भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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३४० स्वसवेद्यापानषद

अज्ञान से आवृत हैं। बहुत प्रयत्न करने पर कुछ ज्ञान प्राप्त कर पाते हैं, फिर भी यह उक्ति प्रसिद्ध है, कि वे सब (जीव) अज्ञान युक्त हैं, मुग्धतर हैं ॥ १-क ॥ इह तेनाप्यज्ञानेन नो किञ्चित् । अथ यथावस्थितज्ञानेन किंचित् नेति यदस्ति तदस्ति यन्नास्ति नास्ति तत् । कालकर्मात्मकमिदं स्वभावात्मकं चेति। न सुकृतं नो दुष्कृतम्। अत एव सुमेरुदातारो गोदातारो वा गोघ्नैः ब्राह्मणघ्नैः सुरापानैः पश्यतोहरैः परोक्षहरैर्वा गुरुपापनिष्ठैः सर्वपापनिष्ठैः समानास्त एते । तैश्च न गौः न ब्राह्मणः न सुरा न पश्यतोहरः न परोक्षहरः न गुरुपापानि न लघुपापानि मत एव तन्निष्ठाः मत एव न निर्वाणं नो निरय इति तदप्येष श्लोको भवति ॥ १-ख ॥ यहाँ उस अज्ञान से कोई प्रयोजन नहीं है और उस यथावस्थित ज्ञान से भी कोई प्रयोजन नहीं है। जिसका अस्तित्व है, उसका है। जिसका अस्तित्व नहीं है, उसका नहीं है। ये सभी काल-कर्मात्मक और स्वभावात्मक हैं। पुण्य और पाप भी नहीं है। अतएव सुमेरु (स्वर्ण) दाता, गोदाता अथवा गोहन्ता, ब्राह्मणहन्ता, सुरापायी, डाकू, चोर, गुरु (महान्) पापनिष्ठ तथा सर्वपापनिष्ठ ये सभी एक ही समान हैं। उनके लिए न गौ है, न ब्राह्मण है, न शराब पीने वाला है, न डाकू है, न चोर है, न बड़े पाप हैं, न छोटे पाप हैं। उनके लिए तो (उनका) मत सर्वोपरि है, क्योंकि मत में ही उनकी निष्ठा है। मोक्ष और नरक भी उनके लिए कुछ भी नहीं है। ऐसा इस श्लोक का अर्थ है ॥ १-ख ॥ तत्त्वज्ञानं गुहायां निविष्टमज्ञानिकृतमार्गं सुष्ठु वदन्ति। ते तत्र साभिमाना वर्तन्ते । पुष्पितवचनेन मोहितास्ते भवन्ति । स यथातुरा भिषग्ग्रहणकाले बाला अपथ्याहितगुडादिना जनन्या वञ्चिता इति नानादेवता गुरुकर्मतीर्थनिष्ठाश्च ते भवन्ति । केचिद्वयं वैदिका इति वदन्ति। नान्येऽस्मभ्यम्। केचिद्वयं सर्वशास्त्रज्ञा इति। केचिद्वयं देवानुग्रहवन्तः। केचिद्वयं स्वप्ने उपास्यदेवताभाषिणः। केचिद्वयं देवा इति। केचिद्वयं श्रीमद्रमारमणनलिनभृङ्गा इति । केचित्तु नृत्यन्तु। केचित्तु मूर्खा वयं परमभक्ता इति वदन्तो रुदन्ति पतन्ति च । ये केचन्नैते ते सर्वेऽप्यज्ञानिनः । ये तु ज्ञानिनो भवन्ति ये तत्त्वज्ञानिनश्च तैस्तेषां को विशेषः। मत एव केषाञ्चित्कैश्चिद्भेदः। मत एव यत्र विरिञ्चिविष्णुरुद्रा ईश्वरश्च गच्छन्ति तत्रैव श्वानो गर्दभाः मार्जाराः कृमयश्च मत एव न श्वानगर्दभौ न मार्जारः न कृमिः नोत्तमाः न मध्यमाः न जघन्याः । तदप्येष श्लोको भवति ॥१-ग ॥ तत्त्वज्ञान को गुहा में प्रविष्ट कहा गया है। अज्ञानियों द्वारा किये गये (ज्ञान हेतु अपनाये गये) मार्ग को श्रेष्ठ कहा गया है; क्योंकि वे अभिमान सहित उस मार्ग पर चलते हैं। वे पुष्पित (मुग्ध) वचनों के द्वारा मोहित हो जाते हैं। जिस प्रकार माताएँ बच्चों को दवा खिलाते समय अपथ्य गुड़ आदि मिलाकर उन्हें दवा खिलाती हैं अर्थात् अपथ्य गुड़ का प्रलोभन देकर औषधि खिला देती हैं; उसी प्रकार अनेक देवों की उपासना, गुरुओं के प्रति निष्ठा, तीर्थ सेवन और विभिन्न सत्कर्म करने वाले भी इन्हें (देवों आदि को) ठगते हैं अर्थात् उनके उपर्युक्त कर्मों के पीछे भी उनकी यही इच्छा रहती है कि हमारी सद्गति हो। कुछ लोग हम वैदिक हैं, ऐसा कहते हैं। अन्य लोग ऐसा नहीं कहते। कुछ अपने को समस्त शास्त्रों का ज्ञाता कहते हैं, कुछ अपने को देव अनुग्रहवान् कहते हैं। कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि हम स्वप्न में अपने उपास्य देवता द्वारा बताई गई बात बता