदि के संस्पर्श से परे है, तो यह भी सही नहीं कहा जा सकता; क्योंकि उसमें जीवत्व का अहं होने से इस देह रूपी क्षेत्र में उसका अभिमान है तथा शरीर के अहं (अभिमान) के कारण ही उसमें जीवत्व निहित है। परमात्मतत्त्व से जीव तत्त्व का व्यवधान ठीक उसी तरह से है, जिस तरह महाकाश से घटाकाश का है। व्यवधान के कारण ही हंसरूपी जीव उच्छ्वास एवं निःश्वास के माध्यम से सदैव 'सोऽहम्' नामक मंत्र का चिन्तन करते हुए निरन्तर अपने आत्म-स्वरूप का अनुसंधान करता है। ऐसा समझकर शरीर में आत्माभिमान का परित्याग कर दे। जो 'यति' शरीराभिमानी नहीं होता, वही ब्रह्म कहलाता है॥४॥