भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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उपदेश ६ मन्त्र ४२ १६२ ततः संवत्सरस्यान्ते ज्ञानयोगमनुत्तमम् । आश्रमत्रयमुत्सृज्य प्राप्तश्च परमाश्रमम् ॥३२॥ अनुज्ञाप्य गुरूँश्चैव चरेद्धि पृथिवीमिमाम्। त्यक्तसङ्गो जितक्रोधो लघ्वाहारो जितेन्द्रियः ॥ ३३ ॥ गुरु के हित में सतत संलग्न रहते हुए जिज्ञासु पुरुष को गुरु-आश्रम में एक वर्ष तक निवास करना चाहिए। आश्रम के नियमोपनियमों के पालन में कभी भी आलस्य-प्रमादादि नहीं करना चाहिए एवं ब्रह्मचर्य और अहिंसा आदि यमों के पालन में भी सदैव सतर्क रहना चाहिए। इस तरह से साधना करते हुए गुरु की विशेष कृपा से वर्ष के अन्त में सर्वश्रेष्ठ ज्ञानयोग को प्राप्त करके धर्मानुकूल सदाचार पूर्वक ब्रह्मचर्य आदि तीनों आश्रमों का विधिवत् सेवन करता हुआ परिव्राजक-संन्यासी पृथ्वी पर विचरण करे। आसक्ति का परित्याग कर क्रोध को अपने वश में कर ले। 'योगी' को स्वल्प आहार ग्रहण करने वाला और वाक् आदि इन्द्रियों पर संयम रखने वाला होना चाहिए ॥ ३०-३३॥ द्वाविमौ न विरज्येते विपरीतेन कर्मणा । निरारम्भो गृहस्थश्च कार्यावांश्चैव भिक्षुकः ॥ ३४ ॥ माद्यति प्रमदां दृष्ट्वा सुरां पीत्वा च माद्यति । तस्माद्दृष्टिविषां नारीं दूरतः परिवर्जयेत् ॥ ३५ ॥ संभाषणं सह स्त्रीभिरालापः प्रेक्षणं तथा । नृत्तं गानं सहासं च परिवादांश्च वर्जयेत् ॥ ३६ ॥ न स्नानं न जपः पूजा न होमो नैव साधनम् । नाग्निकार्यादिकार्यं च नैतस्यास्तीह नारद ॥ ३७॥ नार्चनं पितृकार्यं च तीर्थयात्रा व्रतानि च । धर्माधर्मादिकं नास्ति न विधिर्लौकिकी क्रिया ॥३८॥ संत्यजेत्सर्वकर्माणि लोकाचारं च सर्वशः । कृमिकीटपतङ्गांश्च तथा योगी वनस्पतीन् ॥ ३९ ॥ न नाशयेद्बुधो जीवान्यरमार्थमतिर्यतिः। नित्यमन्तर्मुखः स्वच्छः प्रशान्तात्मा स्वपूर्णधीः ॥ ४० ॥ अन्तःसङ्गपरित्यागी लोके विहर नारद। नाराजके जनपदे चरत्येकचरो मुनिः ॥ ४१ ॥ निःस्तुतिर्निर्नमस्कारो निःस्वधाकार एव च। चलाचलनिकेतश्च यतिर्यादृच्छिको भवेत् ॥४२॥ इत्युपनिषत् । निरारम्भ (कामनापूर्वक किसी कार्य का प्रारंभ न करने वाले) गृहस्थ एवं कर्मरत (प्रव्रज्या में सतत सचेष्ट) परिव्राजक इन दोनों की शोभा तभी तक होती है, जब तक कि वे अपने आश्रम धर्म के अनुकूल श्रेष्ठ आचरण करें। मनुष्य मदिरा-पान करने से मतवाला होता है; किन्तु रूपवान् सुन्दर तरुणी नारी के दर्शन-मात्र से ही उन्मत्त हो उठता है। इस कारण दर्शन मात्र से विष जैसा प्रभाव डालने वाली नारी का परिव्राजक दूर से ही परित्याग कर दे। नारियों के साथ वार्तालाप करना, उनके समक्ष संदेश भेजना, नृत्य-गायन आदि करना, हास- परिहास करना एव छिद्रान्वेषण करना आदि दुर्गुण परिव्राजक को त्याग देना चाहिए। हे नारद ! संन्यासी के लिए [नैमित्तिक] स्नान, देवपूजन, जप, यज्ञ-यागादि कर्म-नहीं करने हैं। उसके लिए तो श्राद्ध-तर्पण, तीर्थों की यात्रा करना, व्रत-उपवास, धर्म-अधर्म और लोकाचार सम्बन्धी कर्म भी आवश्यक नहीं है। योगारूढ़ संन्यासी सभी कर्मों का परित्याग कर दे तथा समस्त लोकाचारों से भी उसे दूर रहना चाहिए। विद्वान् 'योगी' अपनी बुद्धि एवं सामर्थ्य को परमार्थ में लगाकर कृमि, कीट-पतङ्गों तथा वनस्पति आदि प्राणियों को कभी नष्ट न करे। संन्यासी सर्वदा अन्तर्मुखी रहे, बाह्य एवं अन्तः से सदैव अपने को स्वच्छ रखे। अपने अन्तःकरण को पूरी तरह से शान्त रखकर बुद्धि को आत्मानन्द से परिपूर्ण किये रहे। हे नारद ! तुम अन्तः से सभी तरह की आसक्तियों का त्याग करके इस जगत् में विचरण करते रहो। 'यति' को एकाकी किसी ऐसे प्रदेश में भ्रमण नहीं करना चाहिए, जहाँ अराजकता फैली हुई हो। संन्यासी को स्तुति एवं नमस्कार आदि से दूर रहना चाहिए। श्राद्ध एवं तर्पण से योगी सदा दूर रहे। किसी सुनसान घर में या पर्वत की गुफा में निवास करे। परिव्राजक को सदैव स्वच्छन्दरूप में सर्वत्र विचरण करना चाहिए। यही उपनिषद् है ॥ ३४-४२ ॥