भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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उपदेश ८ मन्त्र १६ १६८ ( ॐकार रूप प्रणव को परब्रह्म स्वरूप कहा गया है। वह अविनाशी ब्रह्म कैसा है ? इसका वर्णन करते हैं।) ब्रह्म-ॐकार रूप अविनाशी परमात्मतत्त्व सबका आश्रयभूत एवं परम प्रकाशस्वरूप है। यह ॐ कार ही समस्त प्राणियों का ईश्वर एवं सर्वत्र व्यापक है। समस्त देवगण इन्हीं के प्रतिरूप हैं। सभी तरह के प्रपञ्चों का आधार प्रकृति भी इन्हीं के गर्भ में है। ये प्रणव ही सर्वाक्षर (वर्णमाला के पचास वर्ण एवं उनके माध्यम से बोध्य अर्थ आदि) स्वरूप हैं। ये कालरूप, सभी शास्त्रों से युक्त एवं कल्याण स्वरूप हैं। समस्त श्रुतियों में श्रेष्ठतत्त्व पुरुषोत्तमरूप से इनका ही निरन्तर अनुसंधान करना चाहिए। सभी उपनिषदों के वाच्यार्थ यही हैं। यही सर्व कालरूप हैं तथा भूत, वर्तमान एवं भविष्यत् युक्त त्रिकालात्मक जगत् और तीनों भुवनों से भी ऊपर जो शाश्वत तत्त्व है, वह सभी कुछ इस ओंकार का ही प्रतिरूप है। इस ओंकार को ही मुक्ति प्रदान करने वाला मानना चाहिए। इस ॐ कार का अर्थ भूत अविनाशी परब्रह्म ही आत्मारूप है। उस ब्रह्म का अन्तरात्मा के साथ प्रणव के वाच्यार्थरूप से एकीभाव करके वही एकमात्र (अद्वितीय, अनुपम), मृत्युरहित एवं अमृतरूप अविनाशी तत्त्व 'ॐ' है, ऐसा अनुभव करना चाहिए। इस अनुभव के बाद उस परमात्मारूप ॐ कार में स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण शरीरों वाले इस सम्पूर्ण दृश्य-प्रपञ्च का आरोप करे (अर्थात् एक मात्र परमात्मा ही सत्यरूप है, ऐसा अनुभव करना चाहिए)। इसी प्रकार आत्मा एवं परमात्मा में दृढ़ एकभाव प्रतिष्ठित करके आत्मस्वरूप परब्रह्म का ध्यान करते हुए सतत अभ्यास करते रहना चाहिए ॥ ४-८ ॥ परं ब्रह्मानुसंदध्याद्विश्वादीनां क्रमः क्रमात्। स्थूलत्वात्स्थूलभुक्त्वाच्च सूक्ष्मत्वात्सूक्ष्म भुक् परम् ॥९ ऐक्यत्वानन्दभोगाच्च सोऽयमात्मा चतुर्विधः। चतुष्पाज्जागरितः स्थूलः स्थूलप्रज्ञो हि विश्वभुक् ॥ एकोनविंशतिमुखः साष्टाङ्गः सर्वगः प्रभुः। स्थूलभुक् चतुरात्माथ विश्वो वैश्वानरः पुमान् ॥११ ॥ विश्वजित्प्रथमः पादः स्वप्नस्थानगतः प्रभुः। सूक्ष्मप्रज्ञः स्वतोऽष्टाङ्ग एको नान्यः परंतपः ॥ १२ ॥ सूक्ष्मभुक् चतुरात्माथ तैजसो भूतराडयम् । हिरण्यगर्भः स्थूलोऽन्तर्द्वितीयः पाद उच्यते ॥ १३ ॥ कामं कामयते यावद्यत्र सुप्तो न कंचन। स्वप्नं पश्यति नैवात्र तत्सुषुप्तमपि स्फुटम् ॥ १४ ॥ एकीभूतः सुषुप्तस्थः प्रज्ञानघनवान्सुखी । नित्यानन्दमयोऽप्यात्मा सर्वजीवान्तरस्थितः ॥ १५ ॥ तथाप्यानन्दभुक् चेतोमुखः सर्वगतोऽव्ययः । चतुरात्मेश्वरः प्राज्ञस्तृतीयः पादसंज्ञितः ॥ १६ ॥ अब क्रमानुसार विश्व, तैजस आदि के वाचक प्रणव की मात्राओं के क्रम का वर्णन किया जा रहा है। स्थूल अर्थात् विराट् जगद्रूप एवं उसका भोक्ता तथा सूक्ष्म जगद्रूप सूक्ष्म जगत् का उपभोक्ता होने के कारण एकमात्र आनन्दस्वरूप तथा आनन्द मात्र का उपभोक्ता होने के कारण इन तीनों की अपेक्षा भी विशेष लक्षणों से युक्त होने के कारण वह आत्मा चार भेदों वाला है। यह चार पाद ही उसके चार भेद हैं, इस कारण वह पादों से संयुक्त है। जाग्रत्-अवस्था एवं उससे उपलक्षित होने वाला यह जगत् ही जिनका शरीर है, जो पूरे विश्व में व्याप्त हो रहे हैं, जिनका विवेक इस स्थूल जगत् में चतुर्दिक् फैला है, जो इस समस्त जगत् के रक्षक हैं, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण तथा चार अन्तःकरण आदि ये सभी उन्नीस समष्टि कारण ही जिनके मुख हैं, आठ लोक, (पाताल, भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः एवं सत्यम्) ही जिनके अवयव हैं। जो इस स्थूल जगत् के उपभोक्ता हैं। जिनकी स्थूल, सूक्ष्म, कारण एवं साक्षी रूप में अभिव्यक्ति होती है, वही सर्वव्यापी अखिल विश्वरूप वैश्वानर पुरुष ही परब्रह्म के प्रथम पाद कहे गये हैं। चारों अवस्थाओं में से स्वप्नावस्था तथा उस अवस्था के द्वारा उपलक्षित सूक्ष्म जगत् में व्याप्त परब्रह्म सूक्ष्मप्रज्ञ हैं। उनका विज्ञान स्थूल जगत् की अपेक्षा सूक्ष्म जगत् में व्याप्त हो रहा है। स्वयं वे ही पूर्व में कहे हुए आठ अङ्गों से सम्पन्न हैं। काम, क्रोधादि समस्त रिपुओं को तप्त करने में समर्थ हे नारद ! वे स्वप्नलोक में एकाकी ही हैं, उनके अतिरिक्त अन्य दूसरा कोई नहीं