१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 328, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ें३३६ सुबालोपनिषद् इस प्रकार से यह निर्वाण (मोक्ष) का अनुशासन है और यही वेद का अनुशासन है, वेद की आज्ञा है ॥ १ ॥ ॥ द्वादशः खण्डः ॥ ॐ नारायणाद्वा अन्नमागतं पक्वं ब्रह्मलोके महासंवर्तके पुनः पक्वमादित्ये पुनः पक्वं क्रव्यादि पुनः पक्वं जालकिलक्लिन्नं पर्युषितं पूतमन्नमयाचितमसंक्लृप्तमश्रीयान्न कंचन याचेत ॥ १ ॥ नारायण के द्वारा अन्न का आगमन हुआ है। वह (अन्न) महासंवर्तक (प्रलय काल में) ब्रह्म के लोक में पका है, इसके बाद वह आदित्य (कालाग्नि) में पका है और इसके पश्चात् वह क्रव्यादि (कल्याण- आवसथ्याग्नि) में पका है। पुनः (प्राणियों के द्वारा खाये जाने पर) जठराग्नि में पका है। इस गीले-बासी (अन्न) को संन्यासी (कभी न खाये, अपितु) पवित्र, अयाचित (बिना माँगे हुए), असंकल्पित (किसी घर विशेष से संकल्पपूर्वक न लेना) भिक्षा में प्राप्त अन्न को ही ग्रहण करे। इस तरह से संन्यासी को किसी से भी अन्न की याचना नहीं करनी चाहिए ॥ १ ॥ ॥ त्रयोदशः खण्डः ॥ बाल्येन तिष्ठासेद्बालस्वभावोऽसङ्गो निरवद्यो मौनेन पाण्डित्येन निरवधिकारतयोपलब्ध्येत कैवल्यमुक्तं निगमनं प्रजापतिरुवाच महत्पदं ज्ञात्वा वृक्षमूले वसेत कुचेलोऽसहाय एकाकी समाधिस्थ आत्मकाम आप्तकामो निष्कामो जीर्णकामो हस्तिनि सिंहे दंशे मशके नकुले सर्पराक्षसगन्धर्वे मृत्यो रूपाणि विदित्वा न बिभेति कुतश्चनेति वृक्षमिव तिष्ठासेच्छिद्यमानोऽपि न कुप्येत न कम्पेतोलपलमिव तिष्ठासेच्छिद्यमानोऽपि न कुप्येत न कम्पेताकाशमिव तिष्ठासेच्छिद्यमानोऽपि न कुप्येत न कम्पेत सत्येन तिष्ठासेत्सत्योऽयमात्मा ॥ १ ॥ (ज्ञानी के लिए) बाल्यकाल में ही सदैव बने रहने की कामना करना, बालकों जैसे स्वभाव वाला, असंग (आसक्ति रहित) रहना एवं निरवद्य (बिना दोष के) रहना, मौन रहना तथा पाण्डित्य को प्राप्त करना, अवधि रहित (वर्णाश्रम आदि से परे रहने वाले) अधिकार को प्राप्त करना, यही अन्तिम कैवल्य स्थिति बतलायी गयी है। प्रजापति ने कहा कि श्रेष्ठ पद को जान लेने के बाद वृक्षों के नीचे निवास करना, जीर्ण वस्त्रों को धारण करना, किसी की भी सहायता न प्राप्त करना तथा एकाकी ही समाधि अवस्था में लीन रहना चाहिए। इस तरह से पुरुष आत्मा को प्राप्त करने की इच्छा वाला, पूर्णकाम एवं कामनाओं से रहित होता है। उस पुरुष की समस्त इच्छाएँ जीर्ण-शीर्ण हो जाती हैं। फिर वह पुरुष हाथी, सिंह, डाँस, मच्छर, न्यौला, सर्प, राक्षस या गन्धर्व आदि में मृत्यु का रूप समझकर किसी से भी भयभीत नहीं होता। वृक्ष की भाँति स्थिर रहने की कामना करता रहता है। उसे यदि कोई काटकर नष्ट कर दे, तब भी वह क्रोधरहित रहता है, कम्पायमान नहीं होता, कमल की तरह निर्लिप्त रहना चाहता है। अस्त्र-शस्त्रादि से छेदा भी जाये, तब भी क्रोधित न हो, अपनी जगह पर स्थिर रहकर आकाश की तरह से वह (निर्लिप्त) रहना चाहता है। छिन्न-भिन्न कर देने पर क्रोधित न हो, कंपित न हो, सदैव सत्य के प्रति आरूढ़ रहना चाहता है। यही आत्मा का सत्य रूप है ॥ १ ॥ सर्वेषामेव गन्धानां पृथिवी हृदयं सर्वेषामेव रसानामापो हृदयं सर्वेषामेव रूपाणां तेजो हृदयं सर्वेषामेव स्पर्शानां वायुर्हृदयं सर्वेषामेव शब्दानामाकाशं हृदयं सर्वेषामेव गतीनामव्यक्तं हृदयं सर्वेषामेव सत्त्वानां मृत्युर्हृदयं मृत्युर्वै परे देव एकीभवतीति परस्तान्न सन्नासन्न