भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 266, कुल 414 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 266

An exact line-by-line transcription of the text in Devanagari script:

२७४ शाट्यायनीयोपनिषद् अथाश्रमं चरमं संप्रविश्य यथोपपत्तिं पञ्चमात्रां दधानः॥ ६॥ इसके बाद अन्तिम संन्यास-आश्रम में प्रविष्ट होकर के यथाबल त्रिदण्ड आदि पंच मात्राओं को स्वीकार करता हुआ मोक्ष को प्राप्त करे॥ ६॥ त्रिदण्डमुपवीतं च वासः कौपीनवेष्टनम्। शिक्यं पवित्रमित्येतद्विभृयाद्यावदायुषम्॥ ७॥ जब तक आयु रहे, तब तक त्रिदण्ड, उपवीत, वस्त्र (उत्तरीय), कौपीन (लँगोटी), शिक्य (छींका), ॰पवित्र (पवित्री) को धारण करे॥ ७॥ पञ्चैतास्तु यतेर्मात्रास्ता मात्रा ब्रह्मणे श्रुताः। न त्यजेद्यावदुत्क्रान्तिरन्तेऽपि निखनेत्सह॥ ८॥ यति की ये पाँचों मात्राएँ ही ब्रह्म (ॐकार) में समाहित हैं। इनका त्याग कभी नहीं करना चाहिए। इन सभी को मृत्यु के उपरान्त शरीर के साथ ही भूमि में गाड़ देना चाहिए॥ ८॥ विष्णुलिङ्गं द्विधा प्रोक्तं व्यक्तमव्यक्तमेव च। तयोरेकमपि त्यक्त्वा पतत्येव न संशयः॥ ९॥ विष्णुलिङ्ग व्यक्त और अव्यक्त ऐसे दो प्रकार के चिह्न विष्णु (संन्यासी) के कहे गये हैं। इन दोनों में से किसी एक का भी परित्याग कर देने पर संन्यासी पथभ्रष्ट हो जाता है। इसमें कुछ भी संशय नहीं ॥ ९॥ त्रिदण्डं वैष्णवं लिङ्गं विप्राणां मुक्तिसाधनम्। निर्वाणं सर्वधर्माणामिति वेदानुशासनम्॥१०॥ त्रिदण्ड जो वैष्णवलिङ्ग (संन्यासी के चिह्न विशेष) के रूप में जाना जाता है। यह चिह्न ब्राह्मणों को मुक्ति प्रदान करने वाला है। यह चिह्न वेद का अनुशासन रूप एवं समस्त धर्मों का निर्वाण स्वरूप है॥ १०॥ अथ खलु सौम्य कुटीचको बहूदको हंसः परमहंस इत्येते परिव्राजकाश्चतुर्विधा भवन्ति। सर्व एते विष्णुलिङ्गिनः शिखिन उपवीतिनः शुद्धचित्ता आत्मानमात्मना ब्रह्म भावयन्तः शुद्धचिद्रूपोपासनरता जपयमवन्तो नियमवन्तः सुशीलिनः पुण्यश्लोका भवन्ति । तदेतदृचाभ्यु- क्तम्। कुटीचको बहूदकश्चापि हंसः परमहंस इव वृत्त्या च भिन्नाः। सर्व एते विष्णुलिङ्गं दधाना वृत्त्या व्यक्तं बहिरन्तश्च नित्यम्॥ ११॥ हे सौम्य! संन्यासी के कुटीचक, बहूदक, हंस और परमहंस-ये चार भेद होते हैं। ये चारों यज्ञोपवीत शिखा तथा विष्णु लिंग (संन्यासी के प्रतीक सर्वव्यापकता-समदर्शिता) को धारण करने वाले शुद्ध चित्त, स्वयं अपनी आत्मा में ब्रह्म को प्रतिष्ठित करने की भावना करते हुए उपासना करने वाले, जप और यम-नियम का पालन करने वाले एवं सुन्दर स्वभाव वाले होते हैं। इस सम्बन्ध में यह ऋचा है-'कुटीचक, बहूदक, हंस और परमहंस ये चार प्रकार अपनी-अपनी पृथक् वृत्तियों से भिन्न-भिन्न बताये गये हैं। ये सभी व्यक्त एवं अव्यक्त, बाह्य एवं अन्तःरूप विष्णु लिंग (संन्यास के चिह्न) को धारण करने वाले होते हैं'॥ ११॥ पञ्चयज्ञा वेदशिरः प्रविष्टाः क्रियावन्तोऽभि संगता ब्रह्मविद्याम्। त्यक्त्वा वृक्षं वृक्षमूलं श्रितासः संन्यस्तपुष्पा रसमेवाश्रुवानाः। विष्णुक्रीडा विष्णुरतयो विमुक्ता विष्ण्वात्मका विष्णुमेवापियन्ति॥ १२॥ ये पञ्चयज्ञ (गायत्री मन्त्र जप, योग, तप, स्वाध्याय एवं ज्ञान) तथा उपनिषदों के अर्थ का श्रवण करने वाले होते हैं। सभी अपने-अपने धर्मानुकूल कर्म करने वाले एवं ब्रह्मविद्या का आश्रय प्राप्त करने वाले हैं। ये सभी संसार रूपी वृक्ष को त्यागकर इसके मूलभाग (ब्रह्म) का आश्रय प्राप्त करने वाले तथा सभी कर्मकाण्ड आदि को छोड़कर सारभूत तत्त्व के रस का आनन्द प्राप्त करने वाले हैं। ये संन्यासी बाह्य क्रीड़ाओं को छोड़कर विष्णु के साथ ही क्रीड़ा करने वाले, विष्णु रूप आत्मा विष्णु का ही अर्चन एवं ध्यान करके कृतार्थ होते हैं॥