भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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१६९ नारदपरिव्राजकोपनिषद् है। वे सूक्ष्म जगत् के सूक्ष्म तत्त्वों की अनुभूति एवं पालन करने वाले हैं। उनके भी पूर्व की भाँति स्थूल- सूक्ष्मादि भेद से युक्त चार स्वरूप हैं। उन्हें ही तैजस पुरुष कहते हैं; क्योंकि वे तेजस्वरूप एवं प्रकाश के स्वामी हैं। वे सभी प्राणियों के स्वामी हिरण्यगर्भ हैं, पूर्व में कहे हुए वैश्वानर तो स्थूल हैं; किन्तु अन्तः प्रदेश में प्रतिष्ठित होने के कारण हिरण्यगर्भ सूक्ष्म कहे गये हैं। इन्हें परब्रह्म परमात्मा का द्वितीय पाद कहा जाता है। सुषुप्तावस्था में स्थित पुरुष किसी भी तरह का स्वप्न नहीं देखता और न ही किसी भोग की कामना करता है। इस प्रकार की सुषुप्ति तथा उसके द्वारा उपलक्षित सम्पूर्ण विश्व की प्रलयावस्था ही जिनका शरीर है, अर्थात् समष्टि कारणतत्त्व में जिनकी स्थिति है, जो एकीभूत (अनुपम) हैं, जिनकी अभी विभिन्न रूपों में अभिव्यक्ति नहीं हुई है, जो घनीभूत प्रज्ञान से सम्पन्न हैं, आनन्दमय हैं, नित्यानन्द स्वरूप हैं, समस्त प्राणियों के अन्तः में विद्यमान अन्तर्यामी आत्मा हैं तथा अपने स्वरूपभूत आनन्द मात्र का उपभोग करने में समर्थ हैं, चिन्मय प्रकाश ही जिन परमात्मा का मुख है, जो सर्वत्र व्याप्त एवं शाश्वत हैं, ओत, अनुज्ञातृ, अनुज्ञा एवं अविकल्प आदि इन चारों रूपों में जिनकी अभिव्यक्ति है, वे ईश्वर ही प्राज्ञ नाम से परमात्मा के तृतीय पाद के रूप में जाने जाते हैं॥ ९-१६॥ एष सर्वेश्वरश्चैष सर्वज्ञः सूक्ष्मभावनः। एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ ॥ १७॥ भूतानां त्रयमप्येतत्सर्वोपरमबाधकम्। तत्सुषुप्तं हि यत्स्वप्नं मायामात्रं प्रकीर्तितम् ॥ १८॥ ये परब्रह्म ही समस्त स्थावर-जंगम, भूत-प्राणियों के स्वामी हैं। ये सभी कुछ जानने में समर्थ हैं। सूक्ष्मरूप से चिन्तन करने योग्य परब्रह्म ही सबके अन्तर्यामी एवं आत्मस्वरूप हैं। सम्पूर्ण जगत् के कारणरूप हैं तथा समस्त भूत-प्राणियों की उत्पत्ति, पालन एवं विनाश के स्थल भी यही हैं। जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओं में परिलक्षित होने वाला यह संसार भी सुषुप्ति रूप ही है। यह सभी प्रकार की उपरति में अवरोधक ही बना रहता है। इसी तरह यह त्रिविध जगत् स्वप्नरूप ही है; क्योंकि यहाँ पर वस्तु का प्रायः विपरीत ज्ञान ही होता है। इतना ही नहीं, यहाँ पर हर वस्तु कुछ की कुछ दिखाई पड़ने के कारण स्वप्नवत् मायामय ही है॥ १७-१८॥ चतुर्थश्चतुरात्मापि सच्चिदेकरसो ह्ययम्। तुरीयावसितत्वाच्च ऐकैकत्वानुसारतः ॥१९ ॥ ओतानुज्ञात्रनुज्ञातृविकल्पज्ञानसाधनम्। विकल्पत्रयमत्रापि सुषुप्तं स्वप्नमान्तरम्। मायामात्रं विदित्वैवं सच्चिदेकरसो ह्यथ ॥ २०॥ उपर्युक्त त्रिपादों के अतिरिक्त चतुर्थ पाद तुरीय है। वह इन चार भेदों-ओत, अनुज्ञातृ, अनुज्ञा एवं अविकल्प के कारण चार रूपों से युक्त है। उसे तुरीयपाद कहा गया है, यही सच्चिदानन्दमय है-इसके चारों भेद तुरीय ही कहे गये हैं, क्योंकि प्रत्येक रूप का तुरीय में ही पर्यवसान (विलय) होता है। इस चतुर्थ तुरीयपाद में भी जो ओत, अनुज्ञातृ एवं अनुज्ञारूप तीन प्रकार के भेद हैं, वे विकल्प-ज्ञान के साधन रूप हैं। अतः इन तीन विकल्पों को भी यहाँ पर पहले की भाँति सुषुप्ति एवं मनोमय स्वप्नवत् मायामय ही जानना चाहिए। ऐसा समझकर यह निश्चय कर लेना चाहिए कि इन भेदों से परे जो निर्विकल्परूप तुरीय-तुरीय परब्रह्म ही एकमात्र सच्चिदानन्द स्वरूप हैं। ऐसा निश्चय कर लेना ही श्रेयस्कर है॥ १९-२०॥ विभक्तो ह्ययमादेशो न स्थूलप्रज्ञमन्वहम्। न सूक्ष्मप्रज्ञमत्यन्तं न प्रज्ञं न क्वचिन्मुने ॥ २१॥ नैवाप्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञमान्तरम्। नाप्रज्ञमपि न प्रज्ञाघनं चादृष्टमेव च ॥२२॥ तदलक्षणमग्राह्यं यदव्यवहार्यमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शिवं शान्तमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते। स ब्रह्मप्रणवः स विज्ञेयो नापरस्तुरीयः सर्वत्र भानुवन्मुमुक्षूणामाधारः स्वयंज्योतिर्ब्रह्माकाशः सर्वदा विराजते परंब्रह्मात्वादित्युपनिषत् ॥ २३॥ इसके पश्चात् पुनः ब्रह्मा जी ने कहा-'हे नारद! श्रुति का यह स्पष्ट आदेश है कि जो सदैव न तो स्थूलज्ञ