भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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उपदेश ७ मन्त्र २ १६४ मालिश करने) को स्त्री के आलिङ्गन की तरह मानकर सदैव उससे दूर रहे। मित्रों के आनन्ददायक सङ्ग को मूत्र के सदृश त्याज्य जाने। किसी वस्तु को प्राप्त करने के लिए अपने मन में उत्पन्न होने वाली स्पृहा (इच्छा शक्ति) को अपने लिए गोमांस के सदृश वर्जनीय मानना चाहिए। चिर परिचित एवं प्रिय स्थल को चाण्डाल का बगीचा समझना चाहिए। सुवर्ण को कालकूट के समान, सभास्थल को श्मशान भूमि की भाँति, राजधानी को कुम्भीपाक नरक के समान तथा एक जगह के अन्न (भोजन) को मृत व्यक्ति के लिए दिए हुए पिण्ड के समान जानकर त्याग देना चाहिए। शरीर को आत्मा से अलग देखना तथा प्रवृत्तियों में फँसना भी छोड़ देना चाहिए। अपने देश को छोड़कर अपने परिचित स्थलों से सदैव दूर बने रहने का प्रयास करना चाहिए। अपने आनन्दमय स्वरूप का सतत ध्यान करते हुए, इस तरह की प्रसन्नता की अनुभूति करे, जैसे कि कोई विस्मृत हुई कीमती वस्तु पुनः मिल गयी हो। जिस स्थान पर जाने से अपने शरीर में ही आत्माभिमान जाग जाये, जहाँ अपनी देह से सम्बन्ध रखने वाले लोग निवास करते हों, उस स्थान को हमेशा के लिए भूल जाना चाहिए। अपनी इस देह को भी मृत व्यक्ति की तरह से त्याज्य मानते हुए उसमें आसक्त नहीं होना चाहिए। जिस प्रकार जेलखाने से मुक्त हुआ मनुष्य (चोर) शर्म के कारण अपनी जन्मस्थली पर न जाकर अन्यत्र कहीं दूर जाकर निवास करने लगता है, उसी प्रकार परिव्राजक जहाँ उसके पुत्र और माता-पिता आदि समस्त गुरुजन निवास करते हों, उस स्थल को छोड़कर वहाँ से सदैव के लिए दूर ही अपना निवास-स्थल बनाना चाहिए। बिना प्रयास के ही जो भी कुछ प्राप्त हो जाये, वही आहार (भोजन) ग्रहण कर लेना चाहिए। निरन्तर ब्रह्ममय स्वरूप ॐकार के ध्यान में संलग्न होकर अन्य दूसरे सभी तरह के कर्म-बन्धनों से मुक्त हो जाना चाहिए। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद एवं मात्सर्य आदि को जलाकर सत, रज, तम आदि तीन गुणों से परे हो जाना चाहिए। भूख-प्यास आदि छः प्रकार की ऊर्मियों का प्रभाव योगी में नहीं होना चाहिए। जन्म, वृद्धि आदि षड्भाव विकारों से भी अपना सम्बन्ध नहीं रखना चाहिए। सर्वदा सत्यमय वाणी बोले, शरीर एवं मन से पूर्ण पवित्र रहे और किसी भी मनुष्य आदि से द्रोह न करे। ग्राम में एक रात्रि, नगर में पाँच रात्रि, किसी धार्मिक पुण्य स्थली में पाँच रात्रि एवं तीर्थ में भी पाँच रात्रि से ज्यादा नहीं ठहरना चाहिए। परिव्राजक कहीं पर भी अपने लिए घर न बनाये। बुद्धि को सदैव परमात्मा के ध्यान में लगाये रखे। कभी व किसी भी स्थिति में असत्य वाणी न बोले। पर्वत की गुफाओं में अपना निवास बनाये। सदैव एकाकी ही भ्रमण करे। परिव्राजक (चौमासे के समय) वर्षाकालीन चार मास में दो व्यक्तियों को अपने साथ रख सकता है। तीन के साथ रहने पर तो गाँव जैसा ही हो जाता है और चार आदमियों के साथ उस स्थल पर नगर जैसा ही बस जाता है। अतः परिव्राजक एकाकी ही रहे। अपने चौदह करणों (इन्द्रियों) को अलग-अलग विषयों के ध्यान का अवकाश नहीं देना चाहिए एवं अपने से भिन्न अन्य किसी को मान्यता न दे। किसी भी अन्य दूसरे पदार्थ की तनिक भी भावना न करते हुए सभी का अवलोकन अपनी आत्मा के अनुरूप ही करे। अपने स्वरूप का साक्षात्कार करता हुआ जीवन से मुक्ति प्राप्त कर ले। अपने स्वरूप का विवेक हो जाने पर भी जब तक मृत्यु न आ जाये, तब तक अपने स्वरूप का ही ध्यान करता रहे। परिव्राजक का यह परमदायित्व है कि वह अपनी अन्तरात्मा का सम्यक् रूप से चिन्तन करते हुए कालयापन करे॥ १ ॥ त्रिषवणस्नानं कुटीचकस्य बहूदकस्य द्विवारं हंसस्यैकवारं परमहंसस्य मानसस्नानं तुरीयातीतस्य भस्मस्नानमवधूतस्य वायव्यस्नानम्॥ २ ॥ कुटीचक-संन्यासी के लिए तीनों समय (प्रातः, मध्याह्न एवं सायंकाल) का स्नान करने का नियम है। बहूदक-संन्यासी प्रातः काल एवं सायंकाल (दो संध्याओं) में स्नान करे। हंस नामक संन्यासी के लिए दिन में केवल एक ही बार स्नान करने का विधान बतलाया गया है। परमहंस नाम वाले संन्यासी को केवल मानसिक स्नान ही करना चाहिए। तुरीयातीत के लिए भस्म-स्नान कहा गया है अर्थात् वह सम्पूर्ण देह में केवल भस्म