भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 157, कुल 414 में से

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१६५ नारदपरिव्राजकोपनिषद् (विभूति) ही धारण कर ले और अवधूत नामक संन्यासी के लिए वायव्य स्नान अर्थात् वह सम्पूर्ण देह में वायु के संस्पर्श से ही पवित्र हो जाता है। उसको जल-स्नान की कोई विशेष आवश्यकता नहीं रहती है ॥ २ ॥ ऊर्ध्वपुण्ड्रं कुटीचकस्य त्रिपुण्ड्रं बहूदकस्य ऊर्ध्वपुण्ड्रं त्रिपुण्ड्रं हंसस्य भस्मोद्धूलनं परमहंसस्य तुरीयातीतस्य तिलकपुण्ड्रमवधूतस्य न किंचित्। तुरीयातीतावधूतयोः ॥ ३ ॥ कुटीचक संन्यासी को मस्तक पर ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करना चाहिए। बहूदक को त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिए, हंस नामक संन्यासी ऊर्ध्वपुण्ड्र अथवा त्रिपुण्ड्र एवं परमहंस नाम वाले संन्यासी को केवल भस्म (विभूति) धारण करनी चाहिए। तुरीयातीत के लिए तिलक पुण्ड्र का नियम बतलाया गया है और अवधूत संन्यासी के लिए किसी भी तरह का विशेष चिह्न आवश्यक नहीं है॥ ३ ॥ ऋतुक्षौरं कुटीचकस्य ऋतुद्वयक्षौरं बहूदकस्य न क्षौरं हंसस्य परमहंसस्य च न क्षौरम्। अस्ति चेदयनक्षौरं तुरीयातीतावधूतयोर्न क्षौरम् ॥ ४ ॥ कुटीचक संन्यासी को दो-दो मास में क्षौर-कर्म कराना चाहिए। बहूदक को चार-चार मास में क्षौर कर्म करना चाहिए। हंस एवं परमहंस अपनी इच्छानुसार यदि चाहें, तो छः-छः महीने के अन्तराल से क्षौर कर्म करवा सकते हैं। अवधूत तथा तुरीयातीत परिव्राजक के लिए क्षौर-कर्म कराना आवश्यक नहीं है ॥ ४ ॥ कुटीचकस्यैकान्नं माधूकरं बहूदकस्य हंसपरमहंसयोः करपात्रं तुरीयातीतस्य गोमुखं अवधूतस्याजगरवृत्तिः ॥ ५ ॥ कुटीचक के लिए एक ही जगह के अन्न (भोजन) ग्रहण करने का विधान है। बहूदक-संन्यासी को मधुकरी-वृत्ति से अर्थात् भिक्षा द्वारा प्राप्त अन्न ही ग्रहण करना चाहिए। हंस एवं परमहंस के लिए हाथ ही भोजन ग्रहण करने का पात्र होता है। ये संन्यासी कर-पात्री कहलाते हैं। उस (करपात्री) संन्यासी के हाथ में जो कुछ भी आ जाए, उतना ही खा कर संतोष करना चाहिए। तुरीयातीत को गो-मुख वृत्ति अर्थात् उस संन्यासी के मुख में अन्य दूसरा कोई मुनष्य जो कुछ भी फल-फूल दे, उसे गाय के सदृश मुँह फैलाकर ले लेना चाहिए। अवधूत संन्यासी के लिए अजगर वृत्ति अर्थात् ईश्वरेच्छा अथवा दूसरे अन्य लोगों की इच्छानुसार जो कुछ भी मिल जाये, उसी पर संतोष कर लेना चाहिए॥ ५ ॥ शाटीद्वयं कुटीचकस्य बहूदकस्यैकशाटी हंसस्य खण्डं दिगम्बरं परमहंसस्य एककौपीनं वा तुरीयातीतावधूतयोर्जातरूपधरत्वं हंसपरमहंसयोरजिनं न त्वन्येषाम् ॥ ६ ॥ कुटीचक को अपने पास दो वस्त्र रखने का नियम है, बहूदक अपने पास केवल एक चादर रखे तथा हंस नामक संन्यासी को वस्त्र का एक टुकड़ा रखने का विधान है। परमहंस दिगम्बर (वस्त्ररहित) रहे या फिर एक कौपीन मात्र ही स्वीकार करे। तुरीयातीत और अवधूत को तो वस्त्ररहित ही रहने का नियम है। हंस एवं परमहंस के लिए मृग-चर्म धारण करने का नियम है, अन्य संन्यासियों के लिए मृगचर्म अनिवार्य नहीं है ॥ ६ ॥ कुटीचकबहूदकयोर्देवार्चनं हंसपरमहंसयोर्मानसार्चनं तुरीयातीतावधूतयोः सोहंभावना ॥ ७ ॥ कुटीचक एवं बहूदक-परिव्राजकों के लिए प्रत्यक्षरूप में देवताओं के पूजन का नियम है। हंस एवं परमहंस के लिए मानसिक पूजन का अधिकार है। तुरीयातीत और अवधूत के लिए केवल 'सोऽहमस्मि' अर्थात् वह ब्रह्म मैं स्वयं ही हूँ, ऐसी भावना करनी चाहिए ॥ ७ ॥ कुटीचकबहूदकयोर्मन्त्रजपाधिकारो हंसपरमहंसयोर्ध्यानाधिकारस्तुरीयातीतावधूतयोर्न त्वन्याधिकारस्तुरीयातीतावधूतयोर्महावाक्योपदेशाधिकारः परमहंसस्यापि। कुटीचकबहूदक- हंसानां नान्यस्योपदेशाधिकारः ॥ ८ ॥

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