१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ५ मन्त्र ९ ३२५ भी उनसे सम्बद्ध विराट् नाड़ियों से ही उद्भूत और उन्हीं में विलीन होते हैं। ] श्रोत्रमध्यात्मं श्रोतव्यमधिभूतं दिशस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यः श्रोत्रे यः श्रोतव्ये यो दिक्षु यो नाड्यां यः प्राणे यो विज्ञाने य आनन्दे यो हृद्याकाशे य एतस्मिन्सर्वस्मि- न्नन्तरे संचरति सोऽयमात्मा तमात्मानमुपासीताजरममृतमभयमशोकमनन्तम् ॥ २ ॥ इसी प्रकार श्रोत्रेन्द्रिय भी अध्यात्म है, श्रोतव्य शब्द अधिभूत है और दिशाएँ अधिदैवत हैं। इन तीनों का मूल कारण नाड़ी है। श्रोत्र में, श्रोतव्य शब्द में, दिशाओं में, नाड़ी में, प्राण में, विज्ञान में, आनन्द में, हृदयाकाश में और सम्पूर्ण शरीर के अन्दर जो संचरित होता है, वह आत्मा है। इसी की उपासना करनी चाहिए। यह जरारहित, मृत्युरहित, भयरहित, शोकरहित और अनन्त है ॥ २ ॥ नासाध्यात्मं घ्रातव्यमधिभूतं पृथिवी तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यो नासायां यो घ्रातव्ये यः पृथिव्यां यो नाड्यां .........नन्तम् ॥ ३ ॥ (उपर्युक्त के समान ही) नासिका अध्यात्म है, घ्रातव्य (सूँघने के विषय) अधिभूत हैं और पृथिवी अधि दैवत है। नाड़ी उनका मूल स्थान है। जो नासिका में, घ्रातव्य गन्ध में, पृथिवी में, नाड़ी में....अनन्त है ॥ ३ ॥ जिह्वाध्यात्मं यो रसयितव्यमधिभूतं वरुणस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यो जिह्वायां यो रसयितव्ये यो वरुणे यो नाड्यां ...........नन्तम् ॥ ४॥ (इसी प्रकार) जिह्वा अध्यात्म है, स्वादिष्ट पदार्थ अधिभूत हैं और वरुण अधिदैवत है। नाड़ी इनका मूल स्थान है। जो जिह्वा में, स्वाद लेने के रस में, वरुण में और नाड़ी में ..............अनन्त है ॥ ४॥ त्वगध्यात्मं स्पर्शयितव्यमधिभूतं वायुस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यस्त्वचि यः स्पर्शयितव्ये यो वायौ यो नाड्यां...........नन्तम् ॥ ५ ॥ (इसी प्रकार) त्वचा अध्यात्म है, स्पर्श योग्य वस्तु अधिभूत है और वायु अधिदैवत है। नाड़ी इनका मूल स्थान है। जो त्वगिन्द्रिय में, स्पर्श किये गये पदार्थ में, वायु में और नाड़ी में ..............अनन्त है ॥ ५ ॥ मनोऽध्यात्मं मन्तव्यमधिभूतं चन्द्रस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यो मनसि यो मन्तव्ये यश्चन्द्रे यो नाड्यां ...........नन्तम् ॥ ६ ॥ (इसी प्रकार) मन भी अध्यात्म है, मन्तव्य (मन का विषय) अधिभूत है, चन्द्रमा अधिदैवत है। नाड़ी इनका मूल स्थान है। जो मन में, जो मन्तव्य में, जो चन्द्रमा में, जो नाड़ी में ............अनन्त है ॥ ६ ॥ बुद्धिरध्यात्मं बोद्धव्यमधिभूतं ब्रह्मा तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यो बुद्धौ यो बोद्धव्ये यो ब्रह्मणि यो नाड्यां............. नन्तम् ॥ ७॥ (इसी प्रकार) बुद्धि अध्यात्म है, बोद्धव्य (बुद्धि का विषय) अधिभूत है, ब्रह्मा अधिदैवत हैं और नाड़ी इनका मूल स्थान है। जो बुद्धि में, बोद्धव्य में, ब्रह्मा में, जो नाड़ी में .............. अनन्त है ॥ ७ ॥ अहंकारोऽध्यात्ममहंकर्तव्यमधिभूतं रुद्रस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं योऽहंकारे योऽहंकर्तव्ये यो रुद्रे यो नाड्यां........... नन्तम् ॥ ८ ॥ अहंकार अध्यात्म है, अहंकर्तव्य (अहं का विषय) अधिभूत है, रुद्र अधिदैवत हैं और नाड़ी इनका मूल स्थान है। जो अहंकार में, अहं के विषय में, रुद्र में, नाड़ी में ..........................अनन्त है ॥ ८ ॥ चित्तमध्यात्मं चेतयितव्यमधिभूतं क्षेत्रज्ञस्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यश्चित्ते