१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६७ नारदपरिव्राजकोपनिषद्
ब्रह्म-प्रणव का एक भेद व्यावहारिक प्रणव है। व्यष्टि प्रणव का द्वितीय नाम बाह्य-प्रणव है। इन चारों के अतिरिक्त एक आर्ष-प्रणव भी है। वही विराट् प्रणव के नाम से बतलाया गया है। संहार प्रणव ब्रह्मादि से प्रतिष्ठित होने के कारण ही ब्रह्म-प्रणव कहा गया है। स्थूल आदि भेद से परिपूर्ण अकारादि चार मात्राएँ जिस ॐकार का स्वरूप हैं, उसी मात्रा चतुष्टयात्मक प्रणव को अर्द्धमात्रा प्रणव भी कहा जाता है ॥ १ ॥ ओमिति ब्रह्म। ओमित्येकाक्षरमन्तःप्रणवं विद्धि। स चाष्टधा भिद्यते। अकारोकारमका- रार्धमात्रानादबिन्दुकलाशक्तिश्चेति। तत्र चत्वार अकारश्चायुतावयवान्वित उकारः सहस्रावय- वान्बितो मकारः शतावयवोपेतोऽर्धमात्राप्रणवोऽनन्तावयवाकारः। सगुणो विराट्प्रणवः संहारो निर्गुणप्रणव उभयात्मकोत्पत्तिप्रणवो यथाप्लुतो विराट्प्लुत प्लुतःसंहारः ॥ २ ॥ अब अन्तः प्रणव के स्वरूप का वर्णन करते हैं। यह प्रणव (ॐ) ही ब्रह्म है। 'इस अन्तः प्रणव को ही एकाक्षर रूप मंत्र जानो।' यह आठ भागों में विभाजित है। इस ॐकार (प्रणव) के अकार, उकार, मकार, अर्धमात्रा, नाद, बिन्दु, कला और शक्ति ही आठ भेदों के रूप हैं। यह प्रणव मात्र चार-चार मात्राओं से ही संयुक्त नहीं है, उसकी एक-एक मात्रा भी कई-कई भेदों से युक्त है। केवल अकार ही दस सहस्र अंग- अवयवों से परिपूर्ण है। उकार के एक सहस्र तथा मकार के एक सौ अंग हैं। ऐसे ही अर्ध मात्रा-प्रणव भी अनन्त अंग-अवयवों से युक्त है। विराट् प्रणव सगुण एवं संहार प्रणव निर्गुण माना गया है। सृष्टि प्रणव सगुण- निर्गुण दोनों से ही सम्बन्धित है। विराट् प्रणव अकारादि चार मात्राओं की समष्टि वाला कहा गया है और संहार प्रणव प्लुत-प्लुत अर्थात् चतुर्थ मात्राओं से युक्त अर्धमात्रा स्वरूप है॥ २॥ विराट्प्रणवः षोडशमात्रात्मकः षट्त्रिंशत्तत्वातीतः। षोडशमात्रात्मकत्वं कथमित्युच्यते। अकारः प्रथमोकारो द्वितीया मकारस्तृतीयार्धमात्रा चतुर्थी नादः पञ्चमी बिन्दुः षष्ठी कला सप्तमी कलातीताष्टमी शान्तिर्नवमी शान्त्यतीता दशमी उन्मन्येकादशी मनोन्मनी द्वादशी पुरी त्रयोदशी मध्यमा चतुर्दशी पश्यन्ती पञ्चदशी परा षोडशी पुनश्चतुःषष्टिमात्रा प्रकृतिपुरुषद्वैविध्य- मासाद्याष्टाविंशत्युत्तरभेदमात्रास्वरूपमासाद्य सगुणनिर्गुणत्वमुपेत्यैकोऽपि ब्रह्मप्रणवः ॥ ३ ॥ विराट् प्रणव सोलह मात्राओं से संयुक्त होता है। इस प्रणव को ३६ प्रकार के तत्त्वों से भी परे कहा गया है। 'अ' कार इस ॐ कार की प्रथम मात्रा है। 'उकार' द्वितीय, मकार तृतीय, चतुर्थ अर्द्धमात्रा, पञ्चम नाद, षष्ठ बिन्दु, सप्तम कला, अष्टम कलातीता, नवम शांति, दशम शान्त्यतीता, एकादश उन्मनी, द्वादश मनोन्मनी, त्रयोदश पुरी (बैखरी), चतुर्दश मध्यमा, पश्यन्ती पञ्चदश एवं षोडश परा मात्रा है। यह सोलह मात्राओं से संयुक्त ब्रह्म-प्रणव ओत, अनुज्ञात, अनुज्ञा एवं अविकल्प रूप चतुर्विध तुरीय से भिन्न न होने के कारण फिर से चौंसठ मात्राओं से युक्त हो जाता है। यह प्रणव ही प्रकृति एवं पुरुष रूप से पुनः दो भेदों को पाकर एक सौ अट्ठाईस मात्राओं से युक्त स्वरूप को ग्रहण करता है। इस तरह एक होकर भी ब्रह्म-प्रणव दृष्टि-भेद से अनेकविध साकार एवं निराकार स्वरूप को प्राप्त कर लेता है ॥ ३ ॥ सर्वाधारः परंज्योतिरेष सर्वेश्वरो विभुः । सर्वदेवमयः सर्वप्रपञ्चाधारगर्भितः ॥ ४ ॥ सर्वाक्षरमयः कालः सर्वागममयः शिवः । सर्वश्रुत्युत्तमो मृग्यः सकलोपनिषन्मयः ॥ ५ ॥ भूतं भव्यं भविष्यद्यत्त्रिकालोदितमव्ययम् । तदप्योंकारमेवायं विद्धि मोक्षप्रदायकम् ॥ ६ ॥ तमेवात्मानमित्येतद्ब्रह्मशब्देन वर्णितम् । तदेकममृतमजरमनुभूय तथोमिति ॥ ७ ॥ सशरीरं समारोप्य तन्मयत्वं तथोमिति । त्रिशरीरं तमात्मानं परं ब्रह्म विनिश्चिनु ॥ ८ ॥