१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
उपदेश ९ मन्त्र ५ १७० है, न सूक्ष्म का ही ज्ञाता है और न ही दोनों का ज्ञाता है, जो न तो सर्वाधिक जानने वाला है और न ही बिल्कुल जानने वाला है, न अन्तःप्रज्ञ अर्थात् अन्तः का ज्ञान रखने वाला है और न ही बहिः प्रज्ञ (स्थूल जगत् का) ज्ञान रखने वाला है, जिसे नेत्रों से नहीं देखा जा सकता (क्योंकि उसका कोई रूप नहीं है), जो कभी पकड़ में नहीं आ सकता और न ही व्यवहार में लाया जा सकता है। जो अचिन्त्य है, जिसे किसी परिभाषा में आबद्ध नहीं किया जा सकता। एकमात्र आत्मसत्ता की प्रतीति ही जिसका सार अथवा स्वरूप है, जिसमें प्रपञ्च (माया) का अभाव है। ऐसा परम कल्याणकारी शान्त-अद्वितीय तत्त्व ही उन पूर्ण परब्रह्म का चतुर्थ पाद है, ऐसा ज्ञानीजन मानते हैं। वह ब्रह्म-प्रणव है; वही जानने और समझने के योग्य है, दूसरा नहीं। सभी को प्रकाश देने वाला सूर्य के सदृश वही मुमुक्षुजनों का एकमात्र जीवन रक्षक है। स्वयं प्रकाश परम ब्रह्म आकाश रूप है। परम ब्रह्म होने के कारण ही वह सदैव सर्वत्र विद्यमान है। यही उपनिषद् (रहस्यमयी विद्या) है॥ २१-२३॥ ॥ नवमोपदेशः ॥ अथ ब्रह्मस्वरूपं कथमिति नारदः पप्रच्छ। तं होवाच पितामहः किं ब्रह्मस्वरूपमिति। अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति ये विदुस्ते पशवो न स्वभावपशवस्तमेवं ज्ञात्वा विद्वान्मृत्युमुखात्प्र- मुच्यते नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥ १ ॥ इसके पश्चात् नारद जी ने पुनः प्रश्न किया- 'हे भगवन् ! ब्रह्म का स्वरूप कैसा है, कृपा करके बताने का अनुग्रह करें? ऐसा श्रवण कर पितामह ब्रह्मा जी ने कहा-हे वत्स नारद ! ब्रह्म और क्या है, अपना निजस्वरूप आत्मा ही तो ब्रह्म है। ब्रह्म दूसरा और मैं दूसरा हूँ-ऐसा जो भी लोग समझते हैं, वे पशुवत् हैं, जो स्वभाववश पशुयोनि में ही प्रादुर्भूत हुए हैं, उन्हीं का नाम पशु है। उन परम प्रभु परमेश्वर को जो ज्ञानी पुरुष इस तरह सर्वात्मा एवं सर्वरूपमय जानता है, वह सदा के लिए मृत्यु के मुख से छूट जाता है। एकमात्र परमात्मसत्ता का सद्ज्ञान ही है, जो मुक्ति (मोक्ष) प्रदान कराने में सर्वसमर्थ है॥ १ ॥ कालः स्वभावो नियतिर्यदृच्छा भूतानि योनिः पुरुष इति चिन्त्यम्। संयोग एषां न त्वात्मभावादात्मा ह्यनीशः सुखदुःखहेतोः ॥ २ ॥ ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन्देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् । यः कारणानि निखिलाानि तानि कालात्मयुक्तान्यधितिष्ठत्येकः ॥ ३ ॥ तमेकस्मिंस्त्रिवृतं षोडशान्तं शताध्रारं विंशतिप्रत्यराभिः। अष्टकैः षड्भिर्विश्वरूपैकपाशं त्रिमार्गभेदं द्विनिमित्तैकमोहम् ॥ ४ ॥ पञ्चस्रोतोऽम्बुं पञ्चयोन्युग्रवक्त्रां पञ्चप्राणोर्मिं पञ्चबुद्ध्यादिमूलाम्। पञ्चावर्तां पञ्चदुःखौघवेगां पञ्चाशद्भेदां पञ्चपर्वामधीमः ॥ ५ ॥ (परमात्म विषयक परस्पर चर्चा करने वाले कुछ जिज्ञासु जन कहते हैं कि) 'क्या काल, स्वभाव, निश्चित ही फल प्रदान करने वाला कर्म, आकस्मिक घटना, पाँचों महाभूत अथवा जीवात्मा (इस जगत् का) कारण रूप है? इस विषय पर चिन्तन करना चाहिए। काल आदि का समूह भी इस नश्वर जगत् का कारण नहीं हो सकता; क्योंकि यह चैतन्य आत्मा के आश्रित है। जीवात्मा भी इस नाशवान् जगत् का कारण नहीं हो सकता, क्योंकि वह सुख-दुःख के कारणभूत प्रारब्ध-कर्म के आश्रित है। ऐसा विचार करते हुए उन्होंने ध्यानावस्था में
प्रतिष्ठित होकर अपने गुणों से आवृत उन परब्रह्म की स्वरूपभूता अचिन्त्य शक्ति का साक्षात्कार किया, जो परब्रह्म अकेले ही काल से लेकर आत्मा तक अर्थात् पूर्व में कहे हुए सभी कारणों पर शासन करते हैं। उस एक नेमि वाले, तीन घेरों से युक्त, षोडश शिरों से संयुक्त, पचास अरों से परिपूर्ण, बीस सहयोगी अरों से युक्त एवं छः अष्टकों से पूर्ण, अनेक रूपों वाले एक ही पांश से संयुक्त, मार्ग के तीन भेदों से युक्त तथा दो निमित्त एवं मोह-रूपी एक नाभि (केन्द्र) से युक्त चक्र को उन जिज्ञासु जनों ने देखा। यहाँ विश्व व्यवस्था को एक चक्र (पहिए) के रूप में वर्णित किया गया है। नेमिचक्र को बाँधे रखने वाली एक परिधि (प्रकृति) तथा तीन वृत्त- तीन गुण (सत, रज, तम) हैं। परिधि के अन्त-सिरे का जोड़ सोलह कलाएँ हैं, प्रश्नोपनिषद् के छठे प्रश्न के अन्तर्गत चौथे एवं पाँचवें मन्त्र में इनका वर्णन है। ५० अरे (विपर्यय, अशक्ति, तुष्टि आदि ५० प्रत्यय) अन्तःकरण की वृत्तियों के ५० भेद तथा २० सहायक अरे (१० इन्द्रियाँ, ५ विषय एवं ५ प्राण) कहे गये हैं। चक्र में अष्टक किसे कहा गया है, यह स्पष्ट नहीं हैं। इन छः के आठ-आठ भेद कहे गए हैं-प्रकृति शरीरगत धातु, सिद्धियाँ, भय, देव योनियाँ तथा विशिष्ट गुण तीन मार्ग-धर्म, अधर्म एवं ज्ञान मार्ग तथा दो निमित्त-पाप और पुण्य कर्म हैं। यह सब मोहरूपी नाभिक को केन्द्र मानकर घूम रहे हैं। पाँच स्रोतों से निःसृत होने वाले विषय रूपी जल से परिपूर्ण, पाँच स्थलों से प्रादुर्भूत होकर भय प्रदान करने वाली एवं तिर्यक् चाल से गमन करने वाली, पाँच दुःख रूपी प्रवाह के वेग से संयुक्त, पाँच पर्तों वाली तथा पचास भेदों से परिपूर्ण नदी को हम सभी लोग जानते हैं॥ ५॥ [ऋषि ने यहाँ विश्व प्रवाह को नदी के रूप में वर्णित किया है। ५ धाराएँ, ५ ज्ञानेन्द्रियाँ, ५ उद्गम, ५ तत्त्व, ५ प्राण की तरंगें, ५ भँवरें, ५ तन्मात्राएँ, ५ दुःख-गर्भ, जन्म, रोग, जरा और मृत्यु हैं। ५ विभाग-अज्ञान, अहंकार, राग, द्वेष और भय हैं। अन्तःकरण की ५० वृत्तियाँ उसके भेद हैं। उक्त दोनों उपमाओं की विस्तृत व्याख्या आचार्य शंकर के भाष्य में देखी जा सकती है।] सर्वाजीवे सर्वसंस्थे बृहन्ते तस्मिन्हंसो भ्राम्यते ब्रह्मचक्रे। पृथगात्मानं प्रेरितारं च मत्वा जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेति ॥ ६ ॥ उद्गीथमेतत्परमं तु ब्रह्म तस्मिंस्त्रियं स्वप्रतिष्ठाक्षरं च। अत्रान्तरं वेदविदो विदित्वा लीनाः परे ब्रह्मणि तत्परायणाः ॥ ७॥ संयुक्तमेतत्क्षरमक्षरं च व्यक्ताव्यक्तं भरते विश्वमीशः। अनीशश्चात्मा बध्यते भोक्तृभावाज्ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ ८ ॥ ज्ञाज्ञौ द्वावजावीशानीशावजा ह्येका भोक्तृभोगार्थयुक्ता। अनन्तश्चात्मा विश्वरूपो ह्यकर्ता त्रयं यदा विन्दते ब्रह्म ह्येतत् ॥ ९ ॥ क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एकः। तस्याभिध्यानाद्योजनात्तत्त्वभावाद्भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः ॥ १० ॥ समस्त प्राणियों के आश्रयभूत एवं जीविका स्वरूप इस विशाल ब्रह्मचक्र में जीवात्मा को भ्रमण कराया जाता है। वह स्वयं अपने-आपको एवं सभी के प्रेरणास्रोत परमात्मा को पृथक्-पृथक् जानकर उसके पश्चात् उन परब्रह्म से स्वीकृत होकर अमृत भाव को प्राप्त कर लेता है। वेद में कहे हुए ये परमात्मा ही सर्वश्रेष्ठ आश्रयभूत एवं शाश्वत अविनाशी हैं। उन परमात्म देव में तीनों लोक सन्निहित हैं। वेद के तत्त्वज्ञ महापुरुष यहाँ (हृदय क्षेत्र में) अन्तर्यामी स्वरूप में प्रतिष्ठित उन परमात्मदेव को जानकर उन्हीं में आश्रित होकर, उन आदिदेव में ही विलीन हो गये। सतत विनाश युक्त जड़वर्ग एवं अविनाशी जीवात्मा तथा इन दोनों के संयुक्त रूप व्यक्त एवं अव्यक्त रूप इस जगत् का परब्रह्म ही धारण तथा पोषण करते हैं और जीवात्मा इस जगत् के विषय-भोगों का भोक्ता होने के कारण प्रकृति के अधीन होकर इसमें आबद्ध हो जाता है और उन परमात्मदेव को जानकर सभी तरह के बन्धनों से मुक्ति प्राप्त कर लेता है। सर्वज्ञ एवं अज्ञानी, सर्वसमर्थ एवं सामर्थ्यरहित ये दो ही
उपदेश ९ मन्त्र १८ १७२ जन्मरहित शाश्वत आत्मा हैं तथा भोगभोगने वाले जीवात्मा के लिए उपयुक्त भोग्य सामग्री से संयुक्त अनादि प्रकृति एक तीसरी शक्ति के रूप में है। वे परमात्मदेव अन्तरहित, सम्पूर्ण रूपों से युक्त एवं कर्त्तापन के अभिमान से रहित हैं। जब मनुष्य इस तरह ईश्वर, जीव एवं प्रकृति-इन तीनों को ब्रह्म के रूप में प्राप्त कर लेता है, तो वह सभी तरह के बन्धनों से मुक्त हो जाता है। प्रकृति तो विनाशशील है और इसका भोक्ता जीवात्मा अमृतरूप अविनाशी है। इस विनाशशील जड़तत्त्व एवं चेतन आत्मा दोनों को एक ही ईश्वर अपने विशेष निर्देशन में रखते हैं। इस तरह से उन परमेश्वर का सदैव चिन्तन करते रहने से, मन को उन्हीं में लगाये रहने से तथा तन्मय हो जाने से मनुष्य अन्त में उन्हें प्राप्त कर लेता है। तदनन्तर सभी प्रकार की माया (प्रपञ्च) की निवृत्ति हो जाती है ॥ ६-१० ॥ ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः क्षीणैः क्लेशैर्जन्ममृत्युप्रहाणिः। तस्याभिध्यानात्तितयं देहभेदे विश्वैश्वर्यं केवल आप्तकामः ॥ ११ ॥ एतज्ज्ञेयं नित्यमेवात्मसंस्थं नातः परं वेदितव्यं हि किंचित् । भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा सर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्म ह्येतत् ॥ १२ ॥ आत्मविद्यातपोमूलं तद्ब्रह्मोपनिषत्परम् ॥ १३ ॥ उन परमात्म स्वरूप का सतत चिन्तन करने मात्र से, उन प्रकाश स्वरूप परब्रह्म को ध्यान के द्वारा जानकर मनुष्य सभी तरह के बन्धनों से मुक्ति (मोक्ष) प्राप्त कर लेता है; क्योंकि क्लेशादि विकारों का शमन हो जाने के पश्चात् जन्म-मरण का सर्वथा अभाव ही हो जाता है। इस कारण से वह देह के नष्ट होने पर तृतीय लोक अर्थात् स्वर्गलोक तक के सभी तरह के ऐश्वर्यों का परित्याग करके सर्वथा विशुद्ध तथा आप्तकाम हो जाता है। अपने ही अन्दर प्रतिष्ठित इन ब्रह्मदेव को सर्वदा जानना चाहिए। इनसे उत्कृष्ट स्मरण करने योग्य तत्त्व दूसरा और कुछ भी नहीं है। भोक्ता अर्थात् जीवात्मा, भोग्य अर्थात् जड़वर्ग एवं उनके प्रेरणास्रोत परब्रह्म को जानकर पुरुष सभी कुछ जान लेता है। इस प्रकार इन तीन भेदों में वर्णित यह सब कुछ ब्रह्ममय ही है। आत्मविद्या एवं तप ही जिस की प्राप्ति के मुख्य स्रोत (साधन) हैं, वह उपनिषदों में वर्णित श्रेष्ठ तत्त्व ही परम ईश्वर है अर्थात् दृष्टि भेद द्वारा वह ब्रह्म द्विविध अथवा त्रिविध कहा जाता है, किन्तु यथार्थ में भेद-दृष्टि अज्ञान मूलक है। इस कारण वह समस्त रूपों में एक ही परमात्मदेव विद्यमान है ॥ ११-१३ ॥ य एवं विदित्वा स्वरूपमेवानुचिन्तयंस्तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः । तस्माद्विराड्भूतं भव्यं भविष्यद्भवत्यनश्वरस्वरूपम् ॥ १४ ॥ अणोरणीयान्महतो महीयानात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् । तमक्रतुं पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमीशम् ॥ १५ ॥ अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः । स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम् ॥ १६ ॥ अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् । महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ १७ ॥ सर्वस्य धातारमचिन्त्यशक्तिं सर्वांगमान्तार्थविशेषवेद्यम् । परात्परं परमं वेदितव्यं सर्वावसानेऽन्तकृद्वेदितव्यम् ॥ १८ ॥ जो मनुष्य इस तरह से जानकर सतत अपने स्वरूपमय परब्रह्म का ही ध्यान करता रहता है, उस समदर्शी ब्रह्मज्ञानी को वहाँ क्या शोक है और क्या मोह ? इसलिए भूत, भविष्यत् एवं वर्तमान आदि इन तीनों कालों में प्रादुर्भूत होने वाला यह विराट् संसार ही अविनाशी ब्रह्ममय है। यह सूक्ष्मातिसूक्ष्म एवं महान् (बृहत्) से भी परम महान् (अति बृहत्) परब्रह्म इस प्राणी के हृदय रूपी गुहा में विद्यमान है। सबकी सृष्टि एवं सुरक्षा करने वाले परमात्मा की विशेष अनुकम्पा से जो पुरुष उस संकल्प विहीन परम ईश्वर का और उसकी महान्
१७३ नारदपरिव्राजकोपनिषद्
महिमा का भी अवलोकन कर लेता है, वह सभी प्रकार के दुःखों से मुक्त हो जाता है। वह परमेश्वर हाथ-पैर आदि से रहित होते हुए भी सभी प्रकार की वस्तुओं को प्राप्त कर लेने वाला है और शीघ्रतापूर्वक यत्र-तत्र- सर्वत्र गमन करने वाला है। नेत्र विहीन होते हुए भी सभी कुछ देखने में समर्थ है। कानों (कर्णों) से रहित होते हुए भी सभी कुछ श्रवण करने में सक्षम है। वह जानकारी प्राप्त होने वाली सभी प्रकार की वस्तुओं को जानता है, किन्तु उस महान् ईश्वर को जानने वाला कोई भी नहीं है। विद्वान् मनुष्य उसे प्राचीन एवं महान् पुरुष (पुरुषोत्तम, पुरुष श्रेष्ठ) आदि कहते हैं। जो इन नाशवान् शरीरों में नित्य एवं देहरहित होकर भी प्रतिष्ठित है। उस सर्वत्र व्याप्त महान् परमेश्वर को जान लेने पर धैर्यवान् पुरुष कभी शोकाकुल नहीं होता। वह समस्त भूत- प्राणियों का धारण-पोषण करने वाला है। उस परमेश्वर की अघटित-घटना-पटीयसी शक्ति अचिन्त्य है, समस्त शास्त्रों के सिद्धान्त रूप से स्वीकृत अर्थ विशेष-परब्रह्म के रूप में वही जानने योग्य है। परात्पर परब्रह्म के रूप में भी वही ज्ञातव्य है एवं सभी के अवसान में अर्थात् समस्त विश्व के प्रलय होने पर सबके संहार के रूप में उसी श्रेष्ठ प्रभु को जानना चाहिए ॥ १४-१८॥ कविं पुराणं पुरुषोत्तमोत्तमं सर्वेश्वरं सर्वदेवैरूपास्यम् । अनादिमध्यान्तमनन्तमव्ययं शिवाच्युताम्भोरुहगर्भभूधरम् ॥ १९ ॥ स्वेनावृतं सर्वमिदं प्रपञ्चं पञ्चात्मकं पञ्चसु वर्तमानम् । पञ्चीकृत्यानन्तभवप्रपञ्चं पञ्चीकृतस्वावयवैरसंवृतम् । परात्परं यन्महतो महान्तं स्वरूपतेजो- मयशाश्वतं शिवम् ॥ २० ॥ नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः । नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥ २१ ॥ नान्तःप्रज्ञं न बहिःप्रज्ञं न स्थूलं नास्थूलं न ज्ञानं नाज्ञानं नोभयतः प्रज्ञमग्राह्यमव्यवहार्यं स्वान्तःस्थितः स्वयमेवेति य एवं वेद स मुक्तो भवति स मुक्तो भवतीत्याह भगवान्पितामहः ॥ २२ ॥ वह कवि, जो त्रिकाल को जानने वाला है, पुराण पुरुष, सर्वोत्तम एवं पुरुष श्रेष्ठ है। वही सबका परमेश्वर तथा देवों के द्वारा उपासनीय है। आदि, मध्य एवं अन्त से परे है, वह कभी विनष्ट नहीं होता। वही शिव, विष्णु एवं कमल से प्रादुर्भूत होने वाले ब्रह्मारूपी वृक्षों को उत्पन्न करने वाला महान् पर्वत है। जो पञ्चभूतों से युक्त है और पाँच इन्द्रियों में स्थित रहता है, जिसने अनन्त जन्मों के विस्तार की परम्परा अभिवर्द्धित कर रखी है, इस समस्त प्रपञ्च को उस परमात्मा ने पञ्चमहाभूतों के रूप में प्रादुर्भूत किये हुए अपने ही अंगों द्वारा स्वयं ही फैला रखा है; फिर भी वह स्वयं पञ्चभूतों से युक्त अंगों से ढका नहीं है। वह पर से परे और महान् से भी महान् है। वह अपने स्वरूपानुसार स्वतः स्वरूप है, सनातन एवं कल्याणमय है। जो दुराचार से निवृत्त नहीं हुआ है, जिसकी इन्द्रियाँ शान्तरहित अर्थात् अपने वश में नहीं हैं, जो स्थिर चित्त नहीं हुआ है तथा जिसका मन पूर्णरूपेण शान्त नहीं हो सका है, वह इन परमात्म स्वरूप को श्रेष्ठ, पवित्र ज्ञान के द्वारा नहीं प्राप्त कर सकता है। वह पूर्ण परमेश्वर न अन्तःप्रज्ञ है, न बाह्य प्रज्ञ है, वह न स्थूल है और न ही सूक्ष्म है। वह न ज्ञानस्वरूप है और न ही वह अज्ञानी है। वह मनुष्य की पकड़ से परे तथा व्यवहार का विषय नहीं है। वह अपने अन्दर स्वयं ही विद्यमान है। जो ज्ञानी पुरुष उस अनादि परमेश्वर को इस प्रकार से जानता है, वह मुक्ति को प्राप्त कर लेता है, वह मुक्त हो जाता है। ऐसा उपदेश पितामह ब्रह्माजी ने देवर्षि नारद को प्रदान किया ॥ १९-२२ ॥ स्वस्वरूपज्ञः परिव्राट् परिव्राडेकाकी चरति भयत्रस्तसारङ्गवत्तिष्ठति । गमनविरोधं न करोति । स्वशरीरव्यतिरिक्तं सर्वं त्यक्त्वा षट्पदवृत्त्या स्थित्वा स्वरूपानुसन्धानं कुर्वन्सर्वमनन्यबुद्ध्या स्वस्मिन्नेव मत्तो भवति । स परिव्राट् सर्वक्रियाकारकनिवर्तको
उपदेश ९ मन्त्र २३ १७४ गुरुशिष्यशास्त्रादिविनिर्मुक्तः सर्वसंसारं विसृज्य चामोहितः परिव्राट् कथं निर्धनिकः सुखी धनवाञ्ज्ञानाज्ञानोभयातीतः सुखदुःखातीतः स्वयंज्योतिः प्रकाशः सर्ववेद्यः सर्वज्ञः सर्वसिद्धिदः सर्वेश्वरः सोऽहमिति। तद्विष्णोः परमं पदं यत्र गत्वा न निवर्तन्ते योगिनः। सूर्यो न तत्र भाति न शशाङ्कोऽपि न स पुनरावर्तते न स पुनरावर्तते तत्कैवल्यमित्युपनिषत् ॥ २३ ॥ जो परिव्राजक अपने निज स्वरूप को जान लेता है, वह अकेले ही विचरण करता है। वह 'यति' डरे हुए हरिण के सदृश कभी एक स्थल पर नहीं रुकता। इधर-उधर जाने के लिए यदि कोई विरोध अथवा न जाने का आग्रह करता है, तो उसे वह कभी स्वीकार नहीं करता। अपनी देह के अतिरिक्त अन्य समस्त तरह की वस्तुओं का परित्याग करके वह मधुकरी-वृत्ति से भिक्षा प्राप्त करता है। सदैव अपने निज रूप का ध्यान करते हुए उसकी सभी के प्रति अनन्य बुद्धि हो जाती है। वह समस्त प्राणियों को अपने आत्मारूप में ही समझने लगता है तथा इस तरह से वह यति अपने-आप में ही प्रतिष्ठित होकर सभी तरह के बन्धनों से मुक्ति प्राप्त कर लेता है। वह संन्यासी समस्त क्रियाओं एवं कारकों से भेद-बुद्धि का परित्याग कर देता है। गुरु, शिष्य एवं शास्त्र आदि की त्रिपुटी से भी वह मुक्त हो जाता है। सम्पूर्ण जगत् का परित्याग करके वह कभी उसके दुःख से विचलित नहीं होता है। परिव्राजक का आचरण किस तरह का हो? (इसके उत्तर में बताते हैं कि) वह लौकिक धन से विहीन होते हुए भी सर्वदा सुखी रहता है। वह ब्रह्मात्म-ज्ञान स्वरूप धन से परिपूर्ण होकर ज्ञान-अज्ञान दोनों से ऊपर उठ जाता है। सुख एवं दुःख दोनों से परे हो जाता है। वह 'यति' आत्म ज्योति से ही प्रकाश प्राप्त करता है। सभी जानने योग्य पदार्थ उसे ज्ञात हो जाते हैं। वह सब कुछ जानने में समर्थ, सभी सिद्धियों का प्रदाता एवं सभी का ईश्वर हो जाता है; क्योंकि 'सोऽहम्' (वह ब्रह्म मैं हूँ) इस महावाक्य के उपदेश में उसकी सहज उपस्थिति हो जाती है। वह परमेश्वर ही भगवान् विष्णु का परम शाश्वत धाम है, जहाँ पर जाकर योगी पुरुष वापस इस नश्वर जगत् में नहीं आते। वहाँ उस विष्णुधाम में न तो सूर्य प्रकाशित होता है और न ही चन्द्रमा अपना प्रकाश देता है। उस परम अविनाशी महान् पद को प्राप्त करने वाला वह महात्मा पुरुष इस नश्वर जगत् में पुनः वापस नहीं आता। वही एक मात्र परम कैवल्य पद है। ऐसा ही है यह उपनिषद् ॥ २३ ॥ ॐ भद्रं कर्णेभिः ............. इति शान्तिः ॥ ॥ इति नारदपरिव्राजकोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ निर्वाणोपनिषद् ॥ यह उपनिषद् ऋग्वेद से सम्बद्ध है। इसमें जीवन के परमलक्ष्य तथा आवागमन से मुक्त होने के साधनभूत 'निर्वाण' के विषय में विशद विवेचन प्रस्तुत किया गया है। इस उपनिषद् में सूत्रात्मक पद्धति द्वारा परमहंस-संन्यासी के गूढ़ सिद्धान्तों को रहस्यात्मक ढंग से विवेचित किया गया है। सर्वप्रथम परमहंस संन्यासी का परिचय दिया गया है, तत्पश्चात् दीक्षा, देवदर्शन, क्रीड़ा, गोष्ठी, भिक्षा, आचरण आदि का परमहंस संन्यासी के लिए क्या स्वरूप है, विवेचना की गई है। आगे चलकर पुनः मठ, ज्ञान, ध्येय, कन्था (गुदड़ी), आसन, पटुता, तारक उपदेश, नियम, अनियामकत्व, यज्ञोपवीत, शिखा तथा मोक्ष आदि की वास्तविक स्थिति संन्यासी के लिए क्या है? इसका निरूपण करते हुए कहा गया है कि यही 'निर्वाण' का तत्त्वदर्शन है। यह तत्त्वदर्शन श्रद्धा-समर्पण युक्त शिष्य या पुत्र को ही प्रदान करना चाहिए। सामान्य व्यक्ति को इस तत्त्वदर्शन से कोई लाभ नहीं प्राप्त हो पाता। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ वाङ्मे मनसि............... इति शान्तिः। (द्रष्टव्य-आत्मबोधोपनिषद्) अथ निर्वाणोपनिषदं व्याख्यास्यामः। परमहंसः सोऽहम्। परिव्राजकाः पश्चिमलिङ्गाः। मन्मथक्षेत्रपालाः। गगनसिद्धान्तः। अमृतकल्लोलनदी। अक्षयं निरञ्जनम्। निःसंशयः ऋषिः। निर्वाणो देवता। निष्कुलप्रवृत्तिः। निष्केवलज्ञानम्॥ १-११॥ अब निर्वाणोपनिषद् का वर्णन करते हैं। मैं परमहंस हूँ। मैं वही (ब्रह्म) हूँ। परिव्राजक (संन्यासी) पश्चिमलिङ्ग (अन्तिम स्थिति रूप चिह्न युक्त) होते हैं। कामदेव के लिए क्षेत्रपाल जैसे (अर्थात् कामदेव को रोकने में समर्थ) होते हैं। वे गगन सिद्धान्त वाले अर्थात् आकाश की तरह निर्लिप्त और व्यापक सिद्धान्त वाले होते हैं। वे अमृत तरंगों वाली (आत्मारूपी) नदी के समान होते हैं। उनका स्वरूप अक्षय निरञ्जन अर्थात् अनश्वर और निर्लेप होता है। 'निःसंशय' ही उनका ऋषि है, निर्वाण ही उनका देवता है। उनकी प्रवृत्ति निष्कुल (स्वकुल-गोत्र से परे) होती है। उनका ज्ञान समस्त उपाधियों से मुक्त होता है। ॥ १-११॥ ऊर्ध्वाम्नायः। निरालम्बपीठः। संयोगदीक्षा। वियोगोपदेशः। दीक्षासंतोषपावनं च। द्वाद- शादित्यावलोकनम्। विवेकरक्षा। करुणैव केलिः। आनन्दमाला। एकान्तगुहायां मुक्तासनसु- खगोष्ठी। अकल्पितभिक्षाशी। हंसाचारः। सर्वभूतान्तर्वर्ती हंस इति प्रतिपादनम्॥ १२-२४॥ उनका अभ्यास उच्चस्थिति के लिए होता है। उनका आसन आश्रयरहित होता है। परमात्मा (ईश्वर) के साथ संयोग ही उनकी दीक्षा है। संसार से वियोग करना (मुक्त होना) ही उनका उपदेश है। दीक्षा लेकर सन्तोष करना ही उनका पावन कर्म करना है। द्वादश आदित्यों का (प्रलयकाल का) वे दर्शन करते हैं (क्योंकि प्रलय काल में ही द्वादश आदित्य एक साथ उदीयमान होते हैं)। वे विवेक के द्वारा अपनी रक्षा करते हैं। दया (करुणा) ही उनकी क्रीड़ा (खेल) है। आत्मिक आनन्द ही उनकी माला है। एकान्त रूपी गुहा में मुक्त होकर सुखपूर्वक बैठना ही उनकी गोष्ठी है। (अपने हाथ से) न बनाया हुआ, (अपितु माँग कर प्राप्त किया हुआ) भोजन ही उनकी भिक्षा है। वे हंसाचारी होते हैं अर्थात् उनका आचरण हंसों जैसा (नीरक्षीरविवेकी) होता है। समस्त प्राणियों के अन्तर में रहने वाला आत्मा ही हंस है, ऐसा उनका प्रतिपादन है॥ १२-२४॥
१७६ निर्वाणोपनिषद् धैर्यकन्था। उदासीनकौपीनम्। विचारदण्डः। ब्रह्मावलोकयोगपट्टः। श्रियां पादुका। परेच्छाचरणम्। कुण्डलिनीबन्धः। परापवादमुक्तो जीवन्मुक्तः। शिवयोगनिद्रा च। खेचरीमुद्रा च। परमानन्दी। निर्गुणगुणत्रयम्। विवेकलभ्यम्। मनोवाग्गोचरम्। अनित्यं जगद्यज्जनितं स्वप्रजगदभ्रगजादितुल्यम्। तथा देहादिसंघातं मोहगुणजालकलितं तद्रज्जुसर्पवत्कल्पितम्। विष्णुविध्यादिशताभिधानलक्ष्यम्। अङ्कुशो मार्गः। शून्यं न संकेतः। परमेश्वरसत्ता। सत्यसिद्ध- योगो मठः। अमरपदं न तत्स्वरूपम्। आदिब्रह्मस्वसंवित्। अजपा गायत्री। विकारदण्डो ध्येयः॥ धैर्य उन (संन्यासियों) की गुदड़ी है। उदासीन प्रवृत्ति उनकी कौपीन (लँगोटी) है। विचार ही उनका दण्ड है, ब्रह्म का अवलोकन ही उनका योगपट्ट है, सम्पदा उनकी पादुका है। (धन-सम्पदा को वे पैर की जूती की तरह तुच्छ वस्तु समझते हैं)। परेच्छा ही उनका आचरण है (ईश्वर की इच्छा से ही वे देह धारण और चेष्टा करते हैं)। कुण्डलिनी ही उनका बन्ध है। वे परापवाद (परनिन्दा) से मुक्त होकर जीवन्मुक्त होते हैं। कल्याणकारी ईश्वर के साथ योग ही उनकी निद्रा है। उस निद्रा और खेचरी मुद्रा को धारण करके वे परमानन्द का अनुभव करते हैं। वह (ब्रह्म) तीनों गुणों से अतीत अर्थात् त्रिगुणातीत-निर्गुण है। वह विवेक द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। वह मन और वाणी द्वारा प्राप्य नहीं है अर्थात् वह मन और वाणी का अविषय है। (जिस प्रकार) यह जगत् अनित्य है, इससे जो जन्मा है, वह स्वप्न के संसार की तरह और आकाश में बने बादलों के हाथी आदि की तरह मिथ्या है, उसी प्रकार यह देह आदि संघात, मोह आदि दोषों से युक्त है और यह सब रस्सी में सर्प की भ्रान्ति के समान मिथ्या है। विष्णु, विधि (ब्रह्मा) आदि सैकड़ों नामों वाला ब्रह्म ही लक्ष्य है। इन्द्रियों पर अंकुश रखना ही (ब्रह्म प्राप्ति का) मार्ग है। ब्रह्म प्राप्ति का वह मार्ग शून्य संकेत (विष्णु आदि देव शक्तियों से रहित) नहीं है। समस्त जीवों पर ईश्वर की सत्ता है। सत्य और सिद्ध हुआ योग ही (संन्यासी का) मठ है। अमर पद (स्वर्ग) उस (ब्रह्म) का स्वरूप नहीं है। आदि ब्रह्म से स्व की एकरूपता ही ज्ञान है। उक्तभाव (सोऽहं) का अजपा जप ही गायत्री है। विकारों के ऊपर नियन्त्रण पाना ही ध्येय है॥ २५-३६॥ मनोनिरोधिनी कन्था। योगेन सदानन्दस्वरूपदर्शनम्। आनन्दभिक्षाशी। महाश्मशाने- ऽप्यानन्दवने वासः। एकान्तस्थानम्। आनन्दमठम्। उन्मन्यवस्था। शारदा चेष्टा। उन्मनी गतिः। निर्मलगात्रम्। निरालम्बपीठम्। अमृतकल्लोलानन्दक्रिया। पाण्डरगगनमहासिद्धान्तः। शमदमा- दिदिव्यशक्त्याचरणे क्षेत्रपात्रपटुता। परावरसंयोगः। तारकोपदेशः। अद्वैतसदानन्दो देवता॥ मन का निरोध करने वाली प्रवृत्ति ही कन्था (गुदड़ी) है। (संन्यासीगण) योग के द्वारा परब्रह्म के सदानन्द स्वरूप का दर्शन करते हैं। वे (परिव्राजक-संन्यासी) आनन्दरूप भिक्षा का ही भोजन करते हैं। वे महाश्मशान में भी आनन्द वन की भाँति निवास करते हैं। एकान्त स्थल ही उनका मठ होता है। उनकी उन्मनी (निर्विकल्पक) अवस्था तथा शारदा (उज्ज्वल) चेष्टा होती है। उनकी उन्मनी निर्विकल्पकरूपा गति होती है। उनका निर्मल शरीर और आश्रयरहित आसन होता है। अमृत रूपी महान् सागर की तरंगों में आनन्दित रहना ही उनकी क्रिया है। चिदाकाश ही उनका महा सिद्धान्त है। शम, दम आदि दिव्य शक्तियों के आचरण (व्यवहार) में क्षेत्र और पात्र का ध्यान रखना उनकी पटुता (कुशलता) है। परावर (ब्रह्म) के साथ संयोग ही उनका तारक उपदेश है। अद्वैत सदानन्द ही उनका देवता है॥ ३७-४८॥ नियमः स्वान्तरिन्द्रियनिग्रहः। भयमोहशोकक्रोधत्यागस्त्यागः। परावरैक्यरसास्वादनम्। अनियामकत्वनिर्मलशक्तिः। स्वप्रकाशब्रह्मतत्त्वे शिवशक्तिसंपुटितप्रपञ्चच्छेदनम्। तथा
मन्त्र ६१ १७७ पत्राक्षाक्षिकमण्डलभावाभावदहनम्। बिभ्रत्याकाशाधारम्। शिवं तुरीयं यज्ञोपवीतम्। तन्मया शिखा। चिन्मयं चोत्सृष्टिरण्डम् संततोक्षिकमण्डलम्। कर्मनिर्मूलनं कथा। मायाममताहंका- रदहनम्। श्मशाने अनाहताङ्गी। निस्त्रैगुण्यस्वरूपानुसन्धानं समयं भ्रान्तिहननम्। कामादिवृत्ति- दहनम्। काठिन्यदृढकौपीनम्। चिराजिनवासः। अनाहतमन्त्रं अक्रिययैव जुष्टम्। स्वेच्छाचार- स्वस्वभावो मोक्षः। परं ब्रह्म प्लववदाचरणम्। ब्रह्मचर्यशान्तिसंग्रहणम्। ब्रह्मचर्याश्रमेऽधीत्य वानप्रस्थाश्रमेऽधीत्य स सर्वसंविन्यासं संन्यासम्। अन्ते ब्रह्माखण्डाकारम्। नित्यं सर्वसंदेहनाशनम्॥ ४९-६०॥ अपनी इन्द्रियों का निग्रह करना ही उन (परिव्राजक संन्यासियों) का नियम होता है। भय, मोह, शोक एवं क्रोध का परित्याग करना ही उनका त्याग है। वे परब्रह्म के साथ एकत्व का रसास्वादन करते हैं। अनियमकत्व (न किसी को वश में करना और न ही किसी का तिरस्कार करना) ही उनकी निर्मल शक्ति होती है। वे स्व प्रकाशित ब्रह्म तत्त्व में शिव-शक्ति से संपुटित प्रपञ्च का उच्छेदन करते हैं। वे पत्र (कारण शरीर), अक्ष (सूक्ष्म शरीर) और अक्षि (स्थूल शरीर) इन तीनों शरीरों के भाव और अभाव को दग्ध (विनष्ट) करने वाले होते हैं। वे आकाशरूपी आधार को धारण करने वाले होते हैं। तुरीयावस्था में स्थित शिव अथवा ब्रह्म ही उनका यज्ञोपवीत और शिवमयी (ब्रह्ममयी ज्ञान) शक्ति ही उनकी शिखा है। चिन्मय स्वरूप होने के कारण उनकी दृष्टि में स्थावर और जङ्गम समूची सृष्टि ब्रह्म ही है। कर्मों को निर्मूल कर देना (अर्थात् कर्मफल से न बँधना) ही उनकी कथा है। वे माया, ममता और अहंकार को दग्ध कर डालने के लिए श्मशान भूमि में अनाहत अंग (अवधूत-विदेह) होकर विचरण करते हैं। जो त्रिगुणातीत हैं, निज स्वरूप के अनुसन्धान और भ्रान्ति के हनन में ही जिनका समय लगता है; जो काम आदि वृत्तियों का दहन करते रहते हैं, जो कौपीन धारण करके कठोरतापूर्वक संयम का पालन करते हैं, जो चिरकाल तक मृगचर्म रूप वस्त्र धारण करते हैं, जो निरन्तर अक्रिया द्वारा ही अनाहत नाद रूप मन्त्र का सेवन करते हैं; उन (संन्यासी परिव्राजकों) का स्वभाव स्वेच्छाचारी (अपनी आत्मा के निर्देश के अनुरूप आचरण करने वाला) होता है, यही उनका मोक्ष है। परब्रह्म स्वरूप लक्ष्य की प्राप्ति हेतु ज्ञानरूपी नौका के समान आचरण करने वाला अवधूत पहले ब्रह्मचर्य द्वारा शान्ति प्राप्त करता है। ब्रह्मचर्याश्रम में अध्ययन के उपरान्त वानप्रस्थ आश्रम में भी अध्ययन (चिन्तन- मनन-निदिध्यासन) करता है और ज्ञान सम्पन्न होकर समस्त ज्ञान (लौकिक ज्ञान) का परित्याग कर देता है- यही संन्यास है। अन्त में नित्य ब्रह्म के अखण्ड आकार की स्थिति में पहुँचकर समस्त संशयों का नाश कर देता है॥ ४९-६०॥ एतन्निर्वाणदर्शनं शिष्यं पुत्रं विना न देयमित्युपनिषत्॥ ६१॥ यही निर्वाण का तत्त्वदर्शन है। इसका उपदेश शिष्य या पुत्र (अत्यधिक श्रद्धा-समर्पण भाव वाले) के अतिरिक्त अन्य किसी के प्रति नहीं करना चाहिए। यही उपनिषद् (रहस्य) है॥ ६१॥ ॐ वाङ्मे मनसि................... इति शान्तिः॥ ॥ इति निर्वाणोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ पञ्चब्रह्मापनिषद् ॥ यह उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेदीय परम्परा की है। इसमें कुल ४१ मन्त्र हैं। इसका शुभारम्भ शाकल द्वारा पैप्पलाद से पूछे गये प्रश्न-सर्वप्रथम सृष्टि के प्रारम्भ में क्या उत्पन्न हुआ ?-से हुआ है। पहले तो पैप्पलाद ने क्रमशः सद्योजात, अघोर, वामदेव, तत्पुरुष तथा ईशान के उत्पन्न होने की बात कही, बाद में क्रमशः उनका स्वरूप वर्णित किया। इन्हीं पाँचों को 'पंचब्रह्म' की संज्ञा प्रदान की गई है तथा कहा गया है कि इस पंचब्रह्मात्मक स्वरूप को अपनी आत्मा में अवस्थित मानकर 'पंचब्रह्म मैं ही हूँ'- इस प्रकार का आनुभविकज्ञान प्राप्त कर लेने वाला साधक ब्रह्मामृत का रसास्वादन करता हुआ मुक्ति प्राप्त कर लेता है। अन्त में इस पंचब्रह्मात्मक विद्या की महती महिमा का गुणगान करते हुए हृदयकमल में विद्यमान सदाशिव तत्त्व के अनुसन्धान करने का निर्देश देकर उपनिषद् को पूर्ण किया गया है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ सह नाववतु...............इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-अवधूतोपनिषद् ) अथ पैप्पलादो भगवाम्भो किमादौ किं जातमिति । सद्यो जातमिति किं भगव इति । अघोर इति । किं भगव इति । वामदेव इति । किं वा पुनरिमे भगव इति । तत्पुरुष इति । किं वा पुनरिमे भगव इति । सर्वेषां दिव्यानां प्रेरयिता ईशान इति । ईशानो भूतभव्यस्य सर्वेषां देवयोनिनाम् ॥ १॥ एक बार शाकल के द्वारा पूछने पर कि सर्वप्रथम क्या उत्पन्न हुआ ? पैप्पलाद ने उत्तर देते हुए कहा- सर्वप्रथम 'सद्योजात' नामक ब्रह्म का आविर्भाव हुआ। शाकल ने पूछा-इसके अतिरिक्त क्या और भी कोई अन्य भेद है? पैप्पलाद जी ने कहा- 'हाँ, 'अघोर' है। शाकल ने फिर प्रश्न किया कि क्या और भी अन्य भेद है? पैप्पलाद ने उत्तर दिया- 'वामदेव । शाकल ने पुनः पूछा-'क्या यही भेद हैं?' पैप्पलाद जी ने कहा 'नहीं, 'तत्पुरुष' नामक एक और भी भेद है। शाकल ने पुनः प्रश्न किया- अच्छा तो क्या यही चार भेद हैं? पैप्पलाद जी ने कहा नहीं, सभी देवों को प्रेरित करने वाला 'ईशान' नामक एक भेद और है। यह सभी भूत, भविष्यत् एवं समस्त देवयोनियों का शासक है ॥ १ ॥ कति वर्णाः । कति भेदाः । कति शक्तयः । यत्सर्वं तद्गुह्यम् ॥ २ ॥ इसके कितने वर्ण हैं? कितने भेद (प्रकार) हैं? तथा कितनी शक्तियाँ हैं? ये समस्त बातें बड़ी गोपनीय हैं (अतः अनधिकारियों से छिपाकर रखनी चाहिए) ॥ २ ॥ तस्मै नमो महादेवाय महारुद्राय ॥ ३ ॥ प्रोवाच तस्मै भगवान्महेशः ॥ ४ ॥ महारुद्र उन महादेव को नमस्कार है। भगवान् महेश ने पैप्पलाद जी को ये सभी उपदेश प्रदान किये ॥ गोप्याद्गोप्यतरं लोके यद्यस्ति शृणु शाकल । सद्योजातं मही पूषा रमा ब्रह्मा त्रिवृत्स्वरः ॥ ५ ॥ ऋग्वेदो गार्हपत्यं च मन्त्राः सप्त स्वरास्तथा । वर्णं पीतं क्रिया शक्तिः सर्वाभीष्टफलप्रदम् ॥ ६ ॥ हे शाकल ! इस लोक में अति गोपनीय बातों में भी जो अति गूढ़ है, उसे सुनो। वह है 'सद्योजात' नामक ब्रह्म। सभी तरह की अभीष्ट सिद्धियों को देने वाली मही, पूषा, रमा, ब्रह्मा, त्रिवृत् (सत्, रज, तम), अकारादि स्वर, ऋग्वेद, गार्हपत्य (अग्नि), विविध मंत्र (नमः शिवाय आदि) सात स्वर (स, रे, ग, म, प, ध, नि), पीला वर्ण (रंग) तथा क्रिया नामक शक्ति आदि जिसके अनेक स्वरूप हैं ॥ ५-६ ॥
१७९ पञ्चब्रह्मोपनिषद् अघोरं सलिलं चन्द्रं गौरी वेदद्वितीयकम्। नीरदाभं स्वरं सान्द्रं दक्षिणाग्निरुदाहृतम्॥ ७॥ पञ्चाशद्वर्णसंयुक्तं स्थितिरिच्छाक्रियान्वितम्। शक्तिरक्षणसंयुक्तं सर्वाघौघविनाशनम्॥ ८॥ सर्वदुष्टप्रशमनं सर्वैश्वर्यफलप्रदम् ॥ ९॥ जल, चन्द्र, गौरी, यजुर्वेद, नीरदाभ (मेघ की आभा वाले), स्वर (उकार), स्निग्ध, दक्षिणाग्नि आदि ये सभी अघोर के स्वरूप बतलाये गये हैं। ये तथा इनके अतिरिक्त पचास (अ से लेकर क्ष तक जो) वर्ण हैं, उनसे युक्त स्थिति, इच्छा तथा क्रिया शक्ति से युक्त (अपनी विकल्पित) शक्ति के रक्षण से युक्त जो अघोर का स्वरूप है, वह सभी तरह के पापों के समूह का शमन करने वाला, सभी दुष्टों का विनाश करने वाला तथा सभी तरह के ऐश्वर्य के फल को प्रदान करने वाला है॥ ७-९॥ वामदेवं महाबोधदायकं पावकात्मकम्। विद्यालोकसमायुक्तं भानुकोटिसमप्रभम्॥ १०॥ प्रसन्नं सामवेदाख्यं गानाष्टकसमन्वितम्। धीरस्वरमधीनं चाहवनीयमनुत्तमम्॥ ११॥ ज्ञानसंहारसंयुक्तं शक्तिद्वयसमन्वितम्। वर्णं शुक्लं तमोमिश्रं पूर्णबोधकरं स्वयम्॥ १२॥ धामत्रयनियन्तारं धामत्रयसमन्वितम्। सर्वसौभाग्यदं नृणां सर्वकर्मफलप्रदम्॥ १३॥ अष्टाक्षरसमायुक्तमष्टपत्रान्तरस्थितम्॥ १४॥ 'वामदेव' महान् ज्ञान प्रदायक एवं तेजस्वी अग्नि के स्वरूप, विद्या के आलोक से आलोकित, करोड़ों सूर्यों के सदृश तेजोमय तथा सर्वदा आनन्द स्वरूप हैं। अष्टगान (सामवेद के कहे गये सात गान एवं एक भरत शास्त्र निष्पन्न गीति) से समन्वित मन्द स्वर (आ, आ, आम्) के अधीन तथा सर्वोत्तम आहवनीय (अग्निसदृश), ज्ञान एवं संहार शक्ति से समन्वित उनका (वामदेव का) स्वरूप है। वह शुक्ल वर्ण, तमोगुण युक्त तथा स्वयं ही पूर्णज्ञाता, (जाग्रत् आदि) तीनों धामों के नियामक, तीनों धामों (विश्व, तैजस, प्राज्ञ) से युक्त, सभी को सौभाग्य प्रदान करने वाले, मनुष्यों के सभी कर्मों के फल प्रदाता तथा (अ, क, च, ट, त, प, य, श) इन आठ अक्षरों (अथवा आठ क्षरित न होने वाले तत्त्वों अथवा ॐनमो महादेवाय के आठ अक्षरों) तथा अष्टदल (पंखुड़ियों) से युक्त कमल अर्थात् हृदय रूपी कमल में निवास करने वाले हैं॥ १०-१४॥ यत्तत्तत्पुरुषं प्रोक्तं वायुमण्डलसंवृतम्। पञ्चाग्निना समायुक्तं मन्त्रशक्तिनियामकम्॥१५॥ पञ्चाशतस्वरवर्णाख्यमथर्ववेदस्वरूपकम्। कोटिकोटिगणाध्यक्षं ब्रह्माण्डाखण्डविग्रहम्॥१६ वर्णं रक्तं कामदं च सर्वाधिव्याधिभेषजम्। सृष्टिस्थितिलयादीनां कारणं सर्वशक्तिधृक्॥१७॥ अवस्थात्रितयातीतं तुरीयं ब्रह्मसंज्ञितम्। ब्रह्माविष्णुवादिभिः सेव्यं सर्वेषां जनकं परम्॥ १८॥ जो यह 'तत्पुरुष' हमने कहा है, वह वायुमण्डल से आपूरित पाँच अग्नियों से संयुक्त होकर मंत्र शक्ति का नियामक अर्थात् नियमन करने वाला है। वे स्वर एवं व्यञ्जन के रूप में पचास संख्या से प्रसिद्ध, अथर्ववेद के स्वरूप वाले, अनन्त कोटि गणों के अध्यक्ष तथा अखण्ड अर्थात् सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड रूप शरीर वाले हैं। उन (तत्पुरुष) का वर्ण लाल है, वे समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाले तथा सब प्रकार की आधि- व्याधियों (मानसिक एवं शारीरिक रोगों) की अनुपम औषधि हैं। ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति, पालन एवं संहार के एक मात्र कारण हैं और समस्त शक्तियों को धारण करने में समर्थ हैं। इसके अतिरिक्त वे (जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति) तीनों अवस्थाओं से परे तुरीयावस्था (चतुर्थ अवस्था) स्वरूप एवं ब्रह्म की संज्ञा से युक्त हैं। वे (ब्रह्म) ही सभी को प्रादुर्भूत करने वाले, ब्रह्मा एवं विष्णु आदि के द्वारा सर्वदा सेवित होने वाले हैं॥ १५-१८॥ ईशानं परमं विद्यात्प्रेरकं बुद्धिसाक्षिणम्। आकाशात्मकमव्यक्तमोंकारस्वरभूषितम्॥ १९॥ सर्वदेवमयं शान्तं शान्त्यतीतं स्वराद्वहिः। अकारादिस्वराध्यक्षमाकाशमयविग्रहम्॥ २०॥
मन्त्र ३२ १८० पञ्चकृत्यनियन्तारं पञ्चब्रह्मात्मकं बृहत्॥ २१॥ पञ्चब्रह्मोपसंहारं कृत्वा स्वात्मनि संस्थितः। स्वमायावैभवान्सर्वान्संहृत्य स्वात्मनि स्थितः॥ २२॥ पञ्चब्रह्मात्म कातीतो भासते स्वस्वते- जसा। आदावन्ते च मध्ये च भासते नान्यहेतुना ॥ २३॥ 'ईशान' को परमात्मतत्त्व के रूप में प्रेरणा प्रदान करने वाला जानना चाहिए। (वे) बुद्धि के साक्षीरूप, आकाश स्वरूप (सर्वत्र व्यापक), अव्यक्त एवं ॐकार के स्वर से (ध्वनि से) विभूषित हैं। वे समस्त देवों के स्वरूप वाले, शान्त, शान्ति से भी परे अर्थात् अत्यन्त शान्ति से सम्पन्न, स्वरों से परे (अर्थात् स्वरों से जिनका ज्ञान सम्भव नहीं), 'अकार' आदि स्वरों के जो अधिष्ठाता स्वरूप हैं तथा जो आकाशमय (व्यापक) शरीर से युक्त हैं। (वे) सृष्टि आदि पाँच (सृष्टि, स्थिति, ध्वंस, विधान और अनुग्रह) कृत्यों के नियन्ता एवं सर्वव्यापक विराट् पंच ब्रह्मस्वरूप हैं। वे (ईशान) पंचब्रह्म का उपसंहार (निर्वाण) करके अपनी आत्मा में प्रतिष्ठित होकर अपनी माया के वैभव-प्रभाव से सबका संहार करके अपनी ही आत्मा में प्रतिष्ठित रहने वाले हैं। वे (ईशान) पंच ब्रह्म से परे रहकर स्वयं अपने ही तेज से प्रकाशित हैं और आदि, मध्य एवं अन्त में भी किसी अन्य कारण से भासित नहीं होते, वरन् (वह) स्वयं प्रकाश स्वरूप एवं स्वयम्भू हैं॥ १९-२३॥ मायया मोहिताः शंभोर्महादेवं जगद्गुरुम्। न जानन्ति सुराः सर्वे सर्वकारणकारणम्। न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य परात्परं पुरुषं विश्वधाम ॥ २४॥ येन प्रकाशते विश्वं यत्रैव प्रविलीयते। तद्ब्रह्म परमं शान्तं तद्ब्रह्मास्मि परं पदम् ॥ २५॥ भगवान् शम्भु की माया से मोहित देवगण, सम्पूर्ण जगत् के गुरु एवं समस्त कारणों के कारण उन देवाधिदेव महादेव को नहीं जानते। सम्पूर्ण विश्व को प्रकाश देने वाले उन परात्पर विराट् पुरुष का रूप सामान्य दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। जिसके द्वारा यह विश्व प्रकाशित होता है, जिसमें विलय को प्राप्त हो जाता है, ऐसा वह परम अविनाशी ब्रह्म शान्त स्वरूप है। वही अद्वितीय परमपद स्वरूप मैं स्वयं हूँ ॥२४-२५ पञ्चब्रह्मैमिदं विद्यात्सद्योजातादिपूर्वकम्। दृश्यते श्रूयते यच्च पञ्चब्रह्मात्मकं स्वयम् ॥ २६ ॥ पञ्चधा वर्तमानं तं ब्रह्मकार्यमिति स्मृतम्। ब्रह्मकार्यमिति ज्ञात्वा ईशानं प्रतिपद्यते ॥ २७॥ पञ्चब्रह्मात्मकं सर्वं स्वात्मनि प्रविलाप्य च। सोऽहमस्मीति जानीयाद्विद्वान्ब्रह्मामृतो भवेत् ॥ २८ ॥ इत्येतद्ब्रह्म जानीयाद्यः स मुक्तो न संशयः ॥ २९ ॥ 'सद्योजात' आदि यही पंचब्रह्म हैं, इस चराचर जगत् में जो भी दृष्टिगोचर हो रहा है अथवा सुनाई पड़ रहा है, वह सभी कुछ पंच ब्रह्मात्मक ही है। पाँच रूपों में प्रतिष्ठित वह (सद्योजात) ब्रह्मकार्य कहा गया है। इस ब्रह्मकार्य को जान करके 'ईशान' को प्राप्त किया जाता है। यदि विद्वान् मनुष्य उन पंच ब्रह्मात्मक को अपनी आत्मा में विलीन करके (अर्थात् मान कर) 'सोऽहमस्मि' अर्थात् 'मैं वही पंचब्रह्म हूँ, स्वयं उन्हीं का रूप हूँ।' इस प्रकार समझे, तो (वह) ब्रह्मामृत का रसास्वादन करने वाला हो जाता है। अतः इस प्रकार से जो ब्रह्म के स्वरूप को जान लेता है, वह मुक्ति को प्राप्त कर लेता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है ॥ २६-२९ ॥ पञ्चाक्षरमयं शम्भुं परब्रह्मस्वरूपिणम्। नकारादियकारान्तं ज्ञात्वा पञ्चाक्षरं जपेत् ॥ ३० ॥ सर्वं पञ्चात्मकं विद्यात्पञ्चब्रह्मात्मतत्त्वतः ॥३१॥ पञ्चब्रह्मात्मिकीं विद्यां योऽधीते भक्तिभावितः। स पञ्चात्मकतामेत्य भासते पञ्चधा स्वयम् ॥३२॥ पंचाक्षरमय उस परब्रह्म स्वरूप भगवान् शम्भु को जान करके प्रारम्भ में 'नकार' और अन्त में 'यकार' है जिसके, ऐसे पंचाक्षर मंत्र (नमः शिवाय) को जपना चाहिए। समस्त वस्तुओं को पंचात्मक ब्रह्म के रूप में जानकर सर्वत्र पंचब्रह्म तत्त्व का ही दर्शन करना चाहिए। जो भी व्यक्ति भक्ति-भावनापूर्वक पंचब्रह्मात्मक विद्या को पढ़ता है, वह स्वयं ही पंचब्रह्म का साकार रूप होकर पंचब्रह्म की समीपता को प्राप्त कर लेता है ॥
१८१ पञ्चब्रह्मोपनिषद् एवमुक्त्वा महादेवो गालवस्य महात्मनः। कृपां चकार तत्रैव स्वान्तर्धिमगमत्स्वयम् ॥ ३३॥ इस प्रकार इस ज्ञान को महादेव जी 'गालव' मुनि को कृपापूर्वक बताते हुए वहीं आत्मलीन हो गए॥ यस्य श्रवणमात्रेणाश्रुतमेव श्रुतं भवेत्। अमतं च मतं ज्ञातमविज्ञातं च शाकल ॥ ३४॥ एकेनैव तु पिण्डेन मृत्तिकायाश्च गौतम। विज्ञातं मृण्मयं सर्वं मृदभिन्नं हि कार्यकम् ॥ ३५॥ हे शाकल! जिसके श्रवण मात्र से ही अश्रुत (अनसुना) श्रुत (ज्ञात) हो जाता है। जाना हुआ, न जाना हुआ सभी प्रकार का ज्ञान प्राप्त हो जाता है और जिन सिद्धान्तों का ज्ञान न हो, वे सभी स्वयं ही ज्ञात हो जाते हैं। हे गौतम! जिस प्रकार से मिट्टी के एक ही पिण्ड से अभिन्न समस्त वस्तुओं का पूर्ण ज्ञान हो जाता है; क्योंकि कार्य-कारण से अभिन्न होता है, वैसे ही पंचब्रह्म के ज्ञान द्वारा समस्त वस्तुओं का ज्ञान हो जाता है ॥३४-३५॥ एकेन लोहमणिना सर्वं लोहमयं यथा। विज्ञातं स्यादथैकेन नखानां कृन्तनेन च ॥ ३६॥ सर्वं कार्ष्णायसं ज्ञातं तदभिन्नं स्वभावतः। कारणाभिन्नरूपेण कार्यकारणमेव हि ॥ ३७॥ जिस प्रकार एक लोहमणि के द्वारा समस्त लोहतत्त्व ज्ञात हो जाते हैं, उसी प्रकार नाखून को काटने की छुरी से सभी लोहे के बने अस्त्रों की जानकारी प्राप्त हो जाती है; यह स्वाभाविक है कि उससे अपृथक् जितनी भी वस्तुएँ होंगी, वे सभी तदनुरूप होंगी; क्योंकि कारण से अभिन्न जो भी कार्य है, वह कारण रूप ही होता है॥ तद्रूपेण सदा सत्यं भेदेनोक्तिर्मृषा खलु। तच्च कारणमेकं हि न भिन्नं नोभयात्मकम् ॥ ३८ ॥ भेदः सर्वत्र मिथ्यैव धर्मादेरनिरूपणात्। अतश्च कारणं नित्यमेकमेवाद्वयं खलु। अत्र कारणमद्वैतं शुद्धचैतन्यमेव हि ॥ ३९ ॥ यदि किसी भी वस्तु को (कार्य को) तद्रूप अर्थात् कारण के अनुरूप मान लिया जाए, तो वह सदा सत्य है। जब उसे भिन्न (तद्रूप से भिन्न) कहेंगे, तो वह मिथ्या कथन होगा; क्योंकि सभी कार्यों का कारण तो एक ही है। वह न तो भिन्न है और न ही उभयात्मक है। यह जो सभी जगहों पर भेद की प्रतीति होती है, उसका कारण धर्म के निरूपण का अभाव ही है। अतः कारण तो वस्तुतः एक ही है, वह दूसरा (भिन्न) नहीं है। इसलिए इस चराचर विश्व का कारण शुद्ध चैतन्यरूप अद्वैत ही है॥ ३८-३९॥ अस्मिन्ब्रह्मपुरे वेश्म दहरं यदिदं मुने। पुण्डरीकं तु तन्मध्ये आकाशो दहरोऽस्ति तत्। स शिवः सच्चिदानन्दः सोऽन्वेष्टव्यो मुमुक्षुभिः ॥ ४० ॥ अयं हृदि स्थितः साक्षी सर्वेषामविशेषतः। तेनायं हृदयं प्रोक्तः शिवः संसारमोचकः। इत्युपनिषत् ॥ ४१ ॥ हे मुने! इस अविनाशी ब्रह्म के आश्रयस्थल शरीर में जो दहर नामक निवास स्थल (हृदय में) है, जिसे पुण्डरीक (कमल) भी कहते हैं, उसी में दहराकाश स्थित है। उसी में ही मोक्ष के इच्छुक साधकों को सत्- चित् एवं आनन्दस्वरूप उस शिव को ढूँढ़ना चाहिए। यह शिव सदैव हृदय कमल में ही प्रतिष्ठित रहता है एवं निर्विशेष (सामान्य) दृष्टि से सभी का साक्षीभूत है। इस कारण से हृदय को शिवस्वरूप कहकर इस (हृदय) को ही संसार का मोचक अर्थात् संसार से मुक्त करने वाला कहा गया है॥ ४०-४१॥ ॐ सह नाववतु ................इति शान्तिः ॥ ॥ इति पञ्चब्रह्मोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ परब्रह्मोपनिषद् ॥ यह अथर्ववेदीय उपनिषद् है। इसमें कुल २० मन्त्र हैं, जिसमें परब्रह्म की प्राप्ति हेतु संन्यास-धर्म का विस्तृत विवेचन किया गया है। उपनिषद् का शुभारंभ महाशाल शौनक के उस प्रश्न से हुआ है, जिसमें उन्होंने महर्षि पिप्पलाद से पूछा है कि संसार में उत्पन्न होने वाले सभी पदार्थ इसके पूर्व कहाँ स्थित रहते हैं? भगवान् हिरण्यगर्भ ने उन पदार्थों को किस प्रकार सृजित किया और वस्तुतः वे कौन हैं? महर्षि पिप्पलाद ने इसी प्रश्न का विशद विवेचन किया है तथा उस परम सत्ता को; जो सृष्टि का आदिकारण है, जानने के लिए अष्टकपाल-अष्टांगयोग का आश्रय लेना बताया है। आगे चलकर संन्यास-धर्म का अतीव प्रभावोत्पादक वर्णन किया गया है, जिसमें संन्यासी को बाह्य यज्ञोपवीत और शिखा के स्थान पर आन्तरिक यज्ञोपवीत एवं शिखा की अनिवार्यता बताई गई है। साथ ही यह कहा गया है कि जिसने अग्निमय-ज्ञानमय शिखा और यज्ञोपवीत धारण किया है, वही सच्चा साधक और मुक्ति का अधिकारी बनता है। अन्त में बाहरी प्रपञ्चमय शिखा और यज्ञोपवीत का परित्याग करके प्रणव हंस ( ॐ कार ब्रह्म) रूपी शिखा और यज्ञोपवीत का आश्रय लेकर मोक्ष का अधिकारी बनने का निर्देश दिया गया है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ भद्रं कर्णेभिः ...........इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-अथर्वशिर उपनिषद ) अथ हैन महाशालः शौनकोऽङ्गिरसं भगवन्तं पिप्पलादं विधिवदुपसन्नः पप्रच्छ दिव्ये ब्रह्मपुरे संप्रतिष्ठिता भवन्ति खलु । कथं सृज्यन्ते । नित्यात्मन एष महिमा। विभज्य एष महिमा विभुः । क एषः । तस्मै स होवाच। एतत्सत्यं यत्प्रब्रवीमि ब्रह्मविद्यां वरिष्ठां देवेभ्यः प्राणेभ्यः । परब्रह्मपुरे विरजं निष्कलं शुभ्रमक्षरं विरजं विभाति । स नियच्छति मधुकरराश्या निर्मकः। अकर्मस्वपुरस्थितः । कर्मतरः कर्षकवत्फलमनुभवति । कर्ममर्मज्ञाता कर्म करोति । कर्ममर्म ज्ञात्वा कर्म कुर्यात्। को जालं विक्षिपेदेको नैनमपकर्षत्यपकर्षति ॥ १ ॥ एक बार बुद्धिमान् शौनक ने विधिवत् समीप बैठकर अङ्गिरस गोत्रीय भगवान् पिप्पलाद से पूछा-क्या संसार में उत्पन्न होने वाले सभी पदार्थ पहले दिव्य ब्रह्मपुर अर्थात् भगवान् हिरण्यगर्भ के हृदयाकाश में प्रतिष्ठित होते हैं? ये व्यापक महिमाशाली भगवान् अपने अन्दर से उन पदार्थों को यथा विभाग किस तरह सृजित करते हैं? इन विभु की महिमा क्या है ? अर्थात् ये वस्तुतः कौन हैं? महर्षि पिप्पलाद ने उनसे कहा- जो श्रेष्ठ ब्रह्म विद्या मैं तुमसे कहूँगा, वह सत्य है। यह सत्, देवों (इन्द्रियों) तथा प्राण-अपान आदि दस प्राणों को अपने-अपने विषय ग्रहण करने की शक्ति प्रदान करता है। यह परब्रह्मपुर में विरज (रज आदि गुणत्रय के अभाव वाला) और निष्कल (प्राण आदि नामवाली षोडश कलाओं से रहित) है। इसी कारण शुभ्र (स्वच्छ) और अक्षर (अविनाशी) है, जो गुणातीत होकर सुशोभित होता है, वह जीव समूह के बन्धन और मोक्ष का निर्माण कर्त्ता होने से 'निर्मक' कहलाता है। इसी प्रकार जो निर्माता है, वह परमात्मा मुमुक्षुओं की अविद्या का समापन कर देता है, जिससे वे शुद्ध चैतन्य उस परमात्मा का अनुभव (दर्शन) कर पाते हैं। वह परब्रह्म अपने
१८३ परब्रह्मोपनिषद् ही स्थान में रहकर अकर्म (कर्महीन) स्वरूप में अवस्थित रहता है, क्योंकि वह कृत-कृत्य होता है, अर्थात् उसके लिए कुछ भी करना शेष नहीं रहता। वह पराग् दृष्टि (विपरीत दृष्टि) वाला व्यक्ति तो इह लोक और परलोक के फल प्राप्त करने की दृष्टि से विविध कर्म करता है और कृषक की भाँति अपने द्वारा किये हुए कर्मों का फल प्राप्त करता है। जो ज्ञानी कर्म के मर्म को (कर्म को जन्म आदि का कारण) जानकर कर्म करता है, वह तो चित्त की शुद्धि के लिए परमेश्वर की आराधना रूप कर्म करता है। जो मुनि अपने अतिरिक्त (अपने को ब्रह्म मानकर) अन्य भ्रम से मुक्ति चाहता है, वह कर्म के मर्म को जानकर (कर्मानुसार ही उच्च-नीच योनियाँ मिलती हैं, यह जानकर) अपने आश्रम के अनुरूप निष्काम कर्म करता है। एक मात्र ब्रह्म में चित्त को लगाने वाला कौन ऐसा विवेकी है, जो विविध प्रकार के कर्म जाल में फँसकर अपना अपकर्ष करता है? अर्थात् कोई नहीं (इसका आशय है कि निष्काम कर्म करने वाले को उसके कर्म सांसारिक विषयों में नहीं खींच सकते) ॥१ ॥ प्राणदेवताश्चत्वारः। ताः सर्वा नाड्यः सुषुप्तश्येनाकाशवत्। यथा श्येनः खमाश्रित्य याति स्वमालयं कुलायम्। एवं सुषुप्तं ब्रूत। अयं च परं च स सर्वत्र हिरण्मये परे कोशे। अमृता ह्येषा नाडीत्रयं संचरति। तस्य त्रिपादं ब्रह्म। एषात्रेष्य ततोऽनुतिष्ठति। अन्यत्र ब्रूत। अयं च परं च सर्वत्र हिरण्मये परे कोशे। यथैष देवदत्तो यष्ट्या च ताड्यमानो नैवैति। एवमिष्टापूर्तकर्मणा शुभाशुभैर्न लिप्यते। यथा कुमारको निष्काम आनन्दमभियाति। तथैष देवः स्वप्न आनन्दम- भिधावति। वेद एव परं ज्योतिः। ज्योतिषा मा ज्योतिरानन्दयत्येवमेव। तत्परं यच्चित्तं परमात्मा- नमानन्दयति। शुभ्रवर्णमाजायतेश्वरात्। भूयस्तेनैव मार्गेण स्वप्रस्थानं नियच्छति। जलूकाभाव- वद्व्यर्थाकाममाजायतेश्वरात्। तावतात्मानमानन्दयति। परसंधि यदपरसन्धीति। तत्परं नापरं त्यजति। तदैवं कपालाष्टकं संधाय य एष स्तन इवावलम्बते सेन्द्रयोनिः स वेदयानिरिति। अत्र जाग्रति शुभाशुभातिरिक्तः शुभाशुभैरपि कर्मभिर्न लिप्यते। य एष देवोऽन्यदेवस्य संप्रसा- दोऽन्तर्याम्यसङ्गचिद्रूपः पुरुषः। प्रणवहंसः परं ब्रह्म। न प्राणहंसः। प्रणवो जीवः। आद्या देवता निवेदयति। य एवं वेद। तत्कथं निवेदयते। जीवस्य ब्रह्मत्वमापादयति ॥ २ ॥ (त्रिपाद् ब्रह्म की प्राप्ति के उपाय बताते हुए ऋषि कहते हैं कि) जीव के प्राणाधार रूप में विश्वादि तुरीयान्त भेद से प्राण के चार भेद होते हैं। उन्हें प्राप्त करने वाली नाड़ियाँ भी चार प्रकार की होती हैं। ये चार- रमा, अरमा, इच्छा और पुनर्भवा नामक हैं। इनमें रमा और अरमा नाड़ियों का अवलम्बन लेकर वह (प्राण) आकाशगामी श्येन (बाज़) की तरह जाग्रत्, स्वप्न आदि के व्यवहार से थकित होकर सुषुप्तावस्था में चला जाता है, अर्थात् जिस प्रकार श्येन आकाश में उड़ते-उड़ते थककर अपने घोंसले में विश्राम हेतु चला जाता है, उसी प्रकार जीव भी जाग्रत् स्वप्नादि प्रपञ्चों से थककर दोनों नाड़ियों का आश्रय लेकर सुषुप्ति में विश्रान्ति प्राप्त करता है। वह (जीव) कभी-कभी सुषुप्तावस्था में अन्यत्र भी भ्रमण करता है, इस संदर्भ में बताते हैं-यह वस्तुतः अमृत रूप देवता सर्वत्र व्यापक हिरण्मयमय परकोश अर्थात् हृदयाकाश में रमा आदि नाड़ीत्रय का आश्रय लेकर संचरण करता है। उसके बाद उसका त्रिपाद् रूप ब्रह्म ही शेष रह जाता है। यह जीव (प्राणवत्ता) रूप देवता अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त कर तत्स्वरूप में स्थित रहकर मुक्त हो जाता है। इस प्रकार जीव इस जाग्रदवस्था के अतिरिक्त भी अन्य अवस्थाओं में अपनी स्वतन्त्र सत्ता समझकर परिभ्रमण करता रहता है। सर्वत्र सदैव हिरण्मय परकोश में विचरण करता हुआ भी स्वाज्ञानावरणाच्छन्न होकर जाग्रत्
मन्त्र २ १८४ आदि अवस्थाओं (जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति) के गर्त में गिरता है अर्थात् बन्धनयुक्त होता है। जिस प्रकार कोई देवदत्त नामक व्यक्ति शयन की स्थिति में हो, उसे कोई बेंत से ताड़ित करे, तो जागने के बाद वह पुनः नहीं सोता; उसी प्रकार यह जीव भी श्रुतिरूप (वेद शास्त्रादि) आचार्य द्वारा जाग्रत् हो जाने पर पुनः अवस्थात्रय रूप गर्त में नहीं पड़ता और न ही इष्टापूर्त आदि शुभाशुभ कर्मों में लिप्त होता है। इसी प्रकार जैसे बालक किसी वस्तु में विशेष आसक्ति न होने के कारण जो भी मिल जाए, उसी को पाकर आनन्दित होता रहता है, उसी प्रकार यह जीव भी स्वप्न अथवा जाग्रत्-अवस्था में भी निरन्तर आनन्द का अनुभव करता है अथवा आनन्द की ओर ही दौड़ता है। अतः जो कोई श्रुतिरूप आचार्य के मुख से यह जान लेता है कि मैं परम ज्योति और आनन्द का स्वरूप हूँ तथा परम ज्योति सूर्यादि की किरण हूँ, प्रकाश हूँ, अपने आप में आनन्दित रहता हूँ। इस प्रकार जिसका हृदय (चित्त) उस परब्रह्म में तत्पर (समर्पित) हो जाता है, वह परमात्मा को प्राप्त कर आत्मा को तृप्त (आनन्दित) करता रहता है अथवा अपने आत्मस्वरूप आनन्दस्वरूप में स्थित रहता है। ईश्वर से शुभ्रवर्ण (निर्विकल्प भाव) उत्पन्न होता है, जिससे चित्त प्रसन्न होता है। इस प्रकार त्रिपुटि विरल निर्विकल्प समाधि का अनुभव करके स्वप्न स्थान में विश्राम करता है अर्थात् त्रिपुटि विशिष्ट अखण्डाकार वृत्ति से शीघ्र ही स्वप्नावस्था को प्राप्त कर 'तत्त्वमसि,' 'अहं ब्रह्मास्मि' का अनुभव करके आत्मा को विश्राम प्रदान करता है। जिस प्रकार जलूका (जोंक) एक तिनके से दूसरे तिनके पर जाती है, उसी प्रकार यह विद्वान् भी तुरन्त जागरणस्थ और तुरन्त स्वप्नस्थ हो जाता है। पुनः जागरण को त्याग कर फिर स्वप्नस्थ हो जाता है। ईश्वर की कृपा से (अवस्था विभाग से) तीनों अवस्थाओं (जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति) में सञ्चरण करने की इच्छा करने मात्र से वैसी स्थिति बन जाती है। इस कारण यह (जीव) सविकल्प और निर्विकल्प समाधि से अपनी आत्मा को आनन्दित करता है। तत्पश्चात् जीवात्मा और परमात्मा के एकत्व में जो भेद सापेक्षत्व (अविद्या) है, उसका यह आत्मतत्त्व त्याग कर देता है। इस प्रकार वह अविद्यारहित आत्मतत्त्व (परब्रह्म) अपर (उस ब्रह्म से भिन्न कुछ न होने से) का त्याग नहीं करता। स्वयमेव विद्यमान रहता है। यदि केवल श्रवणादि के माध्यम से निर्विशेष ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति नहीं होती, तो कपालाष्टक का आश्रय लेना चाहिए। कपालाष्टक के आठ (८) अंग हैं- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। इनके द्वारा अन्तर के कलुष को शुद्ध करके ब्रह्मज्ञान प्राप्त करना चाहिए। इस कपालाष्टक-अष्टांगयोग के द्वारा स्तन (हृदय स्थान में स्थित केले के पुष्प) की भाँति लटका रहता है, जो योग के समय ऊपर उठता हुआ विकास को प्राप्त होता है; इसमें ही इन्द्रयोनि (परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग), जिसे वेदयोनि कहते हैं, वह ईश्वर जाग्रत् रहता है। इस प्रकार जो अपने हृदयकमल में ईश्वर का ध्यान करता है, वह शुभ-अशुभ से परे होकर शुभाशुभ कर्मों के द्वारा कभी लिप्त नहीं होता। वह देव कैसा है? इस संदर्भ में बताते हैं-वह अन्य देवों का संप्रसाद (अत्यन्त प्रसन्नता) दाता, अन्तर्यामी, असङ्ग, चैतन्य स्वरूप, पुरुष, प्रणव हंस (ॐकार), परब्रह्म है, जो प्राण हंस नहीं है। (यहाँ प्राण हंस से अभिप्राय मुख्य प्राण से है, क्योंकि यह परब्रह्म प्रकरण है, प्राण का नहीं) प्रणव ही जीव है; क्योंकि वह ओंकार के अवयव के आकार से समझा जाने वाला है। वह जीवरूपी आद्य देवता कहा जाता है। जो इस यथार्थता को इस प्रकार जानता है, वह जीव-ब्रह्म के भेद को कैसे निरूपित (निवेदित) कर सकता है। वह तो जीव और ब्रह्म का एकत्व ही प्रतिपादित करता है, उनका भेद कभी स्मरण नहीं करता ॥ २ ॥ [यहाँ ऋषि ने योग के अष्टांगों को कपालाष्टक कहा है। अपनी भाव दृष्टि से ऋषि उसे एक कमल पुष्प की तरह
१८५ परब्रह्मोपनिषद् अनुभव करते हैं। जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश से लटका हुआ बंद कमल ऊर्ध्वमुख होकर खिल जाता है, उसी प्रकार सुप्तावस्था में स्थित योग वृत्तियाँ ब्राह्मी चेतना के संयोग से जाग्रत् और ऊर्ध्वमुखी हो उठती हैं।] सत्त्वमथास्य पुरुषान्तःशिखोपवीतत्वम्। ब्राह्मणस्य मुमुक्षोरन्तःशिखोपवीतधारणम्। बहिर्लक्ष्यमाणशिखायज्ञोपवीतधारणं कर्मिणो गृहस्थस्य। अन्तरुपवीतलक्षणं तु बहिस्तन्तु- वदव्यक्तमन्तस्तत्त्वमेलनम्॥ ३॥ ब्रह्म रूप इस पुरुष का सत्त्व आन्तरिक शिखा और यज्ञोपवीत है। मुमुक्षु ब्राह्मण को यह आन्तरिक शिखा और यज्ञोपवीत ही धारण करना चाहिए। बाहर दिखाई देने वाले शिखा और यज्ञोपवीत को धारण करना गृहस्थ का कर्त्तव्य है। आन्तरिक शिखा और यज्ञोपवीत बाह्य सूत्रवत् शिखा और यज्ञोपवीत के समान व्यक्त नहीं है। वे तो अव्यक्त हैं और ब्रह्मत्व से मेल कराने वाले हैं॥ ३॥ न सन्नासन्न सदसद्भिन्न्राभिन्नं न चोभयम्। न सभागं न निर्भागं न चाप्युभयरूपकम्। ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानं हेयं मिथ्यात्वकारणादिति ॥ ४॥ अविद्या का स्वरूप न सत् है, न असत्; न भिन्न है, न अभिन्न और न दोनों का उभय स्वरूप है। वह न सभाग है, न निर्भाग और न इनका उभय रूप ही है। अतः जब तक अनिर्वचनीय ब्रह्म का आत्मैकत्व (प्रत्येक आत्मा ब्रह्म है, यह ज्ञान) उदित नहीं होता, तभी तक अविद्या की स्थिति है। ब्रह्म स्वरूप का वास्तविक ज्ञान हो जाने पर, यह सभी हेय है, त्याग देने योग्य है, क्योंकि यह सब मिथ्या है॥ ४॥ पञ्चपादब्रह्मणो न किंचन। चतुष्पादन्तर्वर्तिनोऽन्तर्जीवब्रह्मणश्चत्वारि स्थानानि। नाभिहृदयकण्ठमूर्धसु जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तितुरीयावस्थाः। आहवनीयगार्हपत्यदक्षिणसभ्याग्निषु। जागरिते ब्रह्मा स्वप्ने विष्णुः सुषुप्तौ रुद्रस्तुरीयमक्षरं चिन्मयम्। तस्माच्चतुरवस्था। चतुरङ्गुलवे- ष्टनमिव षण्णवतितत्त्वानि तन्तुवद्विभज्य तदाहितं त्रिगुणीकृत्य द्वात्रिंशत्तत्त्वनिष्कर्षमापाद्य ज्ञानपूतं त्रिगुणस्वरूपं त्रिमूर्तित्वं पृथग्विज्ञाय नवब्रह्माख्यनवगुणोपेतं ज्ञात्वा नवमानमितं त्रिःपुनस्त्रि गुणीकृत्य सूर्येन्द्रग्निकलास्वरूपत्वेनैकीकृत्याद्यन्तरेकत्वमपि मध्ये त्रिरावृत्य ब्रह्म विष्णुमहेश्वरत्वमनुसंधायाद्यान्तमेकीकृत्य चिद्ग्रन्थावद्वैतग्रन्थिं कृत्वा नाभ्यादिब्रह्म बिलप्रमाणं पृथक् पृथक् सप्तविंशतितत्त्वसंबन्धं त्रिगुणोपेतं त्रिमूर्तिलक्षणलक्षित मप्येकत्वमापाद्य वामांसादिदक्षिणाकट्यन्तं विभाव्याद्यान्तग्रहसंमेलनमेवं ज्ञात्वा मूलमेकं सत्यं मृण्मयं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्। हंसेति वर्णद्वयेनान्तःशिखोपवीतित्वं निश्चित्य ब्राह्मणत्वं ब्रह्मध्यानाईत्वं यतित्वमलक्षितान्तः शिखोपवीतित्वमेवं बहिर्लक्षितकर्म- शिखाज्ञानोपवीतं गृहस्थस्याभासब्राह्मणत्वस्य केशसमूहशिखाप्रत्यक्षकार्पासतन्तुकृ- तोपवीतत्वम्। चतुः चतुर्गुणीकृत्य चतुर्विंशतितत्त्वापादनतन्तुकृत्वं नवतत्त्वमेकमेव परंब्रह्म तत्प्रतिसरयोग्यत्वाद्वहुमार्गप्रवृत्तिं कल्पयन्ति। सर्वेषां ब्रह्मादीनां देवर्षीणां मनुष्याणां मुक्तिरेका। ब्रह्मैकमेव। ब्राह्मणत्वमेकमेव। वर्णाश्रमाचारविशेषाः पृथक्पृथक् शिखा वर्णाश्रमिणामे - ककैव। अपवर्गस्य यतेः शिखायज्ञोपवीतमूलं प्रणवमेकमेव वदन्ति। हंसः शिखा। प्रणव उपवीतम्। नादः संधानम्। एष धर्मो नेतरो धर्मः। तत्कथमिति। प्रणवहंसो नादस्त्रिवृत्सूत्रं स्वहृदि चैतन्ये तिष्ठति त्रिविधं ब्रह्म। तद्विद्धि प्रापञ्चिकशिखोपवीतं त्यजेत्॥५॥
मन्त्र ५ १८६ पंचपाद (जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय और तुरीयातीत) ब्रह्म अपने से पृथक् अविद्यारूप है या नहीं, यह भ्रान्ति कुछ नहीं है अर्थात् वह सर्वमय है। व्यष्टि और समष्टि रूप चतुष्पाद के अन्तर्गत विद्यमान जीवरूप ब्रह्म के चार स्थान हैं-नाभि, हृदय, कण्ठ और मूर्धा (सिर)। ब्रह्म चार अवस्थाओं में प्राप्त होता है-जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुर्य (तुरीय)। आहवनीय, गार्हपत्य, दक्षिण और सभ्य अग्नियों में यथाशक्य आत्मभाव करना चाहिए। जाग्रत्-अवस्था में ब्रह्मा, स्वप्नावस्था में विष्णु, सुषुप्तावस्था में रुद्र तथा तुरीयावस्था में अक्षर चिद्रूप ब्रह्म ध्यातव्य है। अब ब्रह्म को यज्ञोपवीत स्वरूप विवेचित किया जाता है, क्योंकि संन्यासी इसी ब्रह्मरूप यज्ञोपवीत को धारण करता है-चार अवस्थाएँ (जो ऊपर कही गई हैं) ही चार अँगुलियों का वेष्टन है (चार अँगुलियों में लपेट कर ही यज्ञोपवीत का निर्माण किया जाता है) जो छः बार किया जाता है। इसमें ९६ तत्त्व लपेटे जाते हैं। इसके तीन विभाग करके ३ गुने (३२×३=९६) रूप द्वारा बत्तीस तत्त्वों के निष्कर्ष का सम्पादन करके ज्ञानपूत, त्रिगुण (सत्, रज, तम) रूप (तीन गुण अर्थात् यज्ञोपवीत की तीन लड़ें) और त्रिमूर्ति रूप को पृथक् जानकर, नौ ब्रह्म अर्थात् नौ गुणों (नौ धागों) को जानकर नौ के मान से (परिमाण से) तीन को पुनः तीन गुना करके सूर्य, इन्दु(चन्द्रमा) और अग्नि की कला के स्वरूप से एकीकृत करके फिर आदि, मध्य और अन्त की तीन आवृत्तियाँ करके, ब्रह्मा, विष्णु, और महेश (रुद्र) का अनुसन्धान करके, उन आवृत्तियों को आदि से अन्त तक एक करके चिद्ग्रन्थि में अद्वैत ग्रन्थि बनाकर नाभि से लेकर ब्रह्म बिल (ब्रह्मरन्ध्र) तक के परिमाण में पृथक्-पृथक् सत्ताईस (२७) तत्त्वों से सम्बन्धित त्रिगुणयुक्त (तीन लड़ों से युक्त), त्रिमूर्तिरूप (तीन अलग- अलग रूपों में) दीखने पर भी उसमें एकत्व सम्पादन करके बाँयें कन्धे से लेकर दाहिने भाग की कमर तक इसकी भावना करके (इसे धारण करके) ही चित्त शुद्ध हो सकता है। इस यज्ञोपवीत के विषय में ऐसा जानना चाहिए कि इसमें प्रारम्भ से अन्त तक विभिन्न तत्त्वों के सम्मेलन में मूल तत्त्व एक ही है- जैसे- मिट्टी से बने हुए कुम्भ आदि विभिन्न पात्र होते हैं, पर उनमें सत्य केवल मिट्टी ही है। इसी प्रकार ब्रह्म निर्मित सभी कुछ ब्रह्म ही है, उससे पृथक् अन्य कोई सत्ता नहीं है। अस्तु सोऽहं (हंस) वही ब्रह्म मैं हूँ, ऐसा भाव सतत करना ही अन्तर्वर्ती शिखा और यज्ञोपवीतत्व है, ऐसा निश्चय करके ब्राह्मणत्व (ब्रह्म ध्यान की अर्हता- योग्यता) और यतित्व की प्राप्ति होती है। इनके (ब्राह्मणत्व और यतित्व प्राप्त व्यक्तियों की) शिखा और यज्ञोपवीत अलक्षित अर्थात् अन्तर्वर्ती होते हैं। बाहर दीखने वाले कर्म रूप शिखा और ज्ञानरूप उपवीत गृहस्थों के होते हैं। बाहर से दीखने वाले केश समूह शिखा और प्रत्यक्ष कपास के धागों से निर्मित उपवीत तो ब्राह्मणत्व अथवा वैदिक धर्मानुष्ठान योग्यता के आभासक हैं। यज्ञोपवीत के सूत्र चौबीस (२४) तत्त्वों का चौगुना (अर्थात् २४×४=९६) अर्थात् छियानवे तत्त्व रूपी ब्रह्म का ही प्रतिपादन करते हैं, यज्ञोपवीत के नौ तत्त्व (धागे) भी ब्रह्म का ही प्रतिपादन करते हैं, यज्ञोपवीत के नौ तत्त्व (धागे) भी ब्रह्म के ही प्रतिपादक हैं। ब्रह्म एक ही है, किन्तु बहुत से लोग अपनी-अपनी बुद्धि से उसकी प्राप्ति के विविध उपायों (सांख्ययोगादि) की कल्पना करते हैं। सभी ब्राह्मणों, देवर्षियों और मनुष्यों के लिए मुक्ति, ब्रह्म और ब्राह्मणत्व एक समान हैं। वर्णाश्रम और आचार पृथक्-पृथक् हैं। वर्णाश्रम व्यवस्था वालों के लिए शिखा का स्वरूप एक ही है। मोक्ष के अधिकारी यति की शिखा और यज्ञोपवीत का मूल प्रणव (ॐकार) ही है, ऐसा कहते हैं। इनके (यतियों के) लिए हंस (ब्रह्मज्ञान) ही शिखा और तुरीय ॐकार (प्रणव) ही उपवीत है तथा नाद ही इन दोनों को जोड़ने वाला अर्थात् सन्धान है। यही इनका धर्म है, अन्य कोई नहीं। इनका यह धर्म किस प्रकार है? इसका उत्तर देते हुए कहते हैं-
१८७ परब्रह्मोपनिषद् प्रणव (ॐकार) ही हंस (ब्रह्म) और नाद ही यह त्रिवृत् (तीन लड़ी) वाला सूत्र है। यह अपनी ही महिमा से अपने में स्थित है। वह चैतन्य रूप से हृदय में विराजता है। पर और अपर के भेद से इस ब्रह्म को दो प्रकार से समझना चाहिए। यदि कोई अपने से पृथक् अन्य कुछ नहीं देखता, सब आत्मरूप में ही देखता है, ऐसे मुमुक्षु को प्रपञ्चयुक्त शिखा और यज्ञोपवीत का परित्याग कर देना चाहिए ॥ ५॥ सशिखं वपनं कृत्वा बहिःसूत्रं त्यजेद्बुधः । यदक्षरं परंब्रह्म तत्सूत्रमिति धारयेत् ॥ ६ ॥ बुद्धिमानों (अर्थात् उपर्युक्त स्थिति वालों) को शिखा सहित केश कर्तन करके बाह्य उपवीत (यज्ञोपवीत) का विसर्जन कर देना चाहिए और अक्षर ब्रह्म को ही सूत्र स्वरूप धारण करना चाहिए ॥ ६ ॥ पुनर्जन्मनिवृत्त्यर्थं मोक्षस्याहर्निशं स्मरेत् । सूचनात्सूत्रमित्युक्तं सूत्रं नाम परं पदम् ॥ ७ ॥ पुनर्जन्म से निवृत्ति के लिए सतत मोक्ष का स्मरण करे। सूचना देने वाला होने से ही ब्रह्मरूपी सूत्र को परमपद रूप 'सूत्र' कहा जाता है ॥ ७ ॥ तत्सूत्रं विदितं येन स मुमुक्षुः स भिक्षुकः । स वेदवित्सदाचारः स विप्रः पंक्तिपावनः ॥ ८ ॥ उस सूत्र (ब्रह्मसूत्र) का जिसे ज्ञान हो गया, वही मुमुक्षु, भिक्षुक, वेदज्ञ, सदाचारी और विप्र है, जो अनेक प्राणियों को पावन करता है ॥ ८ ॥ येन सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव। तत्सूत्रं धारयेद्योगी योगविद्ब्राह्मणो यतिः ॥ ९ ॥ जिस परब्रह्म ने इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को मणि-मनकों की तरह एक ही सूत्र में पिरोया है, उस सूत्र को धारण करने वाला योगी, योगविद् ब्राह्मण और यति होता है ॥ ९ ॥ बहिःसूत्रं त्यजेद्विप्रो योगविज्ञानतत्परः । ब्रह्मभावमिदं सूत्रं धारयेद्यः स मुक्तिभाक् । नाशुचित्वं न चोच्छिष्टं तस्य सूत्रस्य धारणात् ॥ १० ॥ ब्राह्मण, योगविद् और ज्ञानतत्पर व्यक्ति को चाहिए कि वह बाहरी सूत्र का परित्याग कर दे; क्योंकि जो ब्रह्मभाव युक्त सूत्र को धारण करता है, वह मुक्ति का अधिकारी होता है। उस (ब्रह्मभावमय) सूत्र को धारण करने में किसी प्रकार की अपवित्रता, उच्छिष्टता (जूठा होना) नहीं रहती ॥ १० ॥ सूत्रमन्तर्गतं येषां ज्ञानयज्ञोपवीतिनाम् । ते तु सूत्रविदो लोके ते च यज्ञोपवीतिनः ॥ ११ ॥ संसार में जिन यज्ञोपवीतधारियों के यज्ञोपवीत (सूत्र) के अन्तर्गत ज्ञान समाहित है, वे ही इस जगत् में सूत्रविद् और सच्चे यज्ञोपवीतधारी हैं ॥ ११ ॥ ज्ञानशिखिनो ज्ञाननिष्ठा ज्ञानयज्ञोपवीतिनः । ज्ञानमेव परं तेषां पवित्रं ज्ञानमीरितम् ॥ १२ ॥ जो ज्ञानरूपी शिखा, ज्ञान की निष्ठा और ज्ञानरूपी यज्ञोपवीत धारण करने वाले हैं, उनके लिए ज्ञान ही सर्वस्व है; क्योंकि ज्ञान को परम पवित्र कहा गया है ॥ १२ ॥ अग्नेरिव शिखा नान्या यस्य ज्ञानमयी शिखा । स शिखीत्युच्यते विद्वान्नेतरे केशधारिणः ॥१३ ॥ जिनकी अग्नि के समान तेजस्वी ज्ञानरूपी शिखा है, अन्य कोई जिनकी शिखा नहीं है, वस्तुतः वे ही शिखी (चोटी वाले) हैं, शेष तो मात्र केशधारी हैं, ऐसा विद्वान् कहते हैं ॥ १३ ॥ कर्मण्यधिकृता ये तु वैदिके लौकिकेऽपि वा । ब्राह्मणाभासमात्रेण जीवन्ते कुक्षिपूरकाः । व्रजन्ते निरयं ते तु पुनर्जन्मनि जन्मनि ॥ १४ ॥ जो वैदिक (यज्ञादि) कर्मों अथवा लौकिक (आहार-विहार आदि) कर्मों में निरत हैं, वे तो आभास मात्र ब्राह्मण हैं; क्योंकि वे केवल उदर-पूर्ति के लिए जीते हैं, ऐसे लोग प्रत्येक जन्म के अन्त में नरक में जाते हैं (अथवा संसार के इस जन्म-मृत्यु रूपी नरक में विविध कष्ट सहते हैं) ॥ १४ ॥
मंत्र २० १८८ वामांसदक्षकट्यन्तं ब्रह्मसूत्रं तु सव्यतः। अन्तर्बहिरिवात्यर्थं तत्त्वतन्तुसमन्वितम्। नाभ्यादिब्रह्मरन्ध्रान्तप्रमाणं धारयेत्सुधीः॥ १५ ॥ सुधी (विद्वान्) के लिए उचित है कि वह बाँयें कन्धे से दाहिनी कमर पर्यन्त ब्रह्मसूत्र (यज्ञोपवीत) धारण करे। यह तो बाह्य यज्ञोपवीत की बात हुई, इसी प्रकार अन्तर में परमतत्त्व रूप तन्तु (धागे) से निर्मित ब्रह्मसूत्र नाभि से ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त यथा प्रमाण (परिमाण) धारण करे ॥ १५ ॥ तेभिर्धार्यमिदं सूत्रं क्रियाङ्गं तन्तुनिर्मितम्। शिखा ज्ञानमयी यस्य उपवीतं च तन्मयम्। ब्राह्मण्यं सकलं तस्य नेतेरेषां तु किंचन ॥ १६ ॥ इस प्रकार परमतत्त्व रूपी तन्तु से निर्मित विविध क्रियाओं के अङ्ग रूप इस ब्रह्मसूत्र को धारण करना चाहिए। जिसकी शिखा और यज्ञोपवीत ज्ञानमय होते हैं, उसके लिए सब कुछ ब्रह्ममय है, उसके अतिरिक्त कुछ नहीं है ॥ १६ ॥ इदं यज्ञोपवीतं तु परमं यत्परायणम्। विद्वांन्यज्ञोपवीती संधारयेद्यः स मुक्तिभाक् ॥ १७॥ जो विद्वान् इस परम तत्त्व रूपी और ब्रह्मपरायण यज्ञोपवीत को धारण करता है, वही सच्चा यज्ञोपवीती और मुक्ति का अधिकारी है ॥ १७ ॥ बहिरन्तश्चोपवीती विप्रः संन्यस्तुमर्हति । एकयज्ञोपवीती तु नैव संन्यस्तुमर्हति ॥ १८ ॥ जो बाहर और अन्दर दोनों प्रकार से यज्ञोपवीत धारण करता है, वही विप्र वस्तुतः संन्यास का अधिकारी है अर्थात् बाह्य यज्ञोपवीत धारण कर लौकिक-वैदिक कर्मों को विधिवत् सम्पन्न करते हुए आन्तरिक यज्ञोपवीत द्वारा जिसके अन्दर ब्रह्मतत्त्व जिज्ञासा से वैराग्य वृत्ति उत्पन्न हो गई हो, वही संन्यास का अधिकारी है। केवल एक (बाह्य) यज्ञोपवीत धारण करने वाला विप्र संन्यास का अधिकारी नहीं है ॥ १८ ॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन मोक्षापेक्षी भवेद्यतिः । बहिःसूत्रं परित्यज्य स्वान्तःसूत्रं तु धारयेत् ॥१९॥ इसलिए यति को चाहिए कि वह सभी प्रयत्नों से मोक्षापेक्षी (मुमुक्षु) बने तथा बाह्यसूत्र का परित्याग करके अपने अन्दर सूत्र को धारण करे ॥ १९ ॥ बहिःप्रपञ्चशिखोपवीतित्वमनादृत्य प्रणवहंसशिखोपवीतित्वमवलम्ब्य मोक्षसाधनं कुर्यादित्याह भगवाञ्छौनक इत्युपनिषत् ॥ २० ॥ (अन्त में) भगवान् शौनक ने कहा कि बाहरी प्रपञ्चमय शिखा और यज्ञोपवीत का परित्याग करके प्रणव हंस (ॐकार ब्रह्म) रूपी शिखा तथा यज्ञोपवीत का अवलम्बन लेकर मोक्ष के लिए प्रयत्न करे। ऐसी यह रहस्यमयी विद्या है ॥ २० ॥ ॐ भद्रं कर्णेभिः ...........................इतिः शान्तिः ॥ ॥ इति परब्रह्मोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ परमहंसपरिव्राजकोपनिषद् ॥ यह उपनिषद् अथर्ववेद से सम्बद्ध है। गद्यात्मक इस उपनिषद् में ५ बड़े अनुच्छेद हैं, जिसमें परमहंस- परिव्राजक के लक्षण, परिव्रजन के अधिकारी, परिव्रज्या प्राप्ति की विधि आदि का विवेचन किया गया है। उपनिषद् का शुभारम्भ पितामह ब्रह्मा द्वारा अपने पिता आदिनारायण से परमहंस परिव्राजक विषयक प्रश्न से हुआ है। नारायण ने उत्तर देते हुए कहा कि पहले व्यक्ति को वर्णाश्रम धर्म की मर्यादाओं का पालन करना चाहिए। तदुपरान्त क्रमशः संन्यास ग्रहण करना चाहिए। संन्यास ग्रहण की विधि का उल्लेख करते हुए नारायण ने आगे उसकी जीवनचर्या पर प्रकाश डाला है। पुनः ब्रह्माजी के पूछने पर नारायण ने ब्रह्म-प्रणव का रहस्य समझाते हुए कहा है कि यह ‘ब्रह्म प्रणव’ षोडशमात्रात्मक होता है। इसे भली प्रकार जानकर इसकी उपासना करने वाला परमहंस अन्ततः विदेह मुक्ति प्राप्त कर लेता है। इस स्थिति की प्राप्ति के बाद शिखा, यज्ञोपवीत आदि बाह्य उपचारों की आवश्यकता नहीं रहती। उसे अन्य मन्त्र-तन्त्र, उपासना-ध्यान की भी आवश्यकता नहीं रहती। वह तो ब्रह्म-प्रणव के अनुसन्धानपूर्वक सच्चिदानन्द, अद्वैत, चिद्घन स्वरूप ‘मैं ब्रह्म हूँ’—ऐसी भावना से अपने जीवन को कृतकृत्य बना लेता है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ भद्रं कर्णेभिः ............इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-अथर्वशिर उपनिषद ) अथ पितामहः स्वपितरमादिनारायणमुपसमेत्य प्रणम्य पप्रच्छ । भगवंस्त्वन्मुखा- द्वर्णाश्रमधर्मक्रमं सर्वं श्रुतं विदितमवगतम् । इदानीं परमहंसपरिव्राजकलक्षणं वेदितुमिच्छामि कः परिव्रजनाधिकारी, कीदृशं परिव्राजकलक्षणं, कः परमहंसः, परिव्राजकत्वं कथं, तत्सर्वं मे ब्रूहीति। स होवाच भगवानादिनारायणः ॥ १॥ (एक बार) पितामह (ब्रह्मा) ने अपने पिता आदि नारायण के पास जाकर उन्हें प्रणाम करके पूछा- हे भगवन् ! आपके श्रीमुख से सुनकर वर्णाश्रम धर्म का क्रम तो मैंने पूरी तरह जान लिया है। अब मैं परमहंस परिव्राजक के लक्षण जानने की इच्छा रखता हूँ। परिव्रजन का अधिकारी कौन है ? परिव्राजक के क्या लक्षण हैं ? परमहंस कौन है ? परिव्राजकत्व कैसे प्राप्त होता है? यह सब मुझे बताने की कृपा करें। भगवान् आदि- नारायण ने कहा- ॥१॥ सद्गुरुसमीपे सकलविद्यापरिश्रमज्ञो भूत्वा विद्वान्सर्वमैहिकामुष्मिकसुखश्रमं ज्ञात्वैषणा- त्रयवासनात्रयममत्वाहंकारादिकं वमनान्नमिव हेयमधिगम्य मोक्षमार्गैकसाधनो ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेत्। गृहाद्वनी भूत्वा प्रव्रजेत्। यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद्गृहाद्वा वनाद्वा। अथ पुनरव्रती वा व्रती वा स्नातको वाऽस्नातको वोत्सन्नाग्निरनग्निको वा यदहरेव विरजेत्तदहरेव प्रव्रजेदिति बुद्ध्वा सर्वसंसारेषु विरक्तो ब्रह्मचारी गृही वानप्रस्थो वा पितरं मातरं कलत्रपुत्रमाप्तबन्धुवर्गं तदभावे शिष्यं सहवासिनं वाऽनुमोदयित्वा तदङ्गैके प्राजापत्या- मेवेष्टिं कुर्वन्ति। तदु तथा न कुर्यात्। आग्नेय्यामेव कुर्यात्। अग्निर्हि प्राणः प्राणमेवैतया