भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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३२४ सुबालोपनिषद्

शाखायें होती हैं। इस प्रकार हजारों नाड़ियाँ होती हैं, जिनमें यह आत्मा शयन करता है और शब्दों की क्रिया करता है। द्वितीय कोश में जब आत्मा शयन करता है, तब इह लोक और परलोक का दर्शन करता है, समस्त शब्दों को जानता है, उस स्थिति में इसे संप्रसाद कहते हैं। प्राण शरीर की रक्षा करता है। ये नाड़ियाँ हरित वर्ण, नीले, पीले, लाल और श्वेत वर्ण के रक्त से अभिपूरित हैं (अर्थात् वात, पित्तादि रसों से पूर्ण हैं) ॥ ३ ॥

अथात्रैतद्दहरं पुण्डरीकं कुमुदमित्रानेकधा विकसितं यथा केशः सहस्रधा भिन्नस्तथा हिता नाम नाड्यो भवन्ति हृदयाकाशे परे कोशे दिव्योऽयमात्मा स्वपिति यत्र सुप्तो न कंचन कामं कामयते न कंचन स्वप्नं पश्यति न तत्र देवा न देवलोका यज्ञा न यज्ञा वा न माता न पिता न बन्धुर्न बान्धवो न स्तेनो न ब्रह्महा तेजस्कायममृतं संलिल एवेदं सलिलं वनं भूयस्तेनैव मार्गेण जाग्राय धावति सम्राडिति होवाच ॥ ४ ॥

इस शरीर में स्थित सूक्ष्म हृदय कमल, रात्रि में खिलने वाले कुमुद के सदृश श्वेत वर्ण का है, जो अनेक प्रकार से विकास को प्राप्त हुआ है। एक बाल को हजार हिस्सों में चीर दिया जाए, इतनी पतली हिता नामक नाड़ियाँ होती हैं। हृदयाकाश परम कोश है, जिसमें यह दिव्य आत्म तत्त्व निवास करता है। जब यह निद्रा की अवस्था में होता है, तो किसी प्रकार की कामना नहीं करता और न ही कोई स्वप्न देखता है। वहाँ न कोई देवता है, न देवलोक है, न यज्ञ है, न उसकी क्रियाएँ हैं। उस स्थिति में (वह) न माता है, न पिता है, न बन्धु है, न बान्धव है, न चोर है, न ब्रह्म हत्यारा है। वह (आत्मा) तेजस्वरूप है, अमृत है। जल ही जल है, वन के समान है। इस मार्ग से आत्मा जाग्रदवस्था की ओर दौड़ता हैं, सम्राट् (जिसका अन्तःकरण ज्ञान से प्रकाशित हो चुका है, ऐसे अनुभवित्त्वान् व्यक्ति) ने ऐसा कहा है ॥ ४ ॥

॥ पञ्चमः खण्डः ॥

इस खण्ड में ज्ञानेन्द्रियों, अन्तःकरण एवं कर्मेन्द्रियों के माध्यम से आत्मा की सक्रियता का विवेचन किया गया है। इस प्रकरण में जो आत्मा से सम्बद्ध है, उसे अध्यात्म, भौतिक सृष्टि से सम्बद्ध को अधिभूत तथा देव शक्तियों से सम्बद्ध को अधिदैवत कहा गया है। जीवन की विभिन्न धाराओं की व्याख्या इन्हीं तीनों विशेषणों के संदर्भ में की गयी है-

स्थानानि स्थानिभ्यो यच्छति नाडी तेषां निबन्धनं चक्षुरध्यात्मं द्रष्टव्यमधिभूतमादित्य- स्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यश्चक्षुषि यो द्रष्टव्ये य आदित्ये यो नाड्यां यः प्राणे यो विज्ञाने य आनन्दे यो हृदयाकाशे य एतस्मिन्सर्वस्मिन्नन्तरे संचरति सोऽयमात्मा तमात्मा- नमुपासीताजरममृतमभयमशोकमनन्तम् ॥ १ ॥

(इस प्रकार जाग्रत् आदि कोशत्रय में निवास करने वाला) आत्मा उन-उन स्थानों में रहने वालों को स्थान प्रदान करता है। नाड़ी उनका मूल साधन है। चक्षु अध्यात्म है। देखा जाने वाला (द्रष्टव्य) पदार्थ अधिभूत है और आदित्य अधिदैवत है। नाड़ी उसका मूल कारण है। जो चक्षु इन्द्रिय में, द्रष्टव्य पदार्थ में, आदित्य में, नाड़ी में, प्राण में, विज्ञान में, आनन्द में, हृदयाकाश में और इस सम्पूर्ण शरीर में संचरण करता है, यह आत्मा है। उस आत्मा की ही उपासना करनी चाहिए, जो अजर, अमर, अभय, अशोक और अनन्त है ॥ १ ॥

[नाड़ी को अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवत का मूलकारण कहा गया है। दृष्टि का विकास और विलय उससे सम्बद्ध नाड़ी में होता है, यह स्पष्ट है। जिस प्रकार आत्मा के स्थान शरीर में विभिन्न नाड़ियाँ हैं, वैसे ही अधिभूत के लिए प्रकृति में तथा अधिदैवत के लिए विराट् पुरुष में नाड़ियाँ हैं। आगे नवम खण्ड में स्पष्ट किया गया है कि आदित्य आदि