भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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मन्त्र ३५ २७७ गर्भघाती तथा महापातकी (के सदृश) होता है। जो (संन्यासी) इस वैष्णवी निष्ठा को त्याग देता है, वह चोर होता है। गुरुपत्नीगामी, मित्रद्रोही एवं कृतघ्न हो जाता है तथा समस्त लोकों से भ्रष्ट होकर अधोगति को प्राप्त होता है। इस सन्दर्भ में ये ऋचाएं हैं-चोर, शराबी, गुरुपत्नीगामी, एवं मित्रद्रोही ये प्रायश्चित्त से शुद्ध हो जाते हैं; किन्तु व्यक्त एवं अव्यक्त स्वरूप विष्णु लिङ्ग (अनुशासन सूत्रों) को छोड़ने पर संन्यासी किसी भी तरह से पवित्र नहीं हो सकता है ॥ २८ ॥ त्यक्त्वा विष्णोर्लिङ्गमन्तर्बहिर्वा यः स्वाश्रमं सेवतेऽनाश्रमं वा। प्रत्यापत्तिं भजते वातिमूढो नैषां गतिः कल्पकोट्यापि दृष्टा ॥ २९ ॥ अन्तः तथा बाह्य विष्णु लिङ्ग को छोड़कर जो संन्यासी अपने आश्रम में ही निवास करता है अथवा आश्रम का त्याग कर देता है, वह प्रतिपल विपत्तियों से घिरा रहता है, ऐसे व्यक्तियों की सद्गति अनन्तकाल तक भी देखने में नहीं आती ॥ २९ ॥ त्यक्त्वा सर्वाश्रमान्धीरो वसेन्मोक्षाश्रमे चिरम्। मोक्षाश्रमात्परिभ्रष्टो न गतिस्तस्य विद्यते ॥३०॥ धैर्यवान् पुरुष समस्त आश्रमों का परित्याग करके मोक्षरूपी आश्रम में दीर्घकाल तक निवास करे। यदि मोक्ष-आश्रम से भी भ्रष्ट हो जाये, तो फिर उसको कहीं पर भी ठौर नहीं है ॥ ३० ॥ पारिव्राज्यं गृहीत्वा तु यः स्वधर्मे न तिष्ठति । तमारूढच्युतं विद्यादिति वेदानुशासनम् ॥ ३१ ॥ जो (पुरुष) संन्यास-आश्रम को ग्रहण करके अपने धर्म में स्थिर नहीं रहता, ऐसे (पुरुष) को आरूढ़ च्युत (पातकी) समझना चाहिए, क्योंकि वह (पुरुष) संन्यास आश्रम में आकर के भी पातकी हो चुका है, ऐसा वेद का अनुशासन (आदेश) है ॥ ३१ ॥ अथ खलु सोम्येमं सनातनमात्मधर्मं वैष्णवीं निष्ठां लब्ध्वा यस्तामदूषयन्वर्तते स वशी भवति। स पुण्यश्लोको भवति। स लोकज्ञो भवति। स वेदान्तज्ञो भवति। स ब्रह्मज्ञो भवति। स सर्वज्ञो भवति। स स्वराड् भवति। स परं ब्रह्म भगवन्तमाप्नोति। स पितृन्संबन्धिनो बान्धवान्सुहृदो मित्राणि च भवादुत्तारयति ॥ ३२ ॥ हे प्रिय सोम्य ! जो पुरुष इस सनातन आत्मधर्म, विष्णु से सम्बन्धित निष्ठा को प्राप्त करके उसको प्रदूषित न करता हुआ प्रतिष्ठित रहता है, वह जितेन्द्रिय होता है। वह विशाल कीर्ति एवं लोकतत्त्व का ज्ञाता होता है। वह ब्रह्मवेत्ता होता है, वह सर्वज्ञ होता है। वह स्वयं प्रकाश स्वरूप होता हुआ परब्रह्म को प्राप्त करता है। वह अपने पितरों, सम्बन्धियों, बन्धुओं, मित्रों तथा समस्त प्रेमी-सम्बन्धियों को संसार-सागर से तार देता है ॥३२ ॥ तदेतदृचाभ्युक्तम् । शतं कुलानां प्रथमं बभूव तथा पराणां त्रिशतं समग्रम्। एते भवन्ति सुकृतस्य लोके येषां कुले संन्यसतीह विद्वान् ॥ ३३॥ जो विद्वान् इस संन्यास-धर्म को ग्रहण करता है, उसके कुल में सौ पीढ़ी पूर्व तथा तीन सौ पीढ़ी बाद तक जन्म लेने वालों का उद्धार हो जाता है। ऐसे श्रेष्ठ कृत्य करने वाले विद्वान् संन्यासी कभी-कभी ही इस लोक में प्रकट होकर इसे कृतार्थ करते हैं ॥ ३३ ॥ त्रिंशत्परांस्त्रिंशदपरांस्त्रिंशच्च परतः परान् । उत्तारयति धर्मिष्ठः परिव्राडिति वै श्रुतिः ॥ ३४॥ विद्वान् धर्मिष्ठ संन्यासी तीस पर (बाद की), तीस अपर (पूर्व की) एवं तीस पर से भी पर(बाद से बाद की) पीढ़ियों-पूर्वजों को तार देता है, ऐसा श्रुति का वचन है ॥ ३४ ॥ संन्यस्तमिति यो ब्रूयात्कण्ठस्थप्राणवानपि। तारिताः पितरस्तेन इति वेदानुशासनम् ॥ ३५ ॥