१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
अध्याय २ मन्त्र १४ ७५
अध्याय २ मन्त्र १४ ७५ प्रकट होते हैं। उस दैव-परिमर अर्थात् प्राण का पूर्ण ज्ञान हो जाने के बाद यदि वे ज्ञानी पुरुष ऐसे दो ऊँचे पर्वतों को, जो पृथ्वी मण्डल के उत्तरी ध्रुव से लेकर दक्षिणी ध्रुव तक फैले हों, अपनी इच्छानुसार चलने के लिए प्रेरित करें, तो वे पर्वत इन विद्वान् श्रेष्ठ पुरुषों की आज्ञा की उपेक्षा नहीं कर सकते। इसके अतिरिक्त जो भी मनुष्य इस 'दैव परिमर' के जानकार श्रेष्ठ पुरुष से द्वेष-भाव करते हैं या फिर वह खुद ही जिनसे द्वेष रखता है, वे सब के सब सदैव के लिए विनष्ट हो जाते हैं॥ १३॥ अथातो निःश्रेयसादानं सर्वा ह वै देवता अहंश्रेयसे विवदमानाः। अस्माच्छरीरादुच्च- क्रमुस्तद्दारुभूतं शिश्येऽथैनद्वाक्प्रविवेश तद्वाचा वदच्छिश्य एव। अथैनच्चक्षुः प्रविवेश तद्वाचा वदच्चक्षुषा पश्यच्छिश्य एवाथैनच्छ्रोत्रं प्रविवेश तद्वाचा वदच्चक्षुषा पश्यच्छ्रोत्रेण शृण्वच्छिश्य एवाथैनन्मनः प्रविवेश तद्वाचा वदच्चक्षुषा पश्यच्छ्रोत्रेण शृण्वन्मनसा ध्यायच्छिश्य एवाथैनत्प्राणः प्रविवेश तत्तत एव समुत्तस्थौ ते देवाः प्राणे निःश्रेयसं विदित्वा प्राणमेव प्रज्ञात्मानमभिसंभूय सहैतैः सर्वैरस्माल्लोकादुच्चक्रमुः। ते वायुप्रतिष्ठा आकाशात्मानः स्वरीयुस्तथो एवैवं विद्वान्सर्वेषां भूतानां प्राणमेव प्रज्ञात्मानमभिसंभूय सहैतैः सर्वैरस्माच्छरीरादुत्क्रामति स वायुप्रतिष्ठ आकाशात्मा स्वरेति स तद्भवति यत्रैते देवास्तत्प्राप्य तदमृतो भवति यदमृता देवाः ॥१४ अब मोक्ष (मोक्ष हेतु सर्वश्रेष्ठ प्राण की उपासना-) आदि साधन के गुणों से विशिष्ट सर्वश्रेष्ठ प्राण की उपासना का वर्णन किया जाता है। एक समय वाणी आदि समस्त देवता अहंकार के वशीभूत हो, अपनी- अपनी महत्ता सिद्ध करने हेतु आपस में विवाद करने लगे। वे सभी प्राण के साथ ही शरीर से बहिर्गमन कर गये। उन वाणी आदि सभी इन्द्रियों के निकल जाने पर वह शरीर काष्ठ की भाँति चेष्टारहित होकर सो गया। इसके अनन्तर उस शरीर में वाणी ने प्रवेश किया। वाक् शक्ति के प्रविष्ट होते ही वह वाणी से बोलने लगा, लेकिन वह अपने स्थान से उठ न सका, सोया ही रहा। इसके बाद नेत्रेन्द्रिय ने उस शरीर में प्रवेश किया। तब वह वाणी से बोलता और चक्षु से देखता हुआ भी सोया ही रहा, उठने में प्रायः असमर्थ ही रहा। तदनन्तर उस शरीर में श्रोत्रेन्द्रिय ने प्रवेश किया। उस समय भी वह वाक् से बोलता, चक्षु से देखता एवं कानों से श्रवण करता हुआ भी सोया ही रहा, वह उठने में असमर्थ ही बना रहा। तत्पश्चात् उस शरीर में मन प्रविष्ट हुआ। तब वह शरीर वाणी से बोलता, चक्षु से देखता, कान से श्रवण करता एवं मन से सोचता (विचार करता) हुआ भी पड़ा ही रहा, उठ नहीं सका। तब सभी के बाद में प्राण ने उस शरीर में प्रवेश किया। उस प्राण तत्त्व के प्रविष्ट होते ही वह शरीर उठ बैठा। तत्पश्चात् उन वाणी आदि देवताओं ने प्राण में ही मोक्ष आदि साधन की शक्ति को जानकर एवं विशिष्ट ज्ञान स्वरूप प्राण को ही सभी तरफ से व्याप्त जानकर के प्राण-अपान आदि सभी प्राणों के सहित इस शरीर रूपी लोक से ऊर्ध्व की ओर अर्थात् शरीर से बाहर गमन किया। इसके बाद वे प्राण वायु में अर्थात् आधिदैविक प्राण में स्थिर होकर के आकाश रूप में परिणत हो स्वर्ग लोक में गये। वे अपने अधिष्ठातृ देवता अग्नि आदि के स्वरूप को प्राप्त हो गये। वैसे ही इस रहस्य को जानने वाले विद्वान् सम्पूर्ण प्राणियों के प्राण को ही प्रज्ञात्मारूप से पाकर इन प्राण-अपान आदि सभी प्राणों के साथ इस शरीर से उत्क्रमण कर, वायु में स्थित हो, आकाशरूप में परिणत हो स्वर्ग लोक को गमन करते हैं। वह मनीषी वहाँ उस प्रसिद्ध प्राण का ही रूप हो जाता है, जिसमें ये सभी वाक् आदि देवता प्रतिष्ठित होते हैं। उस प्राण-तत्त्व को पाकर वह मनीषी प्राण के उस अमृतत्व गुण से सम्पन्न हो जाता है, जिस अमृतत्व गुण से वे वाणी आदि समस्त देवता भी प्रकट होते हैं॥ १४॥
७६ कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् अथातः पितापुत्रीयं संप्रदानमिति चाचक्षते। पिता पुत्रं प्रेष्यन्नाह्वयति नवैस्तृणैरगारं संस्तीर्याग्निमुपसमाधायोदकुम्भं सपात्रमुपनिधायाहतेन वाससा संप्रच्छन्नः स्वयं श्येत एत्य पुत्र उपरिष्टादभिनिपद्यते, इन्द्रियैरस्येन्द्रियाणि संस्पृश्यापि वाऽस्याभिमुखत एवासीताथास्मै संप्रयच्छति वाचं मे त्वयि दधानीति पिता वाचं ते मयि दध इति पुत्रः प्राणं मे त्वयि दधानीति पिता प्राणं ते मयि दध इति पुत्रः। चक्षुर्मे त्वयि दधानीति पिता चक्षुस्ते मयि दध इति पुत्रः। श्रोत्रं मे त्वयि दधानीति पिता श्रोत्रं ते मयि दध इति पुत्रः। मनो मे त्वयि दधानीति पिता मनस्ते मयि दध इति पुत्रः। अन्नरसान्मे त्वयि दधानीति पिता अन्नरसांस्ते मयि दध इति पुत्रः। कर्माणि मे त्वयि दधानीति पिता कर्माणि ते मयि दध इति पुत्रः। सुखदुःखे मे त्वयि दधानीति पिता सुखदुःखे ते मयि दध इति पुत्रः। आनन्दं रतिं प्रजातिं मे त्वयि दधानीति पिता, आनन्दं रतिं प्रजातिं ते मयि दध इति पुत्रः। इत्या मे त्वयि दधानीति पिता, इत्यास्ते मयि दध इति पुत्रः। धियो विज्ञातव्यं कामान्मे त्वयि दधानीति पिता धियो विज्ञातव्यं कामांस्ते मयि दध इति पुत्रः। अथ दक्षिणावृत्प्राङुपनिष्क्रामति तं पिताऽनुमन्त्रयते यशो ब्रह्मवर्चसमन्नाद्यं कीर्तिस्त्वा जुषतामित्यथेतरः सव्यमंसमन्ववेक्षते पाणिनाऽन्तर्धाय वसनान्तेन वा प्रच्छाद्य स्वर्गाँलोकान्कामानाप्नुहीति स यद्यगदः स्यात्पुत्रस्यैश्वर्ये पिता वसेत्परि वा व्रजेद्यद्यु वै प्रेयाद्यदेवैनं समापयति तथा समापयितव्यो भवति तथा समापयितव्यो भवति ॥ १५ ॥ (प्राणोपासक का सम्प्रदान-कर्म-) अब पिता-पुत्र के सम्प्रदान कर्म का वर्णन करते हैं। जब पिता यह निश्चय करे कि मुझे अब इस शरीर का परित्याग करना है, तब वह अपने पुत्र को पास में बुलाए। तत्पश्चात् कुश-कासादि तृणों से यज्ञशाला को ढक करके विधि-विधान से अग्नि को स्थापित करे। अग्नि के उत्तर या पूर्व दिशा में जल से भरा हुआ कलश प्रतिष्ठित करे। कलश के ऊपर धान्य से भरा हुआ पूर्ण-पात्र भी रखे। स्वयं भी नवीन वस्त्र (धोती एवं उत्तरीय) का आच्छादन करे। इस तरह श्वेत शुभ्र वस्त्र एवं माला आदि धारण करते हुए घर में प्रवेश करके पुत्र को अपने पास बुलाये। जब पुत्र पास में आ जाए, तो उसे अपने अङ्क में भर ले एवं अपनी इन्द्रियों से पुत्र की इन्द्रियों का स्पर्श करे। या फिर केवल पुत्र के समक्ष बैठ जाए और उसे अपनी वाक् आदि समस्त इन्द्रियों का दान करे। पिता कहे-हे पुत्र! मैं तुम में अपनी वाक् शक्ति की स्थापना करता हूँ। पुत्र कहे-पिताजी मैं आपकी वागिन्द्रिय को ग्रहण करता हूँ। पिता-हे पुत्र! मैं अपने प्राण को तुममें स्थित करता हूँ। पुत्र-मैं आपके प्राणतत्त्व को अपने में धारण करता हूँ। पिता-हे पुत्र! मैं अपनी नेत्रेन्द्रिय की तुममें स्थापना करता हूँ। पुत्र-मैं आपके नेत्रेन्द्रिय को अपने में धारण करता हूँ। पिता- मैं अपनी श्रोत्रेन्द्रिय की तुममें स्थापना करता हूँ। पुत्र-मैं आपकी श्रोत्रेन्द्रिय को अपने में धारण करता हूँ। पिता-मैं अपने अन्न-रसों को तुममें स्थिर करता हूँ। पुत्र-मैं आपके अन्न रसों को अपने में धारण करता हूँ। पिता-मैं अपने सभी श्रेष्ठ कर्मों को तुममें स्थापित करता हूँ। पुत्र-मैं आपके समस्त शुभ कर्मों को अपने में धारण करता हूँ। पिता-मैं अपने सुख एवं दुःख को भी तुममें प्रतिष्ठित करता हूँ। पुत्र-मैं आपके सभी तरह के सुख एवं दुःखों को स्वीकार करता हूँ। पिता-हे पुत्र! मैं तुममें मैथुन जनित आनन्द, रति एवं सन्तान की उत्पत्ति की शक्ति स्थापित करता हूँ। पुत्र-मैं आपकी उस शक्ति को अपने में धारण करता हूँ। पिता-हे पुत्र! मैं अपनी गतिशक्ति तुममें स्थापित करता हूँ। पुत्र-मैं आपकी गतिशक्ति को स्वयं में ग्रहण करता हूँ। पिता-मैं अपनी बुद्धि-वृत्तियों को, बुद्धि द्वारा ज्ञात विषयों
अध्याय ३ मन्त्र १ को एवं विशेष इच्छाओं को तुममें स्थित करता हूँ। पुत्र-मैं आपकी बुद्धि वृत्तियों को, बुद्धि के द्वारा ज्ञात विषयों को एवं इच्छाओं को धारण करता हूँ। तत्पश्चात् पुत्र पिता की प्रदक्षिणा करते हुए प्राची दिशा की तरफ पिता के पास से निकलता है। उस समय पिता पुत्र को सम्बोधित करते हुए कहे-'यश, ब्रह्मतेज, अन्न को ग्रहण करने एवं पचाने की सामर्थ्य तथा श्रेष्ठ-कीर्ति ये सभी सद्गुण तुम्हारा सेवन करें।' पिता के इस तरह कहने पर पुत्र अपने बायें कन्धे की तरफ नजर घुमाकर देखते हुए हाथ से ओट-करके या फिर कपड़े को सामने करके उसकी आड़ से पिता से इस प्रकार कहे-'आप अपनी इच्छानुसार कामनायुक्त स्वर्ग को एवं वहाँ के समस्त भोगों की प्राप्ति करें।' इसके अनन्तर यदि पिता नीरोग हो, तो वह पुत्र को घर का स्वामी मानकर उसके साथ निवास करे या सर्वस्व त्यागकर घर से बाहर निकलकर संन्यासी हो जाए या फिर यदि वह दूसरे लोक को चला जाये, तो जिन-जिन वाणी आदि इन्द्रियों को उसने पुत्र में प्रतिष्ठित किया था, उन सभी की शक्ति धाराओं का वह अधिकारी बन जाता है। वे सम्पूर्ण शक्ति-धाराएँ उसे प्राप्त हो जाती हैं। (यही वास्तव में सही उत्तराधिकार है।) ॥ १५॥
॥तृतीयोऽध्यायः॥ (इन्द्र एवं प्रतर्दन का संवाद; प्रज्ञास्वरूप प्राण की महिमा का वर्णन-) प्रतर्दनो ह दैवोदासिरिन्द्रस्य प्रियं धामोपजगाम। युद्धेन च पौरुषेण च तं हेन्द्र उवाच। प्रतर्दन वरं ते ददानीति स होवाच प्रतर्दनः। त्वमेव मे वृणीष्व यं त्वं मनुष्याय हिततमं मन्यस इति तं हेन्द्र उवाच। न वै वरोऽवरस्मै वृणीते त्वमेव वृणीष्वेत्येवमवरो वै किल म इति होवाच प्रतर्दनोऽथो खल्विन्द्रः सत्यादेव नेयाय। सत्यं हीन्द्रः स होवाच। मामेव विजानीह्येतदेवाहं मनुष्याय हिततमं मन्ये। यन्मां विजानीयात्। त्रिशीर्षाणं त्वाष्ट्रमहनमरुन्मुखान्यतीन्सालावृकेभ्यः प्रायच्छं बह्वीः संधा अतिक्रम्य दिवि प्रह्लादीयानतृणमहमन्तरिक्षे पौलोमान्पृथिव्यां कालखाञ्जान्। तस्य मे तत्र न लोम च मा मीयते। स यो मां विजानीयान्नास्य केन च कर्मणा लोको मीयते। न मातृवधेन न पितृवधेन न स्तेयेन न भ्रूणहत्यया नास्य पापं च न चकृषो मुखान्नीलं वेत्तीति ॥१॥ ऐसा प्रसिद्ध है कि राजा दिवोदास के पुत्र प्रतर्दन (एक बार देवासुर-संग्राम में) देवताओं के सहायतार्थ इन्द्र के श्रेष्ठ धाम स्वर्ग लोक में गये। वहाँ उनकी अद्वितीय युद्धकला एवं शौर्य से अति संतुष्ट होकर इन्द्र ने कहा-हे प्रतर्दन ! कहो, मैं तुम्हें कौन-सा वर प्रदान करूँ? वीर प्रतर्दन ने कहा-हे देवेन्द्र ! जिस श्रेष्ठ वर को आप मानव जाति के लिए परम कल्याण युक्त मानते हों, वैसा ही कोई श्रेष्ठ वर आप स्वयं ही मेरे लिए प्रदान करें। इन्द्र ने कहा- हे राजन्! इस संसार में यह सभी जगह विदित है कि कोई भी व्यक्ति दूसरे के लिए वर की माँग नहीं करता। इसलिए आप अपने लिए कोई भी वर माँग लें। प्रतर्दन ने कहा कि तब तो मेरे लिए वर का अभाव ही रह गया। प्रतर्दन के ऐसा कहने के पश्चात् देवराज इन्द्र निश्चय ही अपने सत्य पथ पर आरूढ़ रहे, वे स्वयं ही साक्षात् सत्य के स्वरूप हैं। उन प्रख्यात देवराज इन्द्र ने कहा-हे प्रतर्दन ! तुम मुझे ही यानी मेरे ही यथार्थ स्वरूप को जानो। इसे ही मैं मानव जाति के लिए परम कल्याणकारी वर मानता हूँ। त्वष्टा प्रजापति के पुत्र विश्वरूप को, जिसके तीन सिर थे, उसे मैंने अपने वज्र के प्रहार से मार डाला है। कितने ही (मिथ्या अहंकारी) संन्यासियों को जो अपने आश्रम के श्रेष्ठ आचरण से पदच्युत हुए एवं बहिर्मुख अर्थात् ब्रह्म के श्रेष्ठ
७८ कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद्
७८ कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् विचारों से रहित हो चुके थे, ऐसे उन सभी को खण्ड-खण्ड करके भेड़ियों के सम्मुख डाल दिया है। कई बार-प्रह्लाद के सहयोगी दैत्य राजाओं को मौत की नींद सुला दिया है। पुलोम नामक असुर के सहयोगी दैत्यों एवं पृथिवी पर निवास करने वाले कालखाञ्ज नाम से युक्त अधिकांश असुरों को भी विनष्ट कर दिया; किन्तु इतने पर भी अहंकार एवं कर्मफल की कामना से रहित होने के कारण मुझ प्रसिद्ध देवेन्द्र के एक रोम को भी नुकसान नहीं पहुँचा। इसी तरह जो मुझे ठीक प्रकार से जान ले, उसके पुण्य लोक को किसी भी कर्म से हानि नहीं होती। मेरे सत्यरूप का विवेक रखने वाले मनुष्य को बड़ा से बड़ा पाप भी प्रभावित नहीं कर पाता (इन्द्रदेव वृत्तियों के रक्षक हैं। देव प्रवृत्तियों की रक्षार्थ यदि किसी आततायी का वध भी करना पड़े, तो उस क्रिया का पातक नहीं लगता। इसीलिए इन्द्र कहते हैं कि-) मेरे स्वरूप को जानने वाले को पाप नहीं लगता और न उसका मुख कभी (भय या अशक्ति के कारण) नीला पड़ता है ॥१ ॥ स होवाच प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा तं मामायुरमृतमित्युपास्व। आयुः प्राणः प्राणो वा आयुः प्राण एवामृतम्। यावद्ध्यास्मिञ्छरीरे प्राणो वसति तावदायुः। प्राणेन ह्येवामुष्मिँल्लोकेऽ- मृतत्वमाप्नोति। प्रज्ञया सत्यं संकल्पम्। स यो ममायुरमृतमित्युपास्ते सर्वमायुरस्मिँल्लोक एति। आप्नोत्यमृतत्वमक्षितिं स्वर्गे लोके। तद्धैक आहुरेकभूयं वै प्राणा गच्छन्तीति। न हि कश्चन शक्नुयात्सकृद्वाचा नाम प्रज्ञापयितुं चक्षुषा रूपं श्रोत्रेण शब्दं मनसा ध्यातुमित्येकभूयं वै प्राणाः। एकैकमेतानि सर्वाण्येव प्रज्ञापयन्ति। वाचं वदन्तीं सर्वे प्राणा अनुवदन्ति । चक्षुः पश्यत्सर्वे प्राणा अनुपश्यन्ति श्रोत्रं शृण्वत्सर्वे प्राणा अनुशृण्वन्ति मनो ध्यायत्सर्वे प्राणा अनुध्यायन्ति प्राणं प्राणन्तं सर्वे प्राणा अनुप्राणन्तीति। एवमु हैवैतदिति हेन्द्र उवाच। अस्ति त्वेव प्राणानां निःश्रेयसमिति॥ २॥ उन प्रसिद्ध इन्द्रदेव ने कहा कि "मैं स्वयं ही प्रज्ञास्वरूप प्राण हूँ। उस प्राण एवं श्रेष्ठ ज्ञान से युक्त आत्मारूप में प्रख्यात मुझ इन्द्र की तुम आयु एवं अमृतरूप से उपासना करो।" आयु ही प्राण है, प्राण ही आयु एवं प्राण ही अमृतत्व है। इस शरीर में जब तक प्राण का निवास है, तभी तक आयु है। प्राण के द्वारा ही प्राणी अन्य दूसरे लोक में अमृतत्व के विशेष सुख की अनुभूति करता है। प्रज्ञा द्वारा व्यक्ति शाश्वत सत्य का निश्चय एवं ऊहा-पोह आदि करता है। जो व्यक्ति 'आयु' एवं 'अमृत' के रूप से मेरी अर्थात् इन्द्र की उपासना करता है, वह इस लोक में पूर्णायु का गौरव प्राप्त करता है और स्वर्ग लोक में जाकर अक्षय अमृतत्व के सुख का भागीदार बनता है। इस प्राण के सन्दर्भ में कोई-कोई विद्वज्जन ऐसा कहते हैं कि निश्चय ही सभी प्राण (वाक् आदि समस्त इन्द्रियों सहित प्राण) एकीभाव को प्राप्त करते हैं। कोई भी व्यक्ति एक ही समय में वाणी द्वारा नाम सूचित करने, नेत्र द्वारा रूप देखने, कान से शब्द श्रवण करने एवं मन के द्वारा ध्यान करने में समर्थ नहीं हो सकता, इससे यह सिद्ध होता है कि निश्चय ही सभी प्राण अपने एक ही भाव को प्राप्त करते हैं। वे सभी प्राण एकीकृत हो समस्त कार्य करते हैं। ये सब एक-एक विषय की क्रमशः अनुभूति करते हैं। जब वाक्-इन्द्रिय बोलने लगती है, उस समय सभी प्राण उसका (वाणी का) मौन रूप से अनुमोदन करते हैं। जब चक्षु देखता है, तब अन्य सभी प्राण भी उसके पृष्ठ भाग में रहकर दृष्टिपात करते हैं। जब कान श्रवण करने लगता है, तब दूसरे अन्य समस्त प्राण भी उस कर्णेन्द्रिय का अनुसरण करते हैं। जब मन ध्यान करने लगता है, तब अन्य सभी प्राण भी उसका साथ देते हुए चिन्तन करते हैं और जब मुख्य प्राण अपना कार्य करना प्रारम्भ करता है, तो अन्य समस्त प्राणेन्द्रियाँ भी उसके साथ-साथ वैसी चेष्टा
अध्याय ३ मन्त्र ३ ७९
अध्याय ३ मन्त्र ३ ७९ करती हैं, ऐसा प्रतर्दन ने निवेदन किया। इस तरह से उन देवों में श्रेष्ठ इन्द्र ने कहा-यह बात ऐसी ही है। 'समस्त प्राण एक होते हुए भी जो अन्य पाँच प्राण हैं, वे निःश्रेयस अर्थात् परम कल्याण स्वरूप हैं निश्चय ही यही बात है ॥ २ ॥' जीवति वागपेतो मूकान्हि पश्यामो जीवति चक्षुरपेतोऽन्धान्हि पश्यामो जीवति श्रोत्रापेतो बधिरान्हि पश्यामो जीवति मनोपेतो बालान्हि पश्यामो जीवति बाहुच्छिन्नो जीवत्यूरुच्छिन्न इति। एवं हि पश्याम इति। अथ खलु प्राण एव प्रज्ञात्मेदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति। तस्मादेतदेवोऽथ्मुपासीत। यो वै प्राणः सा प्रज्ञा या वा प्रज्ञा स प्राणः। सह ह्येतावस्मिञ्शरीरे वसतः सहोत्क्रामतस्तस्यैषैव दृष्टिः। एतद्विज्ञानम्। यत्रैतत्पुरुषः सुप्तः स्वप्नं न कंचन पश्यत्यथास्मिन्प्राण एवैकधा भवति। तदैनं वाक्सर्वैर्नामभिः सहाप्येति चक्षुः सर्वै रूपैः सहाप्येति श्रोत्रं सर्वैः शब्दैः सहाप्येति मनः सर्वैर्ध्यानैः सहाप्येति। स यदा प्रतिबुध्यते। यथाग्नेर्ज्वलतः सर्वा दिशो विस्फुलिङ्गा विप्रतिष्ठेरन्नेवमेवैतस्मादात्मनः प्राणा यथायतनं विप्रतिष्ठन्ते प्राणेभ्यो देवा देवेभ्यो लोकाः। तस्यैवैव सिद्धिः एतद्विज्ञानम्। यत्रैतत्पुरुष आर्तो मरिष्यन्नाबल्यं न्येत्य संमोहं न्येति तदाहुः। उदक्रमीच्चित्तम्। न श्रृणोति न पश्यति न वाचा वदति न ध्यायत्यथास्मिन्प्राण एवैकधा भवति तदैनं वाक्सर्वैर्नामभिः सहाप्येति चक्षुः सर्वै रूपैः सहाप्येति श्रोत्रं सर्वैः शब्दैः सहाप्येति मनः सर्वैर्ध्यानैः सहाप्येति यदा प्रतिबुध्यते यथाग्नेर्ज्वलतो विस्फुलिङ्गा विप्रतिष्ठेरन्नेवमेवैतस्मादात्मनः प्राणा याथायतनं विप्रतिष्ठन्ते प्राणेभ्यो देवा देवेभ्यो लोकाः ॥३॥ 'वागिन्द्रिय से रहित होने पर भी व्यक्ति जीवित बना रहता है, क्योंकि गूँगों को प्रत्यक्ष ही देखा जाता है। नेत्रों से रहित होने पर भी व्यक्ति जीवन धारण किये रहता है, क्योंकि अंधों को प्रायः देखते ही हैं। श्रोत्रेन्द्रिय हीन व्यक्ति भी जीवित ही रहता है, क्योंकि बधिरों को प्रायः ही देखा जाता है। मनः शक्ति से रहित होने पर भी जीवन धारण किया जा सकता है, क्योंकि प्रायः ही छोटे बालकों को जीवित देखते हैं। प्राण के रहते, अंग- भंग हो जाने पर भी जीवन बना रहता है, किन्तु प्राण के रहित होने पर तो एक क्षण भी जीवन धारण करना असम्भव है। क्रिया शक्ति का बोध कराने वाला प्राण ही ज्ञान में प्रवृत्ति कराने वाले ज्ञान से युक्त आत्मा है। यही प्रज्ञात्मा इस शरीर को सभी तरफ से आबद्ध करके भिन्न-भिन्न क्रियायें कराता रहता है। अतः इस प्राण की ही 'उक्थ' रूप से उपासना करनी चाहिए। निश्चय ही जो प्रसिद्ध प्राण है, वही प्राण है या फिर जो प्रज्ञा कही गई है, वही प्राण है; क्योंकि प्रज्ञा एवं प्राण दोनों साथ-साथ ही इस शरीर में निवास करते हैं तथा जीवात्मा के साथ मिलकर एक साथ ही इस शरीर से उत्क्रमण करते अर्थात् बाहर निकलते हैं। इस प्राणमय परब्रह्म का यही दर्शन (ज्ञान) है और यही विज्ञान है; क्योंकि सुषुप्त अवस्था में जब सोया हुआ मनुष्य किसी भी तरह के स्वप्न नहीं देखता, उस समय शब्द सभी नामों के साथ, नेत्र रूपानुभूति सहित, कान शब्दों सहित और मन, चिन्तन सहित मुख्य प्राण में ही समाहित हो जाते हैं। वह मनुष्य जब जाग्रत् अवस्था को प्राप्त होता है, तब उस समय जैसे जलती हुई अग्नि से सभी दिशाओं की ओर चिनगारियाँ निकलती हैं, वैसे ही इस प्राण स्वरूप आत्मा से सभी वाणी आदि प्राण बाहर निकल कर अपने-अपने उचित स्थान की ओर गमन कर जाते हैं। तत्पश्चात् उन प्राणों से उनके अधिष्ठाता अग्नि आदि देवगण प्रादुर्भूत होते हैं तथा उन देवों से लोक एवं नामादि विषय उत्पन्न होते हैं। इस प्राणरूप आत्मा की सिद्धि का वर्णन आगे किया जा रहा है। यही विज्ञान है कि जिस अवस्था में
८० काषाताक ब्राह्मणापनिषद
८० काषाताक ब्राह्मणापनिषद रोग से पीड़ित व्यक्ति मरणासन्न हो जाता है, शक्तिहीन होकर चेतना रहित हो जाता है, उस समय वह किसी भी प्रिय अथवा परिचित व्यक्ति को पहचानने में समर्थ नहीं होता, उस समय कहते हैं कि उसका चित्त (मन) उत्क्रमण कर गया है। यही कारण है कि वह न तो सुनता, न कुछ देखता है, न वाणी से कुछ बोलता है और न ही ध्यान करता है। उस समय वह केवल प्राणों में ही लीन हो जाता है। ऐसी स्थिति में वाणी समस्त नामों के सहित, चक्षु सभी रूपों के सहित, कान सभी शब्दों के सहित एवं मन सभी ध्यानस्थ विषयों के सहित, उस प्राण तत्त्व में विलीन हो जाता है। वह मनुष्य जब फिर से जागता है, उस समय जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि से सभी दिशाओं की तरफ चिनगारियाँ प्रस्फुटित होती हैं, उसी प्रकार इस प्राण स्वरूप आत्मा से वाणी आदि समस्त प्राण उत्पन्न होकर यथा-स्थान अपना स्वरूप ग्रहण कर लेते हैं। तदनन्तर प्राणों से उनके अधिष्ठाता अग्नि आदि सभी देवता प्रादुर्भूत होकर समस्त लोक आदि को उत्पन्न कर देते हैं॥ ३॥ स यदाऽस्माच्छरीरादुत्क्रामति सहैवैतैः सर्वैरुत्क्रामति वागस्मात्सर्वाणि नामान्यभिवि सृजते। वाचा सर्वाणि नामान्याप्नोति प्राणोऽस्मात्सर्वान्गन्धानभिविसृजते प्राणेन सर्वान्गन्धाना- प्नोति चक्षुरस्मात्सर्वाणि रूपाण्यभिविसृजते चक्षुषा सर्वाणि रूपाण्याप्नोति श्रोत्रमस्मात्सर्वाञ्श- ब्दानभिविसृजते श्रोत्रेण सर्वाञ्शब्दानाप्नोति मनोऽस्मात्सर्वाणि ध्यानान्यभिविसृजते मनसा सर्वाणि ध्यानान्याप्नोति सैषा प्राणे सर्वाप्तिः। यो वै प्राणः सा प्रज्ञा या वा प्रज्ञा स प्राणः सह ह्येतावस्मिञ्शरीरे वसतः सहोत्क्रामतः। अथ खलु यथाऽस्यै प्रज्ञायै सर्वाणि भूतान्येकं भवन्ति तद्व्याख्यास्यामः॥ ४॥ शरीर से उन्मुक्त होने वाला वह प्राण जब उत्क्रमण करता है, तब उस समय वह इन सभी इन्द्रियों के सहित ही उत्क्रमण करता है। उस समय वाक्-इन्द्रिय इस पुरुष के सभी नामों का परित्याग कर देती है; क्योंकि वागिन्द्रिय से ही मनुष्य नामों को ग्रहण कर पाता है। (ऐसा ही तथ्य सभी इन्द्रियों के विषय में है।) प्राण (घ्राणेन्द्रिय) सभी गंधों का त्याग कर देती है, चक्षु सभी रूपों को त्याग देता है, कर्णेन्द्रिय सभी तरह के शब्दों का परित्याग कर देती है और मन ध्यानस्थ विषयों का परित्याग कर देता है। इसी प्राणरूप आत्मा में समस्त इन्द्रियाँ समर्पित होकर अपने-अपने विषयों का पूर्ण रूप से परित्याग कर देती हैं। प्राण ही प्रज्ञा है और प्रज्ञा ही प्राण है अथवा जो प्रज्ञा है, वही प्राण है; क्योंकि ये दोनों इस शरीर में एक साथ ही निवास करते हैं और एक साथ ही इस शरीर से उत्क्रमण करते हैं। अब जिस तरह से समस्त भूत-प्राणी इस प्रज्ञा में एक रूप हो जाते हैं, इसकी (अगले मंत्र में) स्पष्ट शब्दों में व्याख्या करेंगे॥ ४॥ वागेवास्या एकमङ्गमदूदृढं तस्यै नाम परस्तात्प्रतिविहिता भूतमात्रा। घ्राणमेवास्या एकमङ्गमदूदृढं तस्य गन्धः परस्तात्प्रतिविहिता भूतमात्रा चक्षुरेवास्या एकमङ्गमदूदृढं तस्य रूपं परस्तात्प्रतिविहिता भूतमात्रा श्रोत्रमेवास्या एकमङ्गमदूदृढं तस्य शब्दः परस्तात्प्रतिविहिता भूतमात्रा जिह्वैवास्या एकमङ्गमदूदृढं तस्या अन्नरसः परस्तात्प्रतिविहिता भूतमात्रा हस्तावेवास्या एकमङ्गमदूदृढं तयोः कर्म परस्तात्प्रतिविहिता भूतमात्रा शरीरमेवास्या एकमङ्गमदूदृढं तस्य सुखदुःखे परस्तात्प्रतिविहिता भूतमात्रोपस्थ एवास्या एकमङ्गमदूदृढं तस्यानन्दो रतिः प्रजातिः परस्तात्प्रतिविहिता भूतमात्रा पादावेवास्या एकमङ्गमदूदृढं तयोरित्या परस्तात्प्रतिविहिता भूतमात्रा प्रज्ञैवास्या एकमङ्गमदूदृढं तस्यै धियो विज्ञातव्यं कामाः परस्तात्प्रतिविहिता भूतमात्रा॥ ५॥
अध्याय ३ मन्त्र ६ ८१
अध्याय ३ मन्त्र ६ ८१ निश्चय ही इस वाणी ने इस प्रज्ञा के एक अंग की क्षति-पूर्ति की है। बाहर की ओर उसके (वाणी के) विषय रूप से कल्पित ( भूतमात्रा अर्थात् पञ्चभूतों का अंश-विशेष ) नाम-शब्द है। घ्राणेन्द्रिय ने भी इस प्रज्ञा के एक अंग की पूर्ति की है। बाहर की तरफ उस घ्राणेन्द्रिय के विषयरूप से जो कल्पित भूतमात्रा है, वह गन्ध है। चक्षु ने भी इस प्रज्ञा के एक अंग की पूर्ति की है। बाहर की तरफ से उसके विषय रूप से कल्पित जो भूतमात्रा है, वही रूप है। ऐसे ही कर्णेन्द्रिय ने भी इस प्रज्ञा के एक अंग की क्षति-पूर्ति की है। बाहर की तरफ से उसके विषय रूप से कल्पित जो भूत मात्रा है, वही शब्द है। स्वादेन्द्रिय ने भी इस प्रज्ञा के एक अंग की पूर्ति की है। बाहर की तरफ से उसके विषय रूप से कल्पित जो भूत मात्रा है,वही अन्न का रस है। इसी प्रकार निश्चय ही हाथो ने भी प्रज्ञा के एक अंग की पूर्ति की है। बाहर की ओर से उनके विषय रूप से कल्पित जो भूत मात्रा है, वही कर्म है। ऐसे ही शरीर ने भी प्रज्ञा के एक अंग की पूर्ति की है। बाहर की ओर उसके विषय रूप से कल्पित जो भूत मात्रा है, वही सुख एवं दुःख है। इसी तरह निश्चय ही उपस्थ ने भी उस प्रज्ञा के एक अंग की पूर्ति की है, बाहर की तरफ उसके विषय रूप से कल्पित जो भूत मात्रा है, वही रति, आनन्द एवं प्रजा (सन्तान) की उत्पत्ति है। अवश्य ही पैरों ने भी इस प्रज्ञा के एक अंग की पूर्ति की है। बाहर की ओर उनके विषय रूप से कल्पित जो भूतमात्रा है, वहँ विचरण-क्रिया है। ऐसे ही प्रज्ञा के एक अंग की प्रज्ञा ने ही पूर्ति की है। उस (प्रज्ञा) से सम्बन्धित बाह्य विषय रूप से कल्पित जो भूतमात्रा है, वह बुद्धि के द्वारा अनुभूत वस्तुएँ एवं मनुष्योचित इच्छाएँ-कामनाएँ हैं॥ ५॥ प्रज्ञया वाचं समारुह्य वाचा सर्वाणि नामान्याप्नोति। प्रज्ञया प्राणं समारुह्य प्राणेन सर्वान्गन्धानाप्नोति प्रज्ञया चक्षुः समारुह्य चक्षुषा सर्वाणि रूपाण्याप्नोति प्रज्ञया श्रोत्रं समारुह्य श्रोत्रेण सर्वाञ्शब्दानाप्नोति प्रज्ञया जिह्वां समारुह्य जिह्वया सर्वानन्नरसानाप्नोति प्रज्ञया हस्तौ समारुह्य हस्ताभ्यां सर्वाणि कर्माण्त्याप्नोति प्रज्ञया शरीरं समारुह्य शरीरेण सुखदुःखे आप्नोति प्रज्ञयोपस्थं समारुह्योपस्थेनानन्दं रतिं प्रजातिमाप्नोति प्रज्ञया पादौ समारुह्य पादाभ्यां सर्वा इत्या आप्नोति प्रज्ञयैव धियं समारुह्य प्रज्ञयैव धियो विज्ञातव्यं कामानाप्नोति ॥ ६ ॥ प्रज्ञा के द्वारा वाणी पर आरूढ़ हो, अर्थात् वाणी की वश में करके मनुष्य वाक् शक्ति के द्वारा नामों को स्वीकार करता है। प्रज्ञा द्वारा ही प्राण (घ्राणेन्द्रिय) पर अधिकार करके सभी तरह की गन्धों को स्वीकार करता है। प्रज्ञा द्वारा ही नेत्रों को वश में रखकर समस्त रूपों को ग्रहण करता है। प्रज्ञा से ही मनुष्य श्रोत्रेन्द्रिय पर आरूढ़ होकर उसके द्वारा सभी तरह के शब्दों की स्वीकार करता है। प्रज्ञा द्वारा ही जिह्वा की वश में करके सम्पूर्ण अन्न के रसों को प्राप्त करता है। प्रज्ञा से ही हाथों को वश में करके हाथों द्वारा सभी प्रकार के कार्यों को पूर्ण करता है। प्रज्ञा द्वारा ही शरीर को वश में रखकर शरीर से भोग एवं पीड़ा जनित सुख-दुःखों को स्वीकार करता है। प्रज्ञा से ही उपस्थ को वश में रखकर उसके द्वारा रति, आनन्द एवं प्रजनन सामर्थ्य को प्राप्त करता है। प्रज्ञा द्वारा ही पैरों को वश में करके पैरों द्वारा सम्पूर्ण विचरण क्रियाओं को स्वीकार करता है एवं प्रज्ञा से ही बुद्धि को वश में करके उस (बुद्धि) के द्वारा अनुभूति जन्य वस्तुओं एवं कामनाओं की ग्रहण करता है ॥ ६ ॥ न हि प्रज्ञापेता वाङ् नाम किंचन प्रज्ञापयेत् । अन्यत्र मे मनोऽभूदित्याह । नाहमेतन्नाम प्राज्ञासिषमिति । न हि प्रज्ञापेतः प्राणो गन्धं कंचन प्रज्ञापयेदन्यत्र मे मनोऽभूदित्याह नाहमेतं गन्धं प्राज्ञासिषमिति । न हि प्रज्ञापेतं चक्षू रूपं किंचन प्रज्ञापयेदन्यत्र मे मनोऽभूदित्याह। नाहमेतद्रूपं प्राज्ञासिषमिति न प्रज्ञापेतं श्रोत्रं शब्दं कंचन प्रज्ञापयेदन्यत्र मे मनोऽभूदित्याह। नाहमेतं शब्दं
८२ कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद्
८२ कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् प्राज्ञासिषमिति न हि प्रज्ञापेता जिह्वाऽन्नरसं कांचन प्रज्ञापयेदन्यत्र मे मनोऽभूदित्याह । नाहमेतमन्नरसं प्राज्ञासिषमिति न प्रज्ञापेतौ हस्तौ कर्म किंचन प्रज्ञापयेतामन्यत्र मे मनोऽभूदित्याह नाहमेतत्कर्म प्राज्ञाससिषमिति न हि प्रज्ञापेतं शरीरं सुखं दुःखं किंचन प्रज्ञापयेदन्यत्र मे मनोऽभूदित्याह नाहमेतत्सुखं दुःखं प्राज्ञासिषमिति न हि प्रज्ञापेत उपस्थ आनन्दं रतिं प्रजातिं कांचन प्रज्ञापयेदन्यत्र मे मनोऽभूदित्याह । नाहमेतमानन्दं न रतिं न प्रजातिं प्राज्ञासिषमिति न हि प्रज्ञापेतौ पादावित्यां कांचन प्रज्ञापयेतामन्यत्र मे मनोऽभूदित्याह । नाहमेतामित्यां प्राज्ञासिषमिति । न हि प्रज्ञापेता धीः काचन सिध्येन्न प्रज्ञातव्यं प्रज्ञायेत ॥ ७ ॥ प्रज्ञा के अभाव में वाणी किसी भी नाम का ज्ञान नहीं करा सकती; क्योंकि ऐसी अवस्था में व्यक्ति इस तरह कहता है कि मेरा मन अमुक ओर था, अतः मैं इस नाम को नहीं जान सका। प्रज्ञा से हीन होने पर घ्राण (घ्राणेन्द्रिय) भी किसी गन्ध का बोध नहीं करा सकता। ऐसी स्थिति में व्यक्ति इस प्रकार कहता है कि मेरा मन दूसरी जगह चला गया था, इस कारण से मैं इस घ्राणेन्द्रिय की गन्ध को जानने में असमर्थ रहा, ऐसे ही प्रज्ञा से रहित होने पर, चक्षु-इन्द्रिय भी किसी भी तरह के रूप का ज्ञान नहीं करा सकती। ऐसी दशा में व्यक्ति ऐसा कहता है कि 'मेरा मन उस समय अन्यत्र था, अतः मैं इसके उस रूप को नहीं जान सका।' प्रज्ञा से अलग रहकर कर्णेन्द्रिय भी किसी तरह के शब्द का बोध नहीं करा सकती। ऐसी दशा में व्यक्ति यह कहता है कि मेरा मन उस समय अन्यत्र गमन कर रहा था, इस कारण से मैं इन शब्दों को नहीं जान सका। प्रज्ञा से रहित होने पर जिह्वा किसी भी अन्न के रस का अनुभव नहीं कर सकती। ऐसी स्थिति में व्यक्ति, 'यह कहता है कि मेरा मन अन्यत्र चला गया था', अतः मैं अन्न के रस की अनुभूति नहीं कर पाया।' प्रज्ञा से रहित होते हुए हाथ किसी भी तरह के कर्म का बोध नहीं करा सकते। ऐसी दशा में मानव यह कहता है कि उस समय मेरा मन अन्यत्र गमन कर गया था। इसलिए मैं इस अमुक कार्य को नहीं समझ सका। प्रज्ञा से अलग रहते हुए शरीर भी किसी तरह के सुख-दुःख की अनुभूति नहीं करा सकता। ऐसी स्थिति में मनुष्य कहता है कि 'मेरा मन अन्यत्र गमन कर गया था।' अतः मैं इस शरीर के सुख-दुःखों को नहीं समझ सका। प्रज्ञा से रहित होकर उपस्थ भी किसी तरह के आनन्द, रति एवं प्रजा की उत्पत्ति का ज्ञान नहीं करा सकता है। उस स्थिति में व्यक्ति कहता है कि 'मेरा मन उस समय अन्यत्र था, इस कारण से मैं उस आनन्द, रति एवं प्रजा के उत्पत्ति की जानकारी नहीं पा सका। प्रज्ञा से अलग रहकर दोनों पैर भी किसी तरह की गमन क्रिया का ज्ञान नहीं करा सकते, उस स्थिति में व्यक्ति यह कहता है कि 'मेरा मन उस समय अन्य किसी स्थान की ओर चला गया था, इस कारण मैं इस आवागमन की क्रिया का अनुभव नहीं कर सका। प्रज्ञा के अभाव में कोई भी बौद्धिक-वृत्ति नहीं सिद्ध हो सकती है, उस बुद्धि वृत्ति के द्वारा ज्ञात वस्तु के ज्ञान का अहसास नहीं हो सकता ॥ ७॥ न वाचं विजिज्ञासीत वक्तारं विद्यान्न गन्धं विजिज्ञासीत घ्रातारं विद्यान्न रूपं विजिज्ञासीत रूपविद्धं विद्यान्न शब्दं विजिज्ञासीत श्रोतारं विद्यान्नान्नरसं विजिज्ञासीतान्नरसस्य विज्ञातारं विद्यान्न कर्म विजिज्ञासीत कर्तारं विद्यान्न सुखदुःखे विजिज्ञासीत सुखदुःखयोर्विज्ञातारं विद्यान्नानन्दं न रतिं न प्रजातिं विजिज्ञासीतानन्दस्य रतेः प्रजातेर्विज्ञातारं विद्यान्नेत्यां विजिज्ञासीतैतारं विद्यात् । न मनो विजिज्ञासीत मन्तारं विद्यात् । ता वा एता दशैव भूतमात्रा अधिप्रज्ञं दश प्रज्ञामात्रा अधिभूतं यद्धि भूतमात्रा न स्युर्न प्रज्ञामात्राः स्युर्यद्वा प्रज्ञामात्रा न स्युर्न भूतमात्राः स्युः ॥ ८ ॥
अध्याय ३ मन्त्र ९ ८३
अध्याय ३ मन्त्र ९ ८३ वाक् शक्ति को जानने की इच्छा नहीं करनी चाहिए; वरन् वाणी को प्रेरित करने वाले आत्मा को जानना चाहिए। गन्ध को जानने का प्रयास नहीं करना चाहिए, बल्कि गन्ध को ग्रहण करने वाले आत्मा को जानना चाहिए; रूप को जानने की इच्छा नहीं करनी चाहिए, रूप के ज्ञाता साक्षी स्वरूप आत्मा को जानना चाहिए; शब्द को जानने की इच्छा नहीं करनी चाहिए, शब्द श्रवण करने वाले आत्मा को जानने की इच्छा रखनी चाहिए। अन्न-रस के ज्ञान की कामना व्यर्थ है, अन्न-रस के ज्ञाता आत्मा को जानना चाहिए। कर्म को जानने की इच्छा नहीं रखनी चाहिए, कर्म-कर्त्तारूप आत्मा को जानना चाहिए। सुख-दुःख आदि के जानने की इच्छा नहीं करनी चाहिए, सुख-दुःख के विशेषज्ञ साक्षी रूप आत्मा को जानना चाहिए। आनन्द, रति एवं प्रजनन सामर्थ्य के जानने की इच्छा नहीं करनी चाहिए; वरन् आनन्द, रति एवं प्रजनन सामर्थ्य के जानकार (आत्मतत्त्व) को समझना चाहिए; विचरण की क्रिया को समझने की इच्छा नहीं करनी चाहिए, विचरण करने वाले साक्षी स्वरूप आत्मा को ही जानने का प्रयास करना चाहिए। इसी तरह मन को भी जानने की अभिलाषा नहीं रखनी चाहिए; बल्कि मनन करने वाले आत्मा को ही जानना चाहिए। इस प्रकार ये दस ही भूत मात्राएँ अर्थात् नाम आदि विषय हैं; जो प्रज्ञा में विद्यमान हैं एवं प्रज्ञा की भी दस मात्राएँ (वाणी आदि इन्द्रिय रूप) हैं, जो कि समस्त प्राणियों में विद्यमान हैं। यदि ये प्रख्यात समस्त भूत मात्राएँ न हों, तो प्रज्ञा की मात्राएँ भी स्थित नहीं रह सकतीं और यदि प्रज्ञा की मात्राएँ न हों, तो भूत मात्राएँ भी स्थित नहीं रह सकतीं ॥८ ॥ न ह्यान्यतरतो रूपं किंचन सिद्ध्येत्। नो एतन्नाना, तद्यथा रथस्यारेषु नेमिरर्पितो नाभावरा अर्पिता एवमेवैता भूतमात्राः प्रज्ञामात्रास्वर्पिताः प्रज्ञामात्राः प्राणेऽर्पिताः स एष प्राण एव प्रज्ञात्मानन्दोऽजरोऽमृतः। न साधुना कर्मणा भूयान्नो एवासाधुना कनीयान्। एष ह्येवैनं साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषत एष उ एवैनमसाधु कर्म कारयति तं यमधो निनीषते। एष लोकपाल एष लोकाधिपतिरेष सर्वेशः स म आत्मेति विद्यात्स म आत्मेति विद्यात् ॥ ९ ॥ इन दोनों में से किसी भी एक के माध्यम से किसी भी रूप, विषय अथवा इन्द्रिय की सिद्धि नहीं हो सकती है। प्रज्ञा मात्रा और भूतमात्रा के स्वरूप में कोई भेद नहीं है। उसे इस तरह से जानना चाहिए, जिस प्रकार रथ की नेमि अरों में और अरे रथ की नाभि के आश्रित रहते हैं; उसी प्रकार ही ये समस्त भूत मात्राएँ प्रज्ञा मात्राओं में विद्यमान हैं एवं प्रज्ञा मात्राएँ प्राण में स्थित हैं। यह प्राण ही प्रज्ञात्मा, आनन्दस्वरूप, अजर- अमर है। यह न तो अच्छे कर्म से वृद्धि को प्राप्त होता है और न ही बुरे कर्म से छोटा होता है। यह प्राण एवं प्रज्ञा रूप चैतन्य युक्त परब्रह्म ही इस देहाभिमानी पुरुष से श्रेष्ठ कार्य करवाता है। वह ऐसे श्रेष्ठ कृत्य उसी से करवाता है, जिसे वह इन प्रत्यक्ष लोकों से ऊर्ध्व की तरफ ले जाना चाहता है और जिसे वह इन श्रेष्ठ लोकों की अपेक्षा नीचे ले जाना चाहता है, उससे अशुभ कार्य करवाता है। यह आत्मा समस्त लोकों का अधिपति है एवं यही सभी का स्वामी है। इन सभी श्रेष्ठ गुणों से युक्त वह प्राण ही आत्मा है, ऐसा जानना चाहिए। वह प्राण ही हमारा आत्मा है, ऐसा जानना चाहिए। वह प्राण ही हमारा आत्मा है, ऐसा ही जानना चाहिए ॥ ९ ॥
८४ कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद्
८४ कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् ॥ चतुर्थोऽध्यायः ॥ काशी नरेश अजातशत्रु एवं ब्रह्मर्षि गार्ग्य का संवाद- अथ गार्ग्यो ह वै बालाकिरनूचानःसंस्पृष्ट आस सोऽवददुशीनरेषु स वसन्मत्स्येषु कुरुपञ्चालेषु काशिविदेहेष्विति स हाजातशत्रुं काश्यमेत्योवाच। ब्रह्म ते ब्रवाणीति तं होवाचा- जातशत्रुः। सहस्रं दद्मस्त इत्येतस्यां वाचि जनको जनक इति वा उ जना धावन्तीति ॥ १ ॥ गर्ग गोत्र में प्रादुर्भूत बलाका ऋषि के पुत्र एवं गार्ग्य के नाम से प्रख्यात एक ब्राह्मण-ऋषि थे। उन्होंने चारों वेदों का पूर्ण अध्ययन किया था, साथ ही वेदों के अच्छे प्रख्यात वक्ता भी थे। उस समय जगत् में उनकी बड़ी ख्याति थी। उनका निवास उशीनर प्रदेश में था, किन्तु सतत गतिशील रहने के कारण, वे कभी मत्स्यदेश, तो कभी कुरु-पाञ्चाल में रहा करते थे। इस भाँति वे प्रख्यात गार्ग्य एक काशी के विद्वान् राजा अजातशत्रु के समीप में पहुँचे और अहंकार से युक्त वाणी में बोले-'हे राजन्! मैं आपके लिए ब्रह्मतत्त्व का उपदेश करूँगा।' गार्ग्य के इस तरह से कहने पर उन प्रसिद्ध काशी नरेश ने कहा-'हे ब्रह्मन् ! आपकी इस बात पर हम आपको एक सहस्र गौएँ प्रदान करते हैं। अवश्य ही आज-कल लोग प्रायः जनक-जनक कहते हुए ही उनके पास में दौड़ जाते हैं (अर्थात् राजा जनक ही इस ब्रह्मविद्या के श्रोता एवं दानी हैं, इस प्रकार कहकर प्रायः लोग उन्हीं के समीप में जाते हैं, आज आप हमारे पास आकर विदेहराज जनक की भाँति हमारा गौरव बढ़ाया है, इसलिए हम आपको सहर्ष एक सहस्र गौएँ प्रदान करते हैं) ॥ १ ॥ स होवाच बालाकिर्य एवैष आदित्ये पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठाः । बृहन्पाण्डरवासा अतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धेति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्तेऽतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धा भवति ॥ २ ॥ तब वे प्रसिद्ध बलाका-पुत्र विप्रवर गार्ग्य जी कहने लगे-'हे राजन्! यह जो सूर्यमण्डल में अन्तर्यामी परमेश्वर स्थित है, मैं उसी की ब्रह्मबुद्धि से साधना करता हूँ।' ऐसा सुनकर उन श्रेष्ठ ऋषि से काशी नरेश अजातशत्रु बोले-'हे ब्रह्मन् ! नहीं-नहीं, इस विषय में आप कुछ भी न कहें। अवश्य ही यह शुक्लवस्त्रधारी सभी से महान् है। यह सभी का अतिक्रमण करता हुआ सबसे उच्च स्थिति में केन्द्रित है, यह सबका शीश है। इस तरह से मैं इसकी उपासना करता हूँ, जो मनुष्य सूर्य मण्डल में स्थित उस विराट् पुरुष की इस तरह से उपासना करता है, वह सभी का अतिक्रमण कर सबसे उच्च स्थिति में पहुँचता है एवं समस्त भूत-प्राणियों का शीश माना जाता है ॥ २ ॥ स होवाच बालाकिर्य एवैष चन्द्रमसि पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठाः सोमो राजाऽन्नस्यात्मेति वा अहमेतमुपास इति स यो मेवमुपास्तेऽन्नस्यात्मा भवति ॥ ३ ॥ उन सुप्रसिद्ध बलाका-पुत्र गार्ग्य जी ने कहा-'हे राजन् ! चन्द्रमण्डल में जो यह अन्तर्यामी विराट् पुरुष है, मैं इसी को ब्रह्मरूप में मानकर उपासना करता हूँ।' ऐसा सुन करके उन (गार्ग्य) से राजा अजातशत्रु ने कहा- 'हे ब्रह्मन् ! नहीं-नहीं, इस विषय में आप कुछ भी न कहें। यह सोम ही राजा है एवं अन्न का आत्मा भी यही है। इस प्रकार से मैं इसकी उपासना करता हूँ।' इसी तरह वह भी, जो इस प्रसिद्ध चन्द्र मण्डल के अन्तर्गत इस पुरुष की ब्रह्म रूप में उपासना करता है, वह निश्चय ही अन्न की आत्मा हो जाता है अर्थात् अन्न राशि से युक्त हो जाता है ॥ ३ ॥
अध्याय ४ मन्त्र ७ ८५
अध्याय ४ मन्त्र ७ ८५ स होवाच बालाकिर्य एवैष विद्युति पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदयिष्ठास्तेजस आत्मेति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते तेजस आत्मा भवति ॥ ४ ॥ तब वे विप्रश्रेष्ठ गार्ग्य मुनि कहने लगे-'हे राजन् ! विद्युत् मण्डल के अन्तर्गत जो यह अन्तर्यामी विराट् परब्रह्म है, मैं उसी का उपासक हूँ।' ऐसा सुनकर राजा अजातशत्रु तुरन्त बोले-'हे ब्रह्मन् ! आप इस सन्दर्भ में कुछ भी न कहें। मैं इस (विद्युत्) को प्रकाश की आत्मा मानकर उसको उपासना करता हूँ।' इस प्रकार जो भी मनुष्य विद्युत्-मण्डल में स्थित ब्रह्म की उपासना करता है, वह प्रकाश स्वरूप आत्मा ही हो जाता है ॥ ४ ॥ स होवाच बालाकिर्य एवैष स्तनयित्नौ पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदयिष्ठाः शब्दस्यात्मेति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते शब्दस्यात्मा भवति ॥ ५ ॥ तदुपरान्त बलाका-तनय गार्ग्य ने पुनः कहना प्रारम्भ किया- 'हे राजन् ! मेघमण्डल में गर्जना रूप में विद्यमान उस अन्तर्यामी अविनाशी परम ईश्वर की मैं साक्षात् परम ब्रह्म मानकर उपासना करता हूँ।' ऐसा सुनकर उन प्रख्यात नरेश अजातशत्रु ने उत्तर देते हुए कहा- हे ब्रह्मन् ! आप इस सन्दर्भ में कुछ भी न कहें। मैं इसे शब्द की आत्मा समझकर इस श्रेष्ठ तत्त्व की उपासना करता हूँ। इस भाँति से जो भी मनुष्य इस मेघमण्डल में विद्यमान परब्रह्म को शब्द की आत्मा मानकर उपासना करता है, वह मनुष्य स्वयं ही शब्द की आत्मा के रूप में परिणत हो जाता है ॥ ५ ॥ स होवाच बालाकिर्य एवैष आकाशे पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदयिष्ठाः पूर्णमप्रवर्ति ब्रह्मेति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते पूर्यते प्रजया पशुभिः । नो एव स्वयं नास्य प्रजा पुरा कालात्प्रवर्तते ॥ ६ ॥ तत्पश्चात् पुनः बलाका-नन्दन गार्ग्य ऋषि ने कहा-'हे राजन् ! आकाश मण्डल में प्रतिष्ठित परब्रह्म परमेश्वर की मैं अविनाशी ब्रह्म के रूप में उपासना करता हूँ।' इस पर राजा अजातशत्रु ने कहा-'हे ब्रह्मन् ! आपको इस सन्दर्भ में कुछ भी नहीं कहना चाहिए।' यह तो पूर्ण, प्रवृत्ति रहित (क्रिया रहित) एवं ब्रह्म अर्थात् सभी से विशाल है। अवश्य ही इसी रूप में मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी तरह जो भी मनुष्य इस प्रसिद्ध आकाश मण्डल के अन्तर्गत स्थित पुरुष की इस रूप में उपासना करता है, वह प्रजा एवं पशुओं से युक्त हो जाता है। इसके अतिरिक्त, न तो स्वयं वह और न उसकी संतान ही समय से पूर्व मृत्यु को प्राप्त होते हैं ॥ ६ ॥ स होवाच बालाकिर्य एवैष वायौ पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदयिष्ठा इन्द्रो वैकुण्ठोऽपराजिता सेनेति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते । जिष्णुर्ह वापराजयिष्णुरन्यतस्त्यजायी भवति ॥ ७ ॥ वे प्रसिद्ध बलाका-पुत्र गार्ग्य पुनः कहने लगे-'हे राजन् ! यह जो वायुमण्डल में स्थित विराट् पुरुष है, मैं (गार्ग्य) अविनाशी ब्रह्म के रूप में इसकी उपासना करता हूँ।' गार्ग्य से ऐसा सुनने पर उन प्रसिद्ध नरेश अजातशत्रु ने कहा- 'हे ब्रह्मन् ! आपको इस विषय में कुछ भी नहीं कहना चाहिए; यह इन्द्र अर्थात् श्रेष्ठ ऐश्वर्य से युक्त, वैकुण्ठ अर्थात् कहीं भी कुण्ठाग्रस्त न रहने वाला तथा कहीं भी न हारने वाली सेना है। अवश्य ही मैं इसकी इसी भावना से उपासना करता हूँ; इसी तरह से जो भी मनुष्य इस वायु मण्डल के मध्य में स्थित
८६ कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद्
८६ कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् विराट् पुरुष की इस रूप में उपासना करता है, वह मनुष्य निश्चित ही सदा विजयी रहने वाला, दूसरों से कभी भी न हारने वाला एवं अपने को पराक्रम के द्वारा वश में करने वाला होता है ॥ ७ ॥ स होवाच बालाकिर्य एवैषोऽग्नौ पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठा विषासहिरिति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते विषासहिर्हेवान्वेव भवति ॥ ८ ॥ तदनन्तर उन सुप्रसिद्ध बलाका-पुत्र गार्ग्य जी ने कहा-'हे राजन्! यह जो अग्नि मण्डल के मध्य में अन्तर्यामी विराट् पुरुष विद्यमान है, इसी की मैं ब्रह्मरूप से उपासना करता हूँ।' इस प्रकार कहे जाने पर वे राजा अजातशत्रु गार्ग्य ऋषि से कहने लगे-'हे ब्रह्मन्! इस सन्दर्भ में आप कृपा करके कुछ भी संवाद न करें। यह 'विषासहि' अर्थात् दूसरों के प्रहार को सहन करने की सामर्थ्य वाला है। अवश्य ही इसी भावना से मैं इस तत्त्व की उपासना करता हूँ।' इसी तरह से जो भी मनुष्य इस प्रसिद्ध अग्नि के मध्य में स्थित विराट् पुरुष की उपासना करता है, वह इस उपासना के बाद दूसरों का आवेग सहन करने में समर्थ हो जाता है ॥ ८ ॥ स होवाच बालाकिर्य एवैषोऽप्सु पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठा नाम्न आत्मेति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते नाम्न आत्मा भवतीत्यधिदैवतमथाध्यात्मम् ॥ ९ ॥ उन ख्याति प्राप्त बलाका-पुत्र गार्ग्य जी ने कहा-'हे राजन् ! जो यह जल मण्डल के मध्य में अन्तर्यामी विराट् पुरुष स्थित है, इसकी ही मैं ब्रह्म के रूप में उपासना करता हूँ।' ऐसा सुनकर उन (गार्ग्य ऋषि) से राजा अजातशत्रु ने कहा-'हे ब्रह्मन्! इस विषय में कृपा करके आप कुछ भी न कहें। यह नामधारी जीवात्मा है, ऐसा जानकर ही मैं इसकी उपासना करता हूँ।' जो मनुष्य इसी भाव से इसकी उपासना करता है, वह नामधारी समस्त प्राणिमात्र की आत्मा हो जाता है। इसे आधिदैवत उपासना कहा जाता है। आगे अब अध्यात्म उपासना का वर्णन करते हैं ॥ ९ ॥ स होवाच बालाकिर्य एवैष आदर्शे पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठाः प्रतिरूप इति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते प्रतिरूपो हैवास्य प्रजायामाजायते नाप्रतिरूपः ॥ १० ॥ उन प्रसिद्ध बलाका-तनय गार्ग्य जी ने कहा- 'हे राजन्! जो यह दर्पण में विराट् पुरुष विद्यमान है, इसी की मैं अविनाशी ब्रह्म के रूप में उपासना करता हूँ।' यह सुनकर उन गार्ग्य मुनि से राजा अजातशत्रु ने कहा- 'हे मुने! इसके सन्दर्भ में आप कुछ भी न कहें। यह प्रतिरूप (रूप का ठीक वैसा ही प्रतिबिम्ब) है, अवश्य ही मैं इसकी इसी भावना से उपासना करता हूँ।' इसी तरह से वह मनुष्य भी यदि इस दर्पण के मध्य में विराट् पुरुष की इस रूप में उपासना करता है, तो वह उस प्रतिरूप गुण से विभूषित हो जाता है। उसकी संतानें उसके अनुरूप ही होती हैं। प्रतिकूल रूप व स्वभाव वाली नहीं होती ॥१०॥ स होवाच बालाकिर्य एवैष प्रतिश्रुत्कायां पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठा द्वितीयोऽनपग इति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते विन्दते द्वितीयाद्द्वितीयवान्भवति ॥ ११ ॥ वे प्रसिद्ध बलाका-पुत्र गार्ग्य फिर बोले- 'हे राजन् ! जो यह विराट् पुरुष प्रतिध्वनि में स्थित है, इसकी मैं ब्रह्मरूप से उपासना करता हूँ।' इस प्रकार उन गार्ग्य ऋषि से राजा अजातशत्रु ने कहा-हे ब्रह्मन्! आप इस
अध्याय ४ मन्त्र १५ ८७
अध्याय ४ मन्त्र १५ ८७ सन्दर्भ में कुछ भी न कहें। यह 'द्वितीय' एवं 'अनपग' (एक ध्वनि के पुनरावृत्ति एवं प्रतिध्वनि में गति का अभाव) है। अवश्य ही मैं इसकी इसी भावना के साथ उपासना करता हूँ।' ऐसे ही जो भी उपासक इस प्रतिध्वनिगत विराट् पुरुष की इस ब्रह्म के रूप में उपासना करता है, वह अपने अतिरिक्त दूसरे अर्थात् स्त्री- पुत्रादि को प्राप्त कर लेता है और सदा द्वितीयवान् रहता है अर्थात् स्त्री-पुत्रादि से वह वियोग को नहीं प्राप्त होता॥ ११ ॥ स होवाच बालाकिर्य एवैष शब्दः पुरुषमन्वेति तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठा असुरिति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते नो एव स्वयं नास्य प्रजा पुरा कालात्संमोहमेति ॥ १२ ॥ वे प्रसिद्ध बलाका-पुत्र गार्ग्य पुनः बोले- 'हे राजन्! जो यह गमन करते हुए विराट् पुरुष के पीछे ध्वन्यात्मक शब्द उसका अनुसरण करता है, उसी अविनाशी परमात्मा की मैं ब्रह्म रूप से उपासना करता हूँ।' ऐसा सुनकर प्रसिद्ध राजा अजातशत्रु ने कहा- 'हे ब्रह्मन् ! इस संदर्भ में आप कुछ भी न कहें। यह प्राण स्वरूप है, इसलिए निश्चित रूप से इसी भाव से मैं इसकी उपासना करता हूँ।' जो भी उपासक इस श्रेष्ठ तत्त्व की इस रूप में उपासना करता है, वह पूर्ण आयु के पहले मृत्यु को नहीं प्राप्त होता है और न ही उसकी सन्तान ही पूर्ण आयु के पूर्व मृत्यु को प्राप्त होती है॥ १२॥ स होवाच बालाकिर्य एवैष छायापुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठा मृत्युरिति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते नो एव स्वयं नास्य प्रजा पुरा कालात्प्रमीयते ॥ १३ ॥ सुप्रसिद्ध बलाका-तनय गार्ग्य जी पुनः कहने लगे-'हे राजन् ! शरीरधारी के साथ जो छाया विचरण करती है, मैं उसी छायारूप विराट् पुरुष की उपासना करता हूँ।' ऐसा सुनकर उन गार्ग्य ऋषि से सुप्रसिद्ध राजा अजातशत्रु ने कहा- 'हे ब्रह्मन् ! आप इस विषय में कुछ भी न कहें। यह छाया तो मृत्युरूप है, मैं इसकी उसी भाव से उपासना करता हूँ।' जो उपासक उस विराट् ब्रह्म की इस रूप में उपासना करता है, वह समय से पहले मृत्यु को नहीं प्राप्त होता है और न ही उसके पुत्र ही समय से पूर्व मृत्यु को प्राप्त होते हैं ॥ १३ ॥ स होवाच बालाकिर्य एवैष शारीरः पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठाः प्रजापतिरिति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते प्रजायते प्रजया पशुभिः ॥ १४ ॥ गार्ग्य जी ने आगे कहा- 'हे राजन्! यह जो विराट् पुरुष शरीर में स्थित है, उसे मैं साक्षात् ब्रह्म का स्वरूप मानकर उपासना करता हूँ।' ऐसा सुनकर राजा अजातशत्रु ने कहा-'हे ब्रह्मन् ! आप इस विषय में कुछ भी न कहें। यह प्रजापति स्वरूप है, इसी भाव से मैं इसकी उपासना करता हूँ।' जो भी मनुष्य इस शरीर में निवास करने वाले पुरुष की प्रजापति भाव से उपासना करता है, वह प्रजा एवं पशुओं से युक्त हो जाता है ॥१४ स होवाच बालाकिर्य एवैष प्राज्ञ आत्मा येनैतत्पुरुषः सुप्तः स्वप्न्यया चरति तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठा यमो राजेति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते सर्वं हास्मा इदं श्रेष्ठ्याय यम्यते ॥ १५ ॥ गार्ग्य जी पुनः बोले-'हे राजन्! यह जो प्रज्ञा से नित्य-युक्त प्राण स्वरूप आत्मा है, जिससे एकता को प्राप्त करके यह सोया हुआ विराट् पुरुष स्वप्न मार्ग से विचरण करता है (अर्थात् विभिन्न तरह के स्वप्नों का
८८ कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद्
८८ कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् अनुभव करता है), उसी की मैं ब्रह्मरूप से उपासना करता हूँ।' यह सुनकर राजा अजातशत्रु ने कहा-'हे ब्रह्मन् ! इस सन्दर्भ में आप कुछ भी न कहें। यह यम राजा है, ऐसा जानकर मैं इसी भाव से इसकी उपासना करता हूँ।' जो मनुष्य इसकी इसी तरह से उपासना करता है, उस उपासक की श्रेष्ठता-अभिवर्धन हेतु यह समस्त संसार नियमपूर्वक चेष्टा करता है॥ १५॥ स होवाच बालाकिर्य एवैष दक्षिणेऽक्ष्यन्पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचा-जातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठा नाम्न आत्माऽग्नेरात्मा ज्योतिष आत्मेति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्त एतेषां सर्वेषामात्मा भवति ॥ १६ ॥ पुनः गार्ग्य जी ने कहा-'हे राजन्! जो यह दाहिने नेत्र में विराट् पुरुष स्थित है, मैं उसी की ब्रह्मरूप में उपासना करता हूँ।' ऐसा गार्ग्य ऋषि से सुनकर राजा अजातशत्रु ने कहा-'हे ब्रह्मन् ! कृपया आप इस विषय में कुछ भी न कहें।' यह नाम, अग्नि एवं ज्योति की आत्मा है। इसकी मैं इसी भावना के अनुसार उपासना करता हूँ। इसी तरह से जो भी उपासक इसकी उपासना करता है, वह इन सभी की आत्मा के समान हो जाता है॥ स होवाच बालाकिर्य एवैष सव्येऽक्ष्यन्पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठाः सत्यस्यात्मा विद्युत आत्मा तेजस आत्मेति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्त एतेषां सर्वेषामात्मा भवतीति ॥ १७ ॥ तब गार्ग्य पुनः बोले-'हे राजन्! यह जो बायें नेत्र में विराट् पुरुष विद्यमान है, इसी श्रेष्ठ पुरुष की मैं ब्रह्मरूप से उपासना करता हूँ।' ऐसा सुनकर उन (गार्ग्य ऋषि) से राजा अजातशत्रु ने कहा-'हे ब्रह्मन्! आप इस विषय में कुछ भी न कहें। यह सत्य का, विद्युत् का एवं तेज का आत्मा है। इसकी मैं इसी भाव से उपासना करता हूँ।' जो भी उपासक इसकी इस भाव से उपासना करता है, वह सभी की आत्मा हो जाता है॥ तत उ ह बालाकिस्तूष्णीमास तं होवाचाजातशत्रुः। एतावन्नु बालाका ३इ इत्येतावद्धीति होवाच बालाकिस्तं होवाचाजातशत्रुर्मृषा वै किल मा समवादयिष्ठा ब्रह्म ते ब्रवाणीति। स होवाच। यो वै बालाक एतेषां पुरुषाणां कर्ता यस्य वैतत्कर्म स वै वेदितव्य इति तत उ ह बालाकिः समित्पाणिः प्रतिचक्रम उपायानीति तं होवाचाजातशत्रुः प्रतिलोमरूपमेव तत्स्याद्यत्क्षत्रियो ब्राह्मणमुपनयेत्। एहि व्येव त्वा ज्ञपयिष्यामीति तं ह पाणावभिपद्य प्रवव्राज तौ ह सुप्तं पुरुषमाजग्मतुस्तं हाजातशत्रुरामन्त्रयांचक्रे। बृहन्पाण्डरवासः सोमराजन्निति। स उ ह तूष्णीमेव शिश्ये। तत उ हैन यष्ट्याविचिक्षेप स तत एव समुत्तस्थौ तं होवाचाजातशत्रुः। क्वैष एतद्वालाके पुरुषोऽशयिष्ट क्वैतदभूत्कुत एतदागाइदिति । तत उ ह बालाकिर्न विजज्ञौ ॥१८ राजा अजातशत्रु के इस तरह से कहने के पश्चात् वे बलाका-तनय गार्ग्य जी मौन हो गये। तदनन्तर उन (गार्ग्य जी) से राजा अजातशत्रु ने कहा-'हे बलाके! क्या इतना ही आपका ब्रह्मज्ञान है?' इस प्रश्न पर बलाका-पुत्र गार्ग्य ने कहा-'हाँ, इतना ही है।' तब राजा अजातशत्रु ने कहा-'हे ब्रह्मन् ! तब तो व्यर्थ ही आपने यह कहा कि तुम्हारे लिए ब्रह्म का उपदेश करूँगा।' निश्चय ही जो आपके द्वारा कहे हुए इन सभी सोपाधिक पुरुषों का कर्त्ता है-वही जानने योग्य है। उन श्रेष्ठ राजा अजातशत्रु के इस तरह कहने पर वे प्रसिद्ध बलाका- तनय गार्ग्य हाथ में समिधा ग्रहण कर उनके पास जाकर कहने लगे-'हे राजन्! मैं आपको गुरु बनाने के लिए आपके पास आया हूँ।' ऐसा सुनकर राजा ने कहा-'यह विपरीत बात हो जायेगी, यदि क्षत्रिय ब्राह्मण को शिष्य
अध्याय ४ मन्त्र १९ ८९
अध्याय ४ मन्त्र १९ ८९ बनाने के लिए अपने पास बुलाये। अतः आप आयें (एकान्त स्थान की ओर चलें), वहाँ आपको निश्चय ही मैं स्वयं विराट् ब्रह्म का बोध कराऊँगा।' ऐसा कहकर राजा (अजातशत्रु) बलाका-तनय गार्ग्य का हाथ पकड़ करके वहाँ से चल दिये। वे दोनों (राजा एवं गार्ग्य) एक सोये हुए व्यक्ति के पास आये। वहाँ पर राजा अजातशत्रु ने उस सोये हुए व्यक्ति को जगाने का प्रयास करते हुए बुलाया-'हे ब्रह्मन् ! हे पाण्डरवास ! हे सोम राजन् ! इस तरह से सम्बोधन करने पर भी जब वह व्यक्ति सोया ही रहा, तब उस व्यक्ति के शरीर में छड़ी से प्रहार किया। जैसे ही उसके शरीर में प्रहार किया गया, वह सोया हुआ व्यक्ति उस छड़ी की चोट से उठकर खड़ा हो गया। ऐसा दृश्य देखकर बलाका-पुत्र गार्ग्य से राजा अजातशत्रु ने कहा-'हे बलाके! यह व्यक्ति इस तरह अचेत सा रहकर कहाँ शयन करता था ? किस प्रदेश में इसका शयन हुआ था ? तथा इस जाग्रत्-अवस्था में यह कहाँ से आ गया है?' ॥ १८ ॥ तं होवाचाजातशत्रुर्यत्रैष एतद्बालाके पुरुषोऽशयिष्ट यत्रैतदभूद्यत एतदागादिति । हिता नाम हृदयस्य नाड्यो हृदयात्पुरीततमभिप्रतन्वन्ति तद्यथा सहस्रधा केशो विपाटितस्तावदण्व्यः पिङ्गलस्याणिम्ना तिष्ठन्ति। शुक्लस्य कृष्णस्य पीतस्य लोहितस्येति तासु तदा भवति। यदा सुप्तः स्वप्नं न कंचन पश्यत्यस्मिन्प्राण एवैकधा भवति तदैनं वाक्सवैर्नामभिः सहाप्येति चक्षुः सर्वै रूपैः सहाप्येति श्रोत्रं सर्वैः शब्दैः सहाप्येति मनः सर्वैर्ध्यानैः सहाप्येति स यदा प्रतिबुध्यते यथाऽग्नेर्ज्वलतः सर्वा दिशो विस्फुलिङ्गा विप्रतिष्ठेरन्नैवमेवैतस्मादात्मनः प्राणा यथायतनं विप्रतिष्ठन्ते प्राणेभ्यो देवा देवेभ्यो लोकाः तद्यथा क्षुरः क्षुरधानेऽवहितः स्यात्। विश्वंभरो वा विश्वंभरकुलाय एवमेवैष प्रज्ञ आत्मेदं शरीरमात्मानमनुप्रविष्ट आलोमभ्य आनखेभ्यः ॥ १९ ॥ गार्ग्य इस रहस्य को न समझ पाये, तब पुनः उनसे राजा अजातशत्रु ने कहा-'हे बलाका-तनय ! यह पुरुष इस तरह से अचेत-सा होकर जहाँ सोता था, जहाँ शयन करता था और इस जाग्रत्-अवस्था में इसका जहाँ से आगमन हुआ है, वह स्थान इस प्रकार से जाना जाता है। 'हिता' नाम से प्रसिद्ध बहुत-सी नाड़ियाँ हैं, जो कि हृदय-कमल से सम्बन्ध रखने वाली हैं। वे (नाड़ियाँ) हृदय-कमल से निकलकर सम्पूर्ण शरीर में विस्तृत होकर फैली हुई हैं। इन नाड़ियों का परिमाण इस तरह से है-एक बाल के हजारवें भाग के बराबर ही सूक्ष्मातिसूक्ष्म वे सभी नाड़ियाँ हैं। पिङ्गल अर्थात् विभिन्न तरह के रंगों का जो अति सूक्ष्मतम रस है, इससे वे पूर्ण हैं। शुक्ल, कृष्ण, पीत एवं रक्त आदि इन सभी रंगों के सूक्ष्मातिसूक्ष्म अंशों से वे सम्पन्न हैं। उन्हीं समस्त नाड़ियों में यह पुरुष सुषुप्तावस्था के समय विद्यमान रहता है। जिस समय यह सोया हुआ पुरुष किसी भी तरह का स्वप्न नहीं देखता, तब उस समय यह इस मुख्य प्राण तत्त्व में ही एकात्मभाव को प्राप्त कर लेता है। उस समय वाणी अपने समस्त नामों सहित इस प्राणतत्त्व में विलीन हो जाती है। चक्षु भी अपने सभी रूपों के साथ इस प्राण में ही मिल जाता है। कर्णेन्द्रिय अपने सभी शब्दों के साथ इस प्राण में विलीन हो जाती है और मन भी सभी चिन्तनयुक्त विषयों के सहित इस प्राण-तत्त्व में विलीन हो जाता है। यह पुरुष जब जाग जाता है, तब उस समय जैसे जलती हुई अग्नि से सभी दिशाओं की तरफ चिनगारियाँ प्रस्फुटित होती हैं, वैसे ही इस प्राण स्वरूप आत्मा से सभी वाणी आदि प्राणतत्त्व बहिर्गमन कर अपने-अपने भोग्य-स्थल की तरफ गमन कर जाते हैं। तत्पश्चात् प्राणों से उनके अधिष्ठाता अग्नि आदि देवों का प्रादुर्भाव होता है एवं साथ ही देवताओं से लोक अर्थात् नाम आदि विषयों का प्राकट्य होता है। उस
श्रेष्ठ आत्मा की प्राप्ति का उदाहरण इस तरह से है-जैसे क्षुरधान (अर्थात् छुरा रखने हेतु निर्मित की हुई चर्मयुक्त पेटी) में छुरा रखा रहता है, वैसे ही शरीर के अन्दर हृदय-कमल में अङ्गुष्ठ-मात्र पुरुष के रूप में परमात्म सत्ता की स्थिति होती है एवं जिस तरह अग्नि अपने नीड-भूत अरणी आदि काष्ठ में सभी जगह फैली रहती है, उसी प्रकार यह प्रज्ञावान् आत्मा इस 'आत्मा' नाम से सम्बोधित किये जाने वाले शरीर में नख से शिखा तक व्याप्त है॥ १९ ॥
तमेतमात्मानमेत आत्मानोऽन्ववस्यन्ति यथा श्रेष्ठिनं स्वाः। तद्यथा श्रेष्ठी स्वर्भुङ्क्ते यथा वा स्वाः श्रेष्ठिनं भुञ्जन्त्येवमेवैष प्रज्ञात्मैतैरात्मभिर्भुङ्क्ते। एवं वै तमात्मानमेत आत्मानो भुञ्जन्ति। स यावद्ध वा इन्द्र एतमात्मानं न विजज्ञे तावदेनमसुरा अभिबभूवुः। स यदा विजज्ञेऽथ हत्वाऽसुरान्विजित्य सर्वेषां देवानां श्रैष्ठ्यं स्वाराज्यमाधिपत्यं परीयाय तथो एवैवं विद्वान्सर्वान्पाप्मनोऽपहत्य सर्वेषां भूतानां श्रैष्ठ्यं स्वाराज्यमाधिपत्यं पर्येति य एवं वेद य एवं वेद॥ २०॥
उसी साक्षीरूप आत्मा का ये वाणी आदि आत्मा (इन्द्रियाँ) अनुगत सेवक की भाँति ठीक वैसे ही अनुसरण करती हैं, जैसे श्रेष्ठ गुणों से सम्पन्न धनी का, उसके आश्रय में जीवन-व्यतीत करने वाले स्वजन अनुवर्तन करते हैं। जिस तरह धनी अपने आत्मीय जनों के साथ भोजन करता है और स्वजन जैसे उस धनी का ही उपभोग करते हैं, उसी प्रकार यह प्रज्ञा सम्पन्न आत्मा इन वाणी आदि आत्माओं के सहित उपभोग करता है और अवश्य ही इस आत्मा का ये वाणी आदि आत्मा उपभोग करते हैं। वे प्रख्यात देवराज इन्द्र जब तक इस आत्मा को नहीं जान पाये थे, तब तक उन्हें समस्त दैत्य समूह पराजित करते रहते थे; किन्तु जैसे ही उन्होंने अपनी आत्मा को जाना, वैसे ही देवराज इन्द्र ने उन समस्त दैत्यों को विनष्ट कर, उन्हें परास्त करके सम्पूर्ण देवों में श्रेष्ठता का पद, स्वर्ग का राज्य एवं त्रिलोकी का अधिकार प्राप्त कर लिया। इसी प्रकार आत्मा को जानने वाला ज्ञानी अपने समस्त पापों को मिटाकर सभी भूत-प्राणियों में श्रेष्ठ होकर स्वाराज्य और प्रभुता को प्राप्त कर सभी का स्वामी बन जाता है। जो भी उपासक इस प्रकार से उसे जानता है, उसे ऊपर कहे हुए सम्पूर्ण फलों की प्राप्ति हो जाती है॥ २०॥
वाङ्मे मनसि ....................इति शान्तिः ॥ ॥ इति कौषीतकिब्राह्मणोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ क्षुरिकापनिषद् ॥ यह उपनिषद् कृष्णयजुर्वेद से सम्बद्ध है। इसमें कुल २५ मन्त्र हैं। यह उपनिषद् तत्त्व-ज्ञान के प्रति- बन्धक घटकों को काटने में क्षुरिका (छुरी-चाकू) सदृश समर्थ है। योग के अष्टांगों (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि) में से धारणा की सिद्धि और उसके प्रतिफल की यहाँ विशेष रूप से चर्चा है। इस उपनिषद् में कहा गया है कि सर्वप्रथम योग साधना के लिए दृढ़ आसन पर बैठकर प्राणायाम की विशेष क्रियाओं का अभ्यास करते हुए शरीर के सभी मर्म स्थानों में प्राण का संचार उसी प्रकार करे, जिस प्रकार मकड़ी अपने द्वारा निर्मित अति सूक्ष्म तन्तुओं पर गतिशील रहती है। तत्पश्चात् क्रमशः नीचे से ऊपर की ओर बढ़ते हुए हृदय कमल स्थित सुषुम्ना नाड़ी से प्राण तत्त्व का संचार करते हुए तथा अन्य ७२ हजार नाड़ियों का छेदन करते हुए उस परब्रह्म स्थान तक पहुँचा जा सकता है, जहाँ पहुँचने पर जीव (हंस) समस्त बन्धनों को काट डालने में समर्थ हो जाता है। उस समय वह अपने समस्त कर्म बन्धनों को जलाकर परम तत्त्व में उसी प्रकार लय को प्राप्त हो जाता है, जिस प्रकार दीपक निर्वाण (बुझने) के समय तेल-बाती सभी को जलाकर परम ज्योति में विलीन हो जाता है। इस प्रकार वह (जीव) पुनः कर्म बन्धन में नहीं बँधता- जीवन मुक्त हो जाता है। यही इस उपनिषद् का सार है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ सह नाववतु.....................इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-अवधूतोपनिषद्) क्षुरिकां संप्रवक्ष्यामि धारणां योगसिद्धये। यां प्राप्य न पुनर्जन्म योगयुक्तस्य जायते ॥१॥ योग की सिद्धि हेतु मैं धारणा रूपी क्षुरिका के सम्बन्ध में यहाँ वर्णन करता हूँ, जिसे प्राप्त करके योग युक्त हो जाने वाले मनुष्य को पुनर्जन्म नहीं लेना पड़ता अर्थात् वह आवागमन के बन्धन से मुक्त हो जाता है ॥१॥ [ सुझाई गयी धारणा का उपयोग करके मनुष्य बन्धन मुक्त होता है, इसलिए उसे बन्धन काटने वाली छुरी कहा गया है। संसारी व्यक्ति लौकिक कामनाओं के वशीभूत होकर भव-बन्धनों में बँधते हैं। योगी जन अष्टांग योग के अन्तर्गत यम, नियम, आसन, प्राणायाम एवं प्रत्याहार की साधना करते हुए धारणा तक पहुँचते हैं, तो आत्म सत्ता, परमात्म सत्ता और दोनों के बीच आदान-प्रदान, इन तीन में अपने चित्त को बाँध लेते हैं। इस धारणा के प्रभाव से सांसारिक बन्धन छिन्न हो जाते हैं। ] मन्त्र क्र० २ से ५ तक निर्धारित धारणा के पूर्व प्राणायाम का वर्णन है— वेदतत्त्वार्थविहितं यथोक्तं हि स्वयंभुवा। निःशब्दं देशमास्थाय तत्रासनमवस्थितः॥ २॥ कूर्मोऽङ्गानीव संहृत्य मनो हृदि निरुध्य च। मात्राद्वादशयोगेन प्रणवेन शनैः शनैः ॥ ३॥ पूरयेत्सर्वमात्मानं सर्वद्वारं निरुध्य च। उरोमुखकटिग्रीवं किंचिद्धृदयमुन्नतम् ॥ ४॥ प्राणान्संधारयेत्तस्मिन्नासाभ्यन्तरचारिणः। भूत्वा तत्र गतप्राणः शनैरथ समुत्सृजेत् ॥ ५॥
९२ क्षुरिकोपनिषद् जैसा कि स्वयंभू ब्रह्माजी का कथन है और जो भाव वेद के तत्त्वार्थ में सन्निहित है, तदनुसार कोलाहल रहित स्थान में इसके लिए उचित आसन में स्थित होकर जैसे कछुआ अपने अंगों को अपने संकल्प से समेट लेता है, वैसे ही मन और हृदय (के भावों) को निरुद्ध (बिखरने से रोक) करे तथा ॐ कार की बारह मात्राओं के माध्यम से (उतने समय में) धीरे-धीरे प्राण रूप सर्वात्मा को (पूरक द्वारा) अपने अन्दर पूरित करे। इस समय (प्राण के) सभी द्वारों को (बन्धों के माध्यम से) रोक करके छाती, मुख, कमर, गर्दन (को ऊपर की ओर खींचकर सीधा) तथा हृदय को कुछ उन्नत रखे। इस स्थिति में नासिका द्वारा संचरित प्राण को (कुम्भक के द्वारा) सभी स्थानों में धारण करे। जहाँ-तहाँ प्राणों का संचरण हो जाने पर फिर धीरे-धीरे वायु को (रेचक क्रिया द्वारा) बाहर छोड़ दे॥ २-५ ॥ [ ॐ कार में तीन मात्राएँ होती हैं। १२ मात्रा का अर्थ हुआ, ४ बार ओंकार के सहज उच्चारण जितना समय लगाकर पूरक करे। उसी अनुसार कुम्भक एवं रेचक की मात्रा निश्चित करे।] स्थिरमात्रादृढं कृत्वा अङ्गुष्ठेन समाहितः। द्वे तु गुल्फे प्रकुर्वीत जङ्घे चैव त्रयस्त्रयः ॥ ६ ॥ द्वे जानुनी तथोरुभ्यां गुदे शिश्ने त्रयस्त्रयः। वायोरायतनं चात्र नाभिदेशे समाश्रयेत् ॥ ७ ॥ धारणा युक्त उक्त प्राणायाम का अभ्यास दृढ़ हो जाने पर, पूरी सावधानी के साथ पैर के अंगूठे सहित टखनों में दो-दो बार, (टखनों और घुटनों के बीच के भाग) जंघाओं या पिंडलियों में तीन-तीन बार, घुटनों और ऊरु (जाँघों) में दो-दो बार तथा गुदा एवं जननेन्द्रिय में तीन-तीन बार (प्राणायाम द्वारा) प्राणों के संचार की धारणा करे। इसके बाद नाभि प्रदेश में प्राणों की धारणा करे॥ ६-७॥ कटि प्रदेश से नीचे का भाग, जो मूलाधार एवं स्वाधिष्ठान चक्रों से सम्बद्ध है, उसमें प्राण-प्रवाह की धारणा स्थिर होने के बाद क्रमशः नाभि, हृदय, कण्ठ एवं उससे ऊपर मन-बुद्धि (आज्ञा-सहस्रार आदि) तक प्राण-प्रवाह द्वारा धारणा को दृढ़ करने का संकेत आगे के मंत्रों में किया गया है- तत्र नाडी सुषुम्ना तु नाडीभिर्बहुभिर्वृता। अणुरक्ताश्च पीताश्च कृष्णास्ताम्रविलोहिताः ॥ ८ ॥ वहाँ पर इड़ा, पिङ्गला आदि दस नाड़ियों से आवृत सुषुम्ना नाम की ब्रह्म नाड़ी स्थित है। वहाँ भी अनेक नाड़ियाँ स्थित हैं, जो अति सूक्ष्म, लाल, पीली, काली एवं ताँबे के रंग की हैं॥ ८॥ अतिसूक्ष्मां च तन्वीं च शुक्लां नाडीं समाश्रयेत्। ततः संचारयेत्प्राणानूर्णनाभीव तन्तुना ॥ ९ ॥ वहाँ पर जो नाड़ी अति सूक्ष्म, पतली एवं शुक्ल वर्ण की है, उसका आश्रय प्राप्त करना चाहिए। जिस प्रकार ऊर्णनाभि (मकड़ी) अपनी लार के तन्तुओं द्वारा गतिशील होती है, उसी प्रकार योगी को उस नाड़ी मण्डल में प्राणों को संचरित करना चाहिए॥ ९॥ [मकड़ी अपने ही अंश से सूक्ष्म तन्तु पैदा करती है, फिर उन्हीं तन्तुओं के सहारे से इच्छित दिशाओं में गमन करती है। नाड़ी तन्तु प्राण द्वारा ही सृजित होते हैं और उन्हीं के माध्यम से प्राणशक्ति को काया तन्त्र में गतिशील किया जाता है।] ततो रक्तोत्पलाभासं हृदयायतनं महत्। दहरं पुण्डरीकं तद् वेदान्तेषु निगद्यते ॥ १० ॥ तद्भित्त्वा कण्ठमायाति तां नाडीं पूरयन्यतः। मनसस्तु परं गुह्यं सुतीक्ष्णं बुद्धिनिर्मलम् ॥ ११ ॥
मन्त्र २१ ९३
उस (नाभि) के बाद वेदान्त में जिसे दहर या पुण्डरीक कहा गया है, वह महत् आयतन वाला हृदय क्षेत्र है। वह क्षेत्र रक्त कमल की तरह सदा प्रकाशित रहता है। उस (हृदयक्षेत्र) के बाद नाड़ियों को पूरित करता हुआ (प्राण-प्रवाह) कण्ठ में आता है। उसके बाद मनःक्षेत्र और उससे परे गुह्य, निर्मल और तीक्ष्ण बुद्धि का स्थान है॥ १०-११॥ पादस्योपरि यन्मर्म तद्रूपं नाम चिन्तयेत्। मनोद्वारेण तीक्ष्णेन योगमाश्रित्य नित्यशः ॥१२॥ इन्द्रवज्र इति प्रोक्तं मर्मजङ्घानुकृन्तनम्। तद्ध्यानबलयोगेन धारणाभिर्निकृन्तयेत्॥१३॥ ऊर्वोर्मध्ये तु संस्थाप्य मर्मप्राणविमोचनम्। चतुरभ्यासयोगेन छिन्देदनभिशङ्कितः॥१४॥ इस प्रकार पैरों के ऊपर जो मर्म स्थान हैं, उनके नाम-रूप का चिन्तन करे। नित्य योगाभ्यास का आश्रय लेकर तीक्ष्ण मन के द्वारा जंघाओं से लगा हुआ जो 'इन्द्रवज्र' नामक क्षेत्र है, उसका छेदन करे। वहाँ उरुओं के बीच मर्म स्थलों का विमोचन करने वाले प्राण को ध्यान बल और धारणा के योग से स्थापित करके योगाभ्यास द्वारा मन की तीक्ष्ण धारणा रो, निःशंक होकर (मूलाधार से हृदय पर्यन्त) चारों मर्म स्थलों का छेदन (भेदन) करे॥ १२-१४॥ ततः कण्ठान्तरे योगी समूहं नाडिसंचयम्। एकोत्तरं नाडिशतं तासां मध्ये परा स्थिरा ॥१५॥ सुषुम्ना तु परे लीना विरजा ब्रह्मरूपिणी। इडा तिष्ठति वामेन पिङ्गला दक्षिणेन च ॥१६॥ इसके बाद योगी कण्ठ के अन्दर स्थित नाड़ी समूह में प्राणों को संचरित करे। उस नाड़ी समूह में एक सौ एक नाड़ियाँ हैं। उनके मध्य में पराशक्ति स्थित है। सुषुम्ना नाड़ी परम तत्त्व में लीन रहती है और विरजा नाड़ी ब्रह्ममय है। इड़ा का निवास बायीं ओर है और पिङ्गला दाहिनी ओर स्थित है॥ १५-१६॥ तयोर्मध्ये वरं स्थानं यस्तं वेद स वेदवित्। द्वासप्ततिसहस्राणि प्रति नाडीषु तैतिलम् ॥ १७॥ इन (इड़ा एवं पिङ्गला) दोनों नाड़ियों के मध्य में जो श्रेष्ठ स्थान है, उसे जो जानता है, वह वेद (अर्थात् शाश्वत ज्ञान) को जानने में समर्थ होता है। सभी सूक्ष्म नाड़ियों की संख्या बहत्तर हजार बतायी गयी है, जिन्हें तैतिल कहा गया है॥ १७॥ छिन्द्यते ध्यानयोगेन सुषुम्नैका न छिद्यते। योगनिर्मलधारेण क्षुरेणानलवर्चसा ॥१८॥ छिन्देन्नाडीशतं धीरः प्रभावादिह जन्मनि। जातीपुष्पसमायोगैर्यथा वास्यति वै तिलम्॥१९॥ ध्यान योग के द्वारा समस्त नाड़ियों का छेदन किया जा सकता है; किन्तु एक सुषुम्ना ही ऐसी है, जिसका कि छेदन नहीं किया जाता। धीर पुरुष को इस जन्म में आत्मा के प्रभाव से अग्निवत् तेजोमयी एवं योग रूपी निर्मल धार से युक्त (धारणा रूपी) छुरी से सैकड़ों (सभी) नाड़ियों का छेदन करना चाहिए। इससे नाड़ियाँ उसी तरह से सुवास युक्त हो जाती हैं, जिस तरह जाती (चमेली) के पुष्प से तिल (का तैल) सुवासित हो जाते हैं॥ १८-१९॥ एवं शुभाशुभैर्भावैः सा नाडी तां विभावयेत्। तद्भाविताः प्रपद्यन्ते पुनर्जन्मविवर्जिताः॥२०॥ इस प्रकार योगी को चाहिए कि वह शुभाशुभ भावों से युक्त विभिन्न नाड़ियों को समझे। उनसे परे सुषुम्ना नाड़ी में धारणा स्थिर करने से योगी पुनर्जन्म से रहित होकर शाश्वत परमब्रह्म को प्राप्त कर लेता है॥ २० तपोविजितचित्तस्तु निःशब्दं देशमास्थितः। निःसङ्गस्तत्त्वयोगज्ञो निरपेक्षः शनैः शनैः ॥२१॥ जिस व्यक्ति ने तप के द्वारा अपने चित्त को जीत लिया है, वह व्यक्ति शब्दरहित, एकान्त, निर्जन स्थान में स्थित होकर निःसङ्ग तत्त्व के योग का अभ्यास करे तथा शनैः-शनैः निरपेक्ष हो जाए॥ २१॥
९४ क्षुरिकोपनिषद् पाशं छित्त्वा यथा हंसो निर्विशङ्कः खमुत्क्रमेत्। छिन्नपाशस्तथा जीवः संसारं तरते सदा ॥२२॥ जिस प्रकार बन्धन-जाल को काटकर हंस निःशंक होकर आकाश में गमन कर जाता है, उसी प्रकार योगी मनुष्य इस योग के अभ्यास द्वारा सभी बन्धनों के कट जाने के पश्चात् बन्धन-मुक्त होकर संसार-सागर से सदा के लिए पार हो जाता है॥ २२॥ यथा निर्वाणकाले तु दीपो दग्ध्वा लयं व्रजेत्। तथा सर्वाणि कर्माणि योगी दग्ध्वा लयं व्रजेत्॥ २३॥ जिस प्रकार निर्वाण काल में (बुझने के समय) दीप ज्योति (दीपक की तेल-बाती) सभी को जलाकर स्वयं परम प्रकाश में लीन हो जाती है, वैसे ही योगी मनुष्य अपने सभी कर्मों को योगाग्नि से भस्म करके अविनाशी परमात्म तत्त्व में लीन हो जाता है॥ २३॥ प्राणायामसुतीक्ष्णेन मात्राधारेण योगवित्। वैराग्योपलगृष्टेन छित्त्वा तं तु न बध्यते॥ २४॥ वैराग्य रूपी पत्थर पर ॐकार युक्त प्राणायाम से घिसकर तीक्ष्ण की गयी धारणा रूपी छुरी से संसार के (विषयादि) सूत्रों के काटने वाले योगी को सांसारिक बन्धन बाँध नहीं पाते॥ २४॥ अमृतत्वं समाप्नोति यदा कामात्प्रमुच्यते। सर्वैषणाविनिर्मुक्तश्छित्त्वा तन्तुं न बध्यते छित्त्वा तन्तुं न बध्यते। इत्युपनिषत्॥ २५॥ जब वह (योगी मनुष्य) कामनाओं से छूट जाता है तथा एषणाओं से रहित हो जाता है, तभी (वह) अमृतत्व को प्राप्त कर सकता है और पुनः बन्धनों में नहीं बँधता। क्षुरिकोपनिषद् का यही रहस्य है॥ २५॥ ॐ सह नाववतु ............इति शान्तिः॥ ॥ इति क्षुरिकोपनिषत्समाप्ता ॥