१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२७६ शाट्यायनायापानषद् मिट्टी, लकड़ी की तुम्बी, श्रीफल, तन्तु ग्रथित या पत्तों से निर्मित पात्र जिस तरह का भी मिले, ग्रहण कर लेना चाहिए। चटाई, वृक्षों की छाल या सूखी घास से बनी कथरी, अजिन (कृष्णमृग चर्म) तथा जो पत्ते कीड़ों द्वारा खाये न गये हों, ऐसे श्रेष्ठ पत्तों के द्वारा बनाई गयी ओढ़नी-उत्तरीय को धारण करना चाहिए॥ २१ ॥ ऋतुसन्धौ मुण्डयेन्मुण्डमात्रं नाधो नाक्षं जातु शिखां न वापयेत्। चतुरो मासान्ध्रुवशीलतः स्यात्स यावत्सुप्तोऽन्तरात्मा पुरुषो विश्वरूपः ॥ २२ ॥ हंस (संन्यासी) की ऋतु सन्धि के समय क्षौर कर्म अर्थात् मुण्डन कराना चाहिए, किन्तु कुटीचक (यह भी संन्यासियों का एक भेद है) शिखा (जटा) को कभी न कटाये। जब विश्वरूप विराट् पुरुष भगवान् नारायण शयन करते हैं, तब तक चार मास (चौमासा) एक ही स्थान पर स्थिर चित्त से निवास करे॥ २२ ॥ अन्यांनथाष्टौ पुनरुत्थितेऽस्मिन्स्व कर्मलिप्सुर्विहरेद्वा वसेद्वा। देवाग्न्यगारे तरुमूले गुहायां वसेदसङ्गोऽलक्षितशीलवृत्तः। अनिन्धनो ज्योतिरिवोपशान्तो न चोद्विजेदुद्विजयेच्च कुत्र ॥२३॥ इस प्रकार अन्य (श्रवण, ध्यान एवं समाधि आदि की) अवस्थाओं को प्राप्त करने का इच्छुक संन्यासी स्वकर्म करते हुए एक स्थान पर ही निवास हेतु रह जाये अथवा उसे अन्यत्र आश्रय प्राप्त कर लेना चाहिए। अपना निवास किसी देवालय में वृक्ष के मूल (जड़) के समीप में अथवा गुफा में कर लेना चाहिए तथा वहाँ निःसंग एवं सर्वथा अलक्षित (जन संसर्ग से दूर रहकर) बिना काष्ठ को अग्नि के समान शान्त चित्त होकर रहे। किसी को भी देखकर क्षुभित न हो, सभी में आत्मबुद्धि कर लेनी चाहिए॥ २३ ॥ आत्मानं चेद्विजानीयादयमस्मीति पूरुषः। किमिच्छन्कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत् ॥ २४ ॥ यदि पुरुष अपनी आत्मा को ब्रह्म रूप में जान ले, तो फिर वह क्या चाहता हुआ किस इच्छा से शरीर का पोषण अथवा शोषण करे ? अर्थात् उसे नहीं करना चाहिए॥ २४॥ तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः। नानुध्यायाद्बहूञ्छब्दान्वाचो विग्लापनं हि तत् ॥२५ ॥ धैर्यवान् ब्राह्मण उस अविनाशी परब्रह्म को पहचान कर, उसी (ब्रह्म) में बुद्धि को स्थिर करे। अधिकाधिक शब्दाडम्बर में नहीं पड़ना चाहिए; क्योंकि यह सब वाणी का दुरुपयोग है॥ २५ ॥ बाल्येनैव हि तिष्ठासेन्निर्विद्य ब्रह्मवेदनम्। ब्रह्मविद्यां च बाल्यं च निर्विद्य मुनिरात्मवान्॥२६ ॥ वैराग्ययुक्त होकर ही स्थिर रहने की इच्छा करनी चाहिए। ब्रह्म के अतिरिक्त और कुछ नहीं है, ऐसा दृढ़ निश्चय कर ब्रह्म को पहचान एवं वैराग्य को भली-भाँति समझकर आत्माराम होकर सर्वत्र आत्मदर्शन करे॥ यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः। अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥ जब हृदय में रहने वाली समस्त कामनाएँ शान्त हो जाती हैं, तब यह मरणधर्मा होता हुआ भी मृत्युहीन होकर ब्रह्मानन्द का रसास्वादन करता है॥ २७॥ अथ खलु सोम्येदं परिव्राज्यं नैष्ठिकमात्मधर्मं यो विजहाति स वीरहा भवति। स ब्रह्महा भवति। स भ्रूणहा भवति। स महापातकी भवति। य हमां वैष्णवीं निष्ठां परित्यजति। स स्तेनो भवति। गुरुतल्पगो भवति। समित्रध्रुग्भवति। स कृतघ्नो भवति। स सर्वस्मा ल्लोकात्प्रच्युतो भवति। तदेतदृचाभ्युक्तम्। स्तेनः सुरापो गुरुतल्पगामी मित्रध्रुगेते निष्कृतेर्यान्ति शुद्धिम्। व्यक्तमव्यक्तं वा विधृतं विष्णुलिङ्गं त्यजन्न शुध्येदखिलैरात्मभासा ॥ २८ ॥ हे प्रिय सोम्य! जो अपने इस नैष्ठिक संन्यासियों के धर्म को छोड़ देता है, वह पुरुषत्वनाशक, ब्रह्मघाती,