१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 267, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ेंमन्त्र २१ २७५ त्रिसन्ध्यं शक्तितः स्नानं तर्पणं मार्जनं तथा। उपस्थानं पञ्चयज्ञान्कुर्यादामरणान्तिकम् ॥ १३ ॥ सभी को मृत्यु पर्यन्त प्रातः, मध्याह्न एवं सायंकालीन संध्या, स्नान, तर्पण, मार्जन, उपस्थान तथा पञ्चयज्ञ (देवयज्ञ, पितृयज्ञ, नृयज्ञ या अतिथि यज्ञ, भूतयज्ञ एवं ब्रह्मयज्ञ) अवश्य ही करना चाहिए ॥ १३ ॥ दशभिः प्रणवैः सप्तव्याहृतिभिश्चतुष्पदा। गायत्रीजप यज्ञश्च त्रिसन्ध्यं शिरसा सह ॥ १४॥ दश प्रणव (ॐकार) तथा सात व्याहृतियों (भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम्) के सहित चार पाद युक्त एवं सिर (आपोज्योती इत्यादि) युक्त गायत्री का जप एवं यज्ञ त्रिकाल सन्ध्या के साथ करना चाहिए ॥ १४ ॥ योगयज्ञः सदैकाग्र्यभक्त्या सेवा हरेर्गुरोः। अहिंसा तु तपोयज्ञो वाङ्मनःकायकर्मभिः ॥१५॥ एकाग्रचित्त होकर भक्ति भाव से योग, यज्ञ भगवान् (विष्णु) तथा गुरु की सेवा और मन, वाणी एवं कर्म के द्वारा हिंसारहित तप रूपी यज्ञ सतत करते रहना चाहिए ॥ १५ ॥ नानोपनिषदभ्यासः स्वाध्यायो यज्ञ ईरितः। ओमित्यात्मानमव्यग्रो ब्रह्मण्यग्नौ जुहोति यत् ॥ १६ ॥ समस्त उपनिषदों का अभ्यास (पाठ) स्वाध्याय यज्ञ कहा गया है।'ॐ' इस प्रकार उच्चारण करते हुए ब्रह्मरूपी अग्नि में ही आत्मा की आहुति दी जाती है अर्थात् आत्मा को ब्रह्म में विलीन किया जाता है ॥ १६ ॥ ज्ञानयज्ञः स विज्ञेयः सर्वयज्ञोत्तमोत्तमः। ज्ञानदण्डा ज्ञानशिखा ज्ञानयज्ञोपवीतिनः ॥ १७ ॥ वह (ॐकार ही) सभी श्रेष्ठ यज्ञों से भी उत्तम ज्ञानयज्ञ कहा गया है। इन सभी का ज्ञान ही दण्ड है, ज्ञान ही शिखा है और ज्ञान ही इनका यज्ञोपवीत है ॥ १७ ॥ शिखा ज्ञानमयी यस्य उपवीतं च तन्मयम्। ब्राह्मण्यं सकलं तस्य इति वेदानुशासनम् ॥ १८ जिसकी शिखा (चोटी) एवं यज्ञोपवीत ज्ञानमय होता है। उसकी समस्त वस्तुयें ब्रह्मरूप ही हैं, ऐसा वेद का अनुशासन (आदेश है) ॥ १८ ॥ अथ खलु सोम्यैते परिव्राजका यथा प्रादुर्भवन्ति तथा भवन्ति। कामक्रोधलोभमो- हदम्भदर्पासूयाममत्वांहकारादींस्तितीर्य मानावमानौ निन्दास्तुती च वर्जयित्वा वृक्ष इव तिष्ठा- सेत्। छिद्यमानो न ब्रूयात्। तदेवं विद्वांस इहैवामृता भवन्ति। तदेतदृचाभ्युक्तम्। बन्धुपुत्रमनुमो- दयित्वानवेक्ष्यमाणो द्वन्द्वसहः प्रशान्तः। प्राचीमुदीचीं वा निर्वर्तयंश्चरेत ॥ १९ ॥ हे प्रिय सोम्य ! ये परिव्राजक जिस प्रकार प्रादुर्भूत होते हैं, वह बतला दिया गया है। ये संन्यासी काम, क्रोध, लोभ, मोह, दम्भ, दर्प (घमण्ड), असूया (दूसरे के गुणों में दोष निकालना), ममता, अहंकार आदि को पार करके, मान-अपमान, निन्दा-प्रशंसा को देखकर वृक्षवत् अविचल रहते हैं, काटे जाने (कष्ट पड़ने) पर भी कुछ बोलते नहीं। इस प्रकार से विद्वज्जन इस लोक में ही अमृत-जीवनमुक्त हो जाते हैं। इस सन्दर्भ में यह ऋचा द्रष्टव्य है-'भाई, पुत्रादि का पालन-पोषण करने के पश्चात् फिर कभी उनकी ओर नहीं देखे। दुःखादि सहते हुए पूर्व एवं उत्तर दिशाओं में अपने-अपने स्वरूप का अनुसंधान करते हुए भ्रमण करे॥ १९॥ पात्री दण्डी युगमात्रावलोकी शिखी मुण्डी चोपवीती कुटुम्बी। यात्रामात्रं प्रतिगृह्णन्मनुष्यात् अयाचितं याचितं वोत भैक्षं ॥ २० ॥ पात्र एवं दण्ड धारण करते हुए युग (दो-जीवात्मा-परमात्मा) मात्र के दर्शन करने वाले, विशाल जटा- वाले या मुण्डन किये हुए मस्तक वाले, उपवीत ही जिसका कुटुम्ब है, ऐसे संन्यासी को केवल अपने प्राणयात्रा के लिए मनुष्यों से भिक्षा माँगकर या बिना माँगे ही भिक्षा ग्रहण करते हुए निरन्तर विचरण करना चाहिए ॥ २० ॥ मृद्वार्बलाबूफलं तन्तुपर्णपात्रं तत्तथा यथा तु लब्धम्। क्षाणं क्षामं तृणं कन्थाजिने च पर्णमाच्छादनं स्यादहतं वा विमुक्तः ॥ २१ ॥