१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 158, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपदेश ८ मन्त्र १ १६६ कुटीचक और बहूदक-योगियों को मंत्रादि के जप का पूर्ण अधिकार प्राप्त है। हंस एवं परमहंस नामक योगी एकमात्र ध्यान के ही अधिकारी हैं। तुरीयातीत और अवधूत को अपने स्वरूपानुसंधान के अतिरिक्त अन्य किसी भी तरह के कार्य का अधिकार नहीं है। इन तीनों तुरीयातीत, अवधूत एवं परमहंस को ही एक मात्र ‘तत्त्वमसि', 'अयमात्मा ब्रह्म' आदि महावाक्यों के उपदेश का अधिकार है। कुटीचक, बहूदक एवं हंस नामक संन्यासी दूसरे अन्य लोगों को उपदेश प्रदान करने के अधिकारी नहीं हैं॥ ८॥ कुटीचकबहूदकयोर्मानुषप्रणवः हंसपरमहंसयोरन्तरप्रणवः । तुरीयातीतावधूतयोर्ब्रह्म प्रणवः ॥९ कुटीचक एवं बहूदक को मानुष प्रणव अर्थात् साधारण-बाह्य प्रणव (ॐ कार) का ध्यान करने का नियम है। हंस और परमहंस को आन्तरिक (मानसिक) प्रणव का तथा तुरीयातीत और अवधूत नामक संन्यासियों को ब्रह्मस्वरूप प्रणव का ध्यान करने का नियम बतलाया गया है॥ ९॥ कुटीचकबहूदकयोः श्रवणं हंसपरमहंसयोर्मननं तुरीयातीतावधूतयोर्निदिध्यासः । सर्वेषामात्मानुसन्धानं विधिरिति ॥ १०॥ कुटीचक एवं बहूदक को श्रवण करने का अधिकार प्राप्त है। हंस एवं परमहंस का मुख्य साधन चिन्तन-मनन और तुरीयातीत एवं अवधूत का मुख्य साधन निदिध्यासन करना है। इन सभी का एकमात्र लक्ष्य अपनी आत्मा का अनुसंधान करना ही होता है॥ १०॥ एवं मुमुक्षुः सर्वदा संसारतारकं तारकमनुस्मरञ्जीवन्मुक्तो वसेदधिकारविशेषेण कैवल्य- प्राप्त्युपायमन्विष्येद्यतिरित्यपनिषत् ॥ ११ ॥ इस प्रकार सभी को मुक्ति के लिए सतत प्रयत्न करते रहना चाहिए और सांसारिक विषय-वासनाओं से मुक्ति दिलाने वाले तारक मंत्र (ॐ कार) का चिन्तन करते हुए जीवन्मुक्त होकर विचरण करते रहना चाहिए। उसे अधिकार विशेष के आधार पर निरन्तर कैवल्य प्राप्ति के उपाय के लिए प्रयत्न करते रहना चाहिए॥ ११॥ ॥ अष्टमोपदेशः ॥ अथ हैनं भगवन्तं परमेष्ठिनं नारदः पप्रच्छ संसारतारकं प्रसन्नो ब्रूहीति। तथेति परमेष्ठी वक्तुमुपचक्रमे ओमिति ब्रह्मेति व्यष्टिसमष्टिप्रकारेण। का व्यष्टिः का समष्टिः संहारप्रणवः सृष्टिप्रणवश्चान्तर्बहिश्चोभयात्मकत्वात्रिविधो ब्रह्मप्रणवः । अन्तःप्रणवो व्यावहारिकप्रणवः । बाह्यप्रणव आर्षप्रणवः। उभयात्मको विराट्रणवः। संहारप्रणवो ब्रह्मप्रणवोऽर्धमात्राप्रणवः ॥१॥ इसके पश्चात् भगवान् ब्रह्माजी से देवर्षि नारद ने पुनः प्रश्न किया- 'हे भगवन्! जन्म-मरण के चक्र से पार लगाने वाला कौन सा मंत्र है? मैं आपकी शरण में आया हूँ, कृपया बताने का अनुग्रह करें।' भगवान् ब्रह्मा जी ने 'तथास्तु' कहकर उपदेश देना शुरू किया। 'हे वत्स नारद ! 'ॐकार' ही तारक मंत्र है, यही ब्रह्म का स्वरूप है। व्यष्टि और समष्टि दोनों तरह से ही ॐकार का ध्यान करना चाहिए। देवर्षि नारद ने पुनः प्रश्न किया- 'पितामह ! व्यष्टि और समष्टि का अभिप्राय क्या है? कृपया बताने का अनुग्रह करें। तदनन्तर प्रजापति ब्रह्मा जी ने कहा- 'व्यष्टि और समष्टि ब्रह्म-प्रणव के अंग-अवयव हैं। एक ही ब्रह्म-प्रणव के तीन भेद माने जाते हैं- प्रथम संहार-प्रणव, द्वितीय सृष्टि-प्रणव और तृतीय उभयात्मक-प्रणव। उभयात्मक प्रणव के दो रूप अन्तः एवं बाह्य हैं। इस कारण उसे उभयात्मक कहते हैं। अन्तः प्रणव का स्वरूप अगले मंत्र में कहेंगे। उपर्युक्त