१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 337, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट-१ परिभाषा-कोश -१०८ उपनिषद्-ब्रह्मविद्या खण्ड १. अक्षय — कोश ग्रन्थों के अनुसार अक्षय का अर्थ है-'नास्ति क्षयोऽस्य' अर्थात् जिसका कभी क्षय (क्षरण) न हो, जो अविनाशी हो। जो सदा रहने वाला शाश्वत और कल्पान्त स्थायी हो। उपर्युक्त सभी गुणों का ईश्वर में समावेश है। अतः परमात्मा को अक्षय कहते हैं। अक्षय अर्थ में ही 'अक्षर' शब्द भी प्रयुक्त होता है- 'न क्षरमिति अक्षरम्' अर्थात् जो कभी अपने स्वरूप से विचलित न हो, वह अक्षर है। कठोपनिषद् में कहा गया है कि जो इस 'अक्षर' (ब्रह्म) को (भलीप्रकार) जान लेता है, वह सब कुछ प्राप्त कर लेता है-एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्ध्येवाक्षरं परम्। एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् (कठो० १.२.१६)। वस्तुतः संसार में दो प्रकार की सृष्टि है-क्षर और अक्षर। सभी परिवर्तनशील, यहाँ तक जीव-जगत् भी 'क्षर' हैं; किन्तु जो सदैव एक सा ही रहता है, कूटस्थ है-वह 'अक्षर' है-द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च। क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते (गी० १५.१६)। कभी विनष्ट न होने के अर्थ में-विशेषण रूप में भी अक्षय शब्द कई शब्दों के साथ प्रयुक्त होता है, जैसे-अक्षय तृतीया, अक्षय चतुर्थी, अक्षय नवमी, अक्षय पात्र तथा अक्षय वट आदि। २. अग्निष्टोम —अग्निष्टोम एक श्रौत यज्ञ है। यह यज्ञ प्रायः दो प्रकार का होता है-१. सोमयज्ञ २. हविर्यज्ञ। जिस यज्ञ में सोमरस से आहुति प्रदान की जाती है, वह सोमयज्ञ तथा जिसमें दूध, दही, घी और पुरोडाश आदि पिष्टक आहुति देकर यजन किया जाता है, वह हविर्यज्ञ कहलाता है। 'अग्निष्टोम' सोमयज्ञ के अन्तर्गत आता है। इसमें प्रथम सोमरस से आहुति दी जाती है, तत्पश्चात् सोमरस का पान किया जाता है। इस यज्ञ का काल वसन्त ऋतु माना जाता है; क्योंकि वसन्त में सोम प्रचुर परिमाण में उपलब्ध होता रहा-वसन्ते अग्निष्टोमः इति कात्यायनः। इस यज्ञ में प्रमुखतः अग्निदेव का स्तवन किया जाता है, इसलिए इसका नाम अग्निष्टोम पड़ा है- अग्नीनां स्तोमः इति अग्निष्टोमः। इसमें अग्निदेव के अतिरिक्त कुछ विशेष उद्देश्यों से इन्द्र और वायु आदि देवताओं का स्तवन भी किया जाता है। ताण्ड्य महाब्राह्मण (६.१.१) में उल्लेख है कि प्रजापति ने बहु प्रजा के सृजन की इच्छा से अग्निष्टोम का दर्शन किया, उसे लाये और उसके माध्यम से प्रजा का सृजन किया-प्रजापतिरकामयत बहुस्यां प्रजायेयेति स एतमग्निष्टोममपश्यत्तमाहरत्तेनेमाः प्रजा असृजत। ३. अग्निहोत्र — अग्निहोत्र एक यज्ञ विशेष है, जिसमें मात्र अग्निदेव के लिए ही आहुतियाँ प्रदान को जाती हैं-अग्नये हूयतेऽत्र (वाच० पृ० ६१)। तैत्तिरीय ब्राह्मण में उल्लेख है कि प्राचीन काल में एक बार प्रजापति के भय से अग्निदेव के पलायन करने पर प्रजापति ने उसी अग्नि में 'स्वाहा' पूर्वक आहुतियाँ देना प्रारम्भ कर दिया। प्रथम आहुति से पुरुष का प्रादुर्भाव हुआ, द्वितीय आहुति से अश्वादि जन्मे। इस पर अग्नि को यह भय उत्पन्न हो गया कि प्रजापति बारम्बार आहुतियाँ प्रदान करके अपना अभीष्ट प्राप्त करेंगे और उन्हें (अग्नि को) उन आहुतियों का भाग भी न देंगे। आहुतियों का भाग मात्र देवगण ही ग्रहण करेंगे, तब तो मैं भूखा ही रहूँगा। अतः इस बार अग्निदेव पलायन न करके प्रजापति के अन्दर ही प्रविष्ट हो गये। प्रजापति ने कहा कि हे अग्ने ! जन्म ग्रहण करो-जन्म ग्रहण करो। अग्निदेव ने कहा कि मुझे आहुतियों का भाग नहीं मिलता, अतः भूखा रहकर मैं सेवा करने में असमर्थ हूँ। प्रजापति ने यह कहकर उन्हें भाग प्रदान किया कि अग्निहोत्रगत वह हवि आपके लिए ही दी गई थी (अग्नये हूयते इति अग्निहोत्रम्)। इसके पश्चात् प्रजापति के उदर से अग्निदेव का पुनः प्राकट्य हुआ-सोऽग्निरबिभेत्। आहुतीर्भिर्वै माऽऽप्रीतीति। स प्रजापतिं पुनः प्राविशत्......... (तैत्ति० ब्रा० २.१.२.५)। अग्निहोत्र के दो प्रकार बताए गए हैं-एक तो प्रतिदिन चलते रहकर एक मास में पूर्ण होने वाला तथा दूसरा यावज्जीवन (जीवनभर) चलने वाला। आजीवन चलने वाले अग्निहोत्र में प्रातः-सायं दोनों समय अग्नि में आहुति प्रदान की जाती है और अन्त में अग्निहोत्री का दाह संस्कार भी उसी अग्नि से किया जाता है। विवाह के पश्चात् ब्राह्मण को वसन्त ऋतु में, क्षत्रिय को ग्रीष्म ऋतु में तथा वैश्य को शरद ऋतु में अग्नि स्थापन करके शास्त्र वर्णित मन्त्र से अग्निहोत्र प्रारम्भ करना चाहिए। प्राचीनकाल में तो विभिन्न प्रकार के हव्य पदार्थों से अग्निहोत्र होता था; पर अब दुग्ध, घृत आदि सुलभ द्रव्यों द्वारा ही अग्निहोत्र करने का प्रचलन है। ४. अजपा गायत्री — जो जप बिना प्रयत्न के ही स्वाभाविक रूप से चलता रहे, वह अजपा जप कहलाता है- प्रयत्नेन न जप्य अप्रयत्नोच्चारितत्वात् जप कर्मणि ....... (वाच० पृ० ८९)। इसे सोऽहम् तथा हंस साधना भी कहते हैं। सहज