भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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उपदेश ९ मन्त्र ५ १७० है, न सूक्ष्म का ही ज्ञाता है और न ही दोनों का ज्ञाता है, जो न तो सर्वाधिक जानने वाला है और न ही बिल्कुल जानने वाला है, न अन्तःप्रज्ञ अर्थात् अन्तः का ज्ञान रखने वाला है और न ही बहिः प्रज्ञ (स्थूल जगत् का) ज्ञान रखने वाला है, जिसे नेत्रों से नहीं देखा जा सकता (क्योंकि उसका कोई रूप नहीं है), जो कभी पकड़ में नहीं आ सकता और न ही व्यवहार में लाया जा सकता है। जो अचिन्त्य है, जिसे किसी परिभाषा में आबद्ध नहीं किया जा सकता। एकमात्र आत्मसत्ता की प्रतीति ही जिसका सार अथवा स्वरूप है, जिसमें प्रपञ्च (माया) का अभाव है। ऐसा परम कल्याणकारी शान्त-अद्वितीय तत्त्व ही उन पूर्ण परब्रह्म का चतुर्थ पाद है, ऐसा ज्ञानीजन मानते हैं। वह ब्रह्म-प्रणव है; वही जानने और समझने के योग्य है, दूसरा नहीं। सभी को प्रकाश देने वाला सूर्य के सदृश वही मुमुक्षुजनों का एकमात्र जीवन रक्षक है। स्वयं प्रकाश परम ब्रह्म आकाश रूप है। परम ब्रह्म होने के कारण ही वह सदैव सर्वत्र विद्यमान है। यही उपनिषद् (रहस्यमयी विद्या) है॥ २१-२३॥ ॥ नवमोपदेशः ॥ अथ ब्रह्मस्वरूपं कथमिति नारदः पप्रच्छ। तं होवाच पितामहः किं ब्रह्मस्वरूपमिति। अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति ये विदुस्ते पशवो न स्वभावपशवस्तमेवं ज्ञात्वा विद्वान्मृत्युमुखात्प्र- मुच्यते नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥ १ ॥ इसके पश्चात् नारद जी ने पुनः प्रश्न किया- 'हे भगवन् ! ब्रह्म का स्वरूप कैसा है, कृपा करके बताने का अनुग्रह करें? ऐसा श्रवण कर पितामह ब्रह्मा जी ने कहा-हे वत्स नारद ! ब्रह्म और क्या है, अपना निजस्वरूप आत्मा ही तो ब्रह्म है। ब्रह्म दूसरा और मैं दूसरा हूँ-ऐसा जो भी लोग समझते हैं, वे पशुवत् हैं, जो स्वभाववश पशुयोनि में ही प्रादुर्भूत हुए हैं, उन्हीं का नाम पशु है। उन परम प्रभु परमेश्वर को जो ज्ञानी पुरुष इस तरह सर्वात्मा एवं सर्वरूपमय जानता है, वह सदा के लिए मृत्यु के मुख से छूट जाता है। एकमात्र परमात्मसत्ता का सद्ज्ञान ही है, जो मुक्ति (मोक्ष) प्रदान कराने में सर्वसमर्थ है॥ १ ॥ कालः स्वभावो नियतिर्यदृच्छा भूतानि योनिः पुरुष इति चिन्त्यम्। संयोग एषां न त्वात्मभावादात्मा ह्यनीशः सुखदुःखहेतोः ॥ २ ॥ ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन्देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् । यः कारणानि निखिलाानि तानि कालात्मयुक्तान्यधितिष्ठत्येकः ॥ ३ ॥ तमेकस्मिंस्त्रिवृतं षोडशान्तं शताध्रारं विंशतिप्रत्यराभिः। अष्टकैः षड्भिर्विश्वरूपैकपाशं त्रिमार्गभेदं द्विनिमित्तैकमोहम् ॥ ४ ॥ पञ्चस्रोतोऽम्बुं पञ्चयोन्युग्रवक्त्रां पञ्चप्राणोर्मिं पञ्चबुद्ध्यादिमूलाम्। पञ्चावर्तां पञ्चदुःखौघवेगां पञ्चाशद्भेदां पञ्चपर्वामधीमः ॥ ५ ॥ (परमात्म विषयक परस्पर चर्चा करने वाले कुछ जिज्ञासु जन कहते हैं कि) 'क्या काल, स्वभाव, निश्चित ही फल प्रदान करने वाला कर्म, आकस्मिक घटना, पाँचों महाभूत अथवा जीवात्मा (इस जगत् का) कारण रूप है? इस विषय पर चिन्तन करना चाहिए। काल आदि का समूह भी इस नश्वर जगत् का कारण नहीं हो सकता; क्योंकि यह चैतन्य आत्मा के आश्रित है। जीवात्मा भी इस नाशवान् जगत् का कारण नहीं हो सकता, क्योंकि वह सुख-दुःख के कारणभूत प्रारब्ध-कर्म के आश्रित है। ऐसा विचार करते हुए उन्होंने ध्यानावस्था में