१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ११ मन्त्र १ ३३५ है ? (यह अन्य किसी में ओत-प्रोत नहीं है) "समस्त लोक आत्म स्वरूप परब्रह्म में माला के दानों की भाँति ओत-प्रोत हैं। इस प्रकार उन्होंने कहा" ॥ १ ॥ एवमेतान् लोकानात्मनि प्रतिष्ठितान्वेदात्मैव स भवतीत्येतन्निर्वाणानुशासनमिति वेदानुशासनमिति वेदानुशासनम् ॥ २ ॥ जो पुरुष इन सभी लोकों की आत्मा में ही स्थित रहता है, वह आत्मस्वरूप ही हो जाता है। इस तरह यह निर्वाण (मोक्ष) विषय का अनुशासन है, यही वेद की शिक्षा है एवं यही वेद की आज्ञा है ॥ २ ॥ ॥ एकादशः खण्डः ॥ अथ हैनँ रैकः पप्रच्छ भगवन्त्योऽयं विज्ञानघन उत्क्रामन्स केन कतरद्वाव स्थानमुत्सृ- ज्यापक्रामतीति तस्मै स होवाच। हृदयस्य मध्ये लोहितं मांसपिण्डं यस्मिंस्तद्दहरं पुण्डरीकं कुमुदमवानेकधा विकसितं तस्य मध्ये समुद्रः समुद्रस्य मध्ये कोशस्तस्मिन्नाड्यश्चतस्रो भवन्ति रमारमेच्छाऽपुनर्भवेति तत्र रमा पुण्येन पुण्यं लोकं नयत्यरमा पापेन पापमिच्छया यत्स्मरति तदभिसंपद्यते अपुनर्भवया कोशं भिनत्ति कोशं भित्त्वा शीर्षकपालं भिनत्ति शीर्षकपालं भित्त्वा पृथिवीं भिनत्ति पृथिवीं भित्त्वाऽपो भिनत्त्यपो भित्त्वा तेजो भिनत्ति तेजो भित्त्वा वायुं भिनत्ति वायुं भित्वाकाशं भिनत्त्याकाशं भित्त्वा मनो भिनत्ति मनो भित्त्वा भूतादिं भिनत्ति भूतादिं भित्त्वा महान्तं भिनत्ति महान्तं भित्त्वाव्यक्तं भिनत्यव्यक्तं भित्त्वाक्षरं भिनत्त्यक्षरं भित्त्वा मृत्युं भिनत्ति मृत्युर्वै परे देव एकीभवतीति परस्तान्न सन्नासन्न सदसदित्येतन्निर्वाणा- नुशासनमिति वेदानुशासनमिति वेदानुशासनम् ॥ १ ॥ इसके बाद रैक मुनि ने पुनः प्रश्न किया-हे भगवन्! यह विज्ञानघन आत्मा जब शरीर से उत्क्रमण करता है, तब किस जगह का परित्याग करके, किस रास्ते से बाहर की ओर प्रस्थान करता है ? यह सुनकर घोरारङ्गिरस ने कहना प्रारम्भ किया कि "हृदय के मध्य भाग में मांस का लाल पिण्ड स्थित है। उस पिण्ड में चन्द्रमा के द्वारा विकसित होने वाले कमलिनी पुष्प की भाँति शुभ्र श्वेत एक सूक्ष्मातिसूक्ष्म कमल विद्यमान है। उस सूक्ष्म कमल का विभिन्न तरह से विकास हुआ है। उसके मध्य में समुद्र स्थित है, इस समुद्र के बीच में कोश (स्थान विशेष) स्थित है। उसमें चार प्रकार की नाड़ियाँ-रमा, अरमा, इच्छा एवं अपुनर्भवा हैं। इनमें से रमा नाड़ी पुण्य कृत्यों के माध्यम से पुण्य लोक में ले जाती है, अरमा नाड़ी पाप कृत्य के द्वारा पापलोक में ले जाती है, इच्छा नाड़ी के द्वारा जिसको याद किया जाता है, उसको प्राप्त किया जाता है तथा अपुनर्भवा नाड़ी के द्वारा इस हृदय के मध्य में स्थित कोश को खोला जाता है, कोश को खोलकर मस्तक के शीर्ष (ब्रह्मरन्ध्र) को खोला जाता है, मस्तक के शीर्ष को खोलकर पृथिवी का भेदन करता है, पृथिवी का भेदन करने के पश्चात् जल का भेदन करता है, जल का भेदन करने के बाद तेज (प्रकाश) को भेदता है, तेज का भेदन करने के पश्चात् वायु का भेदन करता है, वायु को भेदकर आकाश को भेदता है, आकाश को भेदकर मन का भेदन करता है, मन को भेदकर अहंकार का भेदन करता है, अहंकार का भेदन करने के पश्चात् वह महत्तत्त्व का भेदन करता है, महत्तत्त्व को भेद कर प्रकृति को भेदता है, प्रकृति का भेदन करने के पश्चात् वह अक्षर का भेदन करता है, अक्षर का भेदन करने के बाद वह मृत्यु का भेदन करता है और वह मृत्यु परमादिदेव परमात्मा में ही एक रूप रहती है। इस एकाकार के पश्चात् सत्, असत् तथा सदसत् आदि कुछ भी नहीं रहता।