१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६३ नारदपरिव्राजकोपनिषद् ॥ सप्तमोपदेशः ॥ अथ यतेर्नियमः कथमिति पृष्टं नारदं पितामहः पुरस्कृत्य विरक्तः सन्यो वर्षासु ध्रुवशीलोऽष्टौ मास्र्येकाकी चरन्नैकत्र निवसेद्भिक्षुर्भयात्सारङ्गवदेकत्र न तिष्ठेत्स्वगमननिरोधग्रहणं न कुर्याद्ब- स्ताभ्यां नद्युत्तरणं न कुर्यान्न वृक्षारोहणमपि न देवोत्सवदर्शनं कुर्यान्नैकान्नाशी न बाह्यदेवार्चनं कुर्यात्स्वव्यतिरिक्तं सर्वं त्यक्त्वा मधुकरावृत्त्याहारमाहरन्कृशो भूत्वा मेदोवृद्धिमकुर्वन्नाज्यं रुधिरमिव त्यजेदेकान्नान्नं पललमिव गन्धलेपनमशुद्धिलेपनमिव क्षारमन्त्यजमिव वस्त्रमुच्छिष्टपात्रमिवाभ्यङ्गं स्त्रीसङ्गमिव मित्राह्लादकं मूत्रमिव स्पृहां गोमांसमिव ज्ञातचरदेशं चण्डालवाटिकामिव स्त्रियमहिमिव सुवर्णं कालकूटमिव सभास्थलं श्मशानस्थलमिव राजधानीं कुम्भीपाकमिव शवपिण्डवदेकान्नान्नं न देहान्तरदर्शनं प्रपञ्चवृत्तिं परित्यज्य स्वदेशमुत्सृज्य ज्ञातचरदेशं विहाय विस्मृतपदार्थं पुनः प्राप्तहर्ष इव स्वमानन्दमनुस्मरन्स्वशरीराभिमानदेशविस्मरणं मत्वा स्वशरीरं शवमिव हेयमुपगम्य कारागृहविनिर्मुक्तचोरवत्पुत्राप्तबन्धुभवस्थलं विहाय दूरतो वसेत् ॥ अयत्नेन प्राप्तमाहरन्ब्रह्मार्पणवद्ध्यानानुसंधानपरो भूत्वा सर्वकर्मनिर्मुक्तः कामक्रोधलोभ- मोहमदमात्सर्यादिकं दग्ध्वा त्रिगुणातीतः षडूर्मिरहितः षड्भावविकारशून्यः सत्यवाक् शुचिरद्रोही ग्रामैकरात्रं पत्तने पञ्चरात्रं क्षेत्रे पञ्चरात्रं तीर्थे पञ्चरात्रमनिकेतः स्थिरमतिर्नानृतवादी गिरिकन्दरेषु वसेदेक एव द्वौ वा चरेत् ग्रामं त्रिभिर्नगरं चतुर्भिर्ग्राममित्येकश्चरेत् । भिक्षुश्चतुर्दशकरणानां न तत्रावकाशं दद्यादविच्छिन्नज्ञानाद्वैराग्यसंपत्तिमनुभूय मत्तो न कश्चिन्नान्यो व्यतिरिक्त इत्यात्मन्या- लोच्य सर्वतः स्वरूपमेव पश्यञ्जीवन्मुक्तिमवाप्य प्रारब्धप्रतिभासनाशपर्यन्तं चतुर्विधं स्वरूपं ज्ञात्वा देहपतनपर्यन्तं स्वरूपानुसंधानेन वसेत् ॥ १ ॥ संन्यासी के सामान्य नियम तथा कुटीचक आदि के विशेष नियम- इसके पश्चात् देवर्षि नारद जी ने पितामह ब्रह्मा जी से यह प्रश्न किया-हे ब्रह्मन् ! संन्यासी के नियम किस प्रकार के हैं ? पितामह ब्रह्मा जी ने नारद जी के इस प्रश्न को अपने समक्ष रखते हुए उत्तर देना प्रारम्भ किया। उन्होंने कहा-हे नारद ! संन्यासी विरक्त होकर मात्र चार मासीय वर्षा के दिनों में किसी एक निश्चित क्षेत्र में निवास करे और शेष आठ मास में वह अकेले ही भ्रमण करे। किसी एक स्थान विशेष पर ज्यादा दिनों तक निवास न करे, क्योंकि ऐसा करने से 'यति' के पतित होने का भय रहता है। भ्रमर की तरह से कभी एक स्थल पर न रुके। यदि कोई अन्यत्र जाने का विरोध करे, तो परिव्राजक उस विरोध को न माने। अपने हाथों अर्थात् अपने आप ही नदी तैरकर के पार न हो। वृक्षों पर भी उसे नहीं चढ़ना चाहिए। देवों के निमित्त होने वाले आयोजनों को नहीं देखना चाहिए। सदैव एक ही घर का भोजन न करे और आत्मा के अतिरिक्त अन्य बाह्य देवगणों का पूजन-अर्चन भी न करे। आत्मा के सिवाय अन्य सभी का परित्याग कर, मधुकरी-वृत्ति से भिक्षा प्राप्त भोजन करे। शरीर को कमजोर बनाकर रखे। देह में मेद (चर्बी) की वृद्धि बिल्कुल न होने दे। घी को रुधिर के समान जानकर परित्याग कर दे। एक ही परिजन के घर के अन्न को मांसवत् जानकर छोड़ देना चाहिए। इत्र अथवा चन्दन आदि के लेप को अपवित्र मल-मूत्रादि के लेप की तरह से मान करके छोड़ देना चाहिए। क्षार (साबुन, सोडा आदि के मुख्य घटक) आदि को चाण्डाल की तरह से जानकर अस्पृश्य माने। कौपीन आदि के अलावा अन्य वस्त्रों को उच्छिष्ट पात्रों के सदृश समझकर छोड़ दे। अभ्यङ्ग (तेल आदि की