१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 331, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ स्वसवेद्यापानषद् ॥ 'स्व'-आत्मतत्त्व का, संवेद्य-अनुभव प्राप्त करना, इस उपनिषद् का प्रयोजन है। इसमें एक ही मन्त्र चार प्रखण्डों में विभक्त है। पहले प्रखण्ड में प्राणियों की उपमा जल बुद्बुद से दी गई है और कहा गया है, जैसे जल का बुद्बुद जल में विलीन होकर जल के साथ एकाकार हो जाता है, उसी प्रकार प्राणियों का समूह, अमृतसागर स्वरूप परब्रह्म में विलीन हो जाता है, परन्तु ऐसी स्थिति ज्ञान-प्राप्ति के बाद ही सम्भव होती है, अधिकांशतया तो प्राणी अज्ञान से ही आवृत होते हैं। दूसरे प्रखण्ड में बताया गया है कि सभी काल, कर्मात्मक और स्वभावात्मक होते हैं। यथार्थ में पाप- पुण्य, अच्छा-बुरा कोई नहीं होता, केवल 'मत' (आत्मतत्त्व की निष्ठा) की ही यथार्थता है। इसमें परिनिष्ठित व्यक्ति के लिए मोक्ष-नरक आदि कुछ भी नहीं होता। तीसरे प्रखण्ड में तत्त्वज्ञान को गुहा में प्रविष्ट बताते हुए कहा गया है कि सामान्य जनों की इस मार्ग में प्रवृत्ति ही नहीं हो पाती। साकार उपासना प्रधान लोग अज्ञान में भटकते रहते हैं। तत्त्वज्ञानी को ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र तथा कुत्ते, गधे, बिल्ली में चैतन्यतत्त्व की दृष्टि से कोई अन्तर प्रतीत नहीं होता। अन्तिम चतुर्थ प्रखण्ड में सभी को आत्मतत्त्व सम्पन्न मानकर, सबकी सेवा करने का मर्म समझाया गया है। अन्त में 'गुरु' की महत्ता बताते हुए कहा गया है कि सब कुछ गुरु की कृपा से ही जाना जा सकता है, उनसे बढ़कर कोई भी नहीं-यह तथ्य जानने वाला ही जीवन्मुक्त हो पाता है। ॐ सर्वेषां प्राणिबुद्बुदानां निरंजनाव्यक्तामृतनिधौ विलयविलासः स्थितिर्विजृम्भते। तेषामेव पुनर्भवं नो इहास्ति। स यथा मृत्पिण्डे घटानां तन्तौ पटानां तथैवेति भवति। वस्तुतो नोपादानमत एव नोपादेयमत एव न निमित्तमत एव न विद्या न पुराणं नो वेदा नेतिहासा इति न जगदिति न ब्रह्मा नो विष्णुः नाथ रुद्रो नेश्वरो न बिन्दुः नो कलेति अग्रे मध्येऽवसाने सर्वं यथावस्थितं यथावस्थितज्ञानं तेषां नो भवत्यागमपुराणेतिहासधर्मशास्त्रेषु धृताभिमानास्ते। यत्तानि तु मुग्धतरमुनिशब्दवाच्यैः जीवबुद्बुदैः रचितानीति भवन्ति। तत्र ग्रामाण्यं तादृशानामेव। ते त्वज्ञानेनावृताः सयत्नेन गर्भास्तदप्येष श्लोको भवति। तदत्र श्लोको भवति ॥ १-क ॥ ॐ प्राणिस্বরূপ बुलबुलों (पानी के बुलबुलों) का निरञ्जन और अव्यक्त अमृत के सागर परब्रह्म में विलीन हो जाने की स्थिति प्रकट और सत्य है। यह अवश्य ही होती है। ब्रह्मलीन हो जाने वालों का पुनरागमन नहीं होता। उनकी स्थिति मृत्तिकापिण्ड में कुम्भ की तरह और धागों में कपड़े की तरह हो जाती है। वस्तुतः वह न उपादान है, न उपादेय और न निमित्त ही है। वह विद्या, पुराण, वेद, इतिहास भी नहीं है। न जगत् है, न ब्रह्मा, न विष्णु, न रुद्र, न ईश्वर न बिन्दु और न कला ही है। आगे (आदि), मध्य और अन्त में उन सबको (प्राणियों को) यथावस्थित ज्ञान नहीं होता, क्योंकि वे आगम, पुराण, इतिहास एवं धर्मशास्त्रों में अभिमान धारण करने वाले होते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि वे जीव मुनि द्वारा उच्चरित किये गये श्रेष्ठ वचनों रूपी बुद्बुदों द्वारा विनिर्मित होते हैं। वहाँ (उस सन्दर्भ में) वैसों की ही प्रामाणिकता मान्य होती है। वे तो