१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअजपा जप ३४६ परिशिष्ट
श्वास-प्रश्वास के क्रम में जब हम श्वास को अन्दर खींचते हैं, तो वायु प्रवेश के साथ ही एक सूक्ष्म ध्वनि होती है, जिसका उच्चारण 'सो ऽऽऽ' जैसा होता है। कुछ देर श्वास अन्दर ठहरती है, उस समय 'अ ऽऽऽ' जैसी ध्वनि होती है तथा जब श्वास बाहर निकलती है, तो 'हं' जैसी ध्वनि होती है। इन्हीं तीनों ध्वनियों पर ध्यान केन्द्रित करने से 'सोऽहम्' के अजपा जप की स्थिति बन जाती है- श्वासप्रश्वासयोः बहिर्गमनागमनाभ्याम् अक्षर्निष्पादनरूपे जपे स च हंसः सोहमित्याकारस्यैव तदाकारमन्त्रे च (वाच०पृ०८९)। शास्त्रों के अनुसार रात्रि और दिन में कुल मिलाकर हम २१,६०० बार श्वास ग्रहण करते हैं। इस प्रक्रिया में स्वाभाविक रूप से जिस मन्त्र का जप चलता है, उसे हंस मन्त्र या अजपा मन्त्र कहते हैं। प्राणों की रक्षा करने वाली शक्ति का नाम गायत्री है-गयान् प्राणान् त्रायते इति गायत्री। इस साधना से प्राण शक्ति को रक्षा होती है। अतः इसे अजपा गायत्री कहते हैं। ५. अजपा जप - द्र० - अजपा गायत्री। ६. अजपा मन्त्र - द्र० - अजपा गायत्री। ७. अजर - अध्यात्म सम्बन्धी प्रकरणों में प्रायः 'अजर' शब्द का प्रयोग होता है। अजर का शाब्दिक अर्थ है- 'नास्ति जराऽस्याः' अर्थात् जिसकी वृद्धावस्था न हो। देवों को भी 'अजर' कहा जाता है; क्योंकि वे भी कभी वृद्ध नहीं होते। कोश ग्रन्थों में उल्लेख है कि 'नास्ति जरा यस्य, देवे। तेषां षड्भावविकारमध्ये जायतेऽस्ति वर्धते इति तिसृणामेव दशानां सद्भावात् तदुत्तरवर्त्तिनीनां 'विपरिणमते अपक्षीयते नश्यतीति' तिसृणामभावादजरत्वम् (वाच०पृ०९०)' अर्थात् जिसकी वृद्धावस्था न हो, जैसे देवता। उनमें छः भाव विकारों के बीच-जन्म,अस्तित्व तथा विकास इन तीन अवस्थाओं को स्थिति तथा परिवर्तन, क्षरण और नाश, इन तीन अवस्थाओं का अभाव होने से 'अजरता' सिद्ध होती है। आत्मा और परमात्मा के विशेषण रूप में भी 'अजर' शब्द का प्रयोग होता है; क्योंकि ये सभी अवस्थाओं (जन्म, शैशव, कैशोर्य, युवावस्था, जरावस्था और मृत्यु) से परे हैं। घृतकुमारी को भी अजरा कहते हैं; क्योंकि वह औषधि-वनस्पति कभी सूखती नहीं अर्थात् कभी वृद्ध नहीं होती। ८. अज्ञान-आवरण - नैयायिकों के अनुसार ज्ञान का अभाव ही अज्ञान है- अज्ञानञ्च ज्ञानाभाव इति नैयायिकाः। श्रीमद्भागवत में उल्लेख है कि सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्मा ने पाँच प्रकार के अज्ञान का सृजन किया था, ये हैं-तम, मोह, महामोह, तामिस्र और अन्धतामिस्र-सृष्टिकाले ब्रह्मा प्रथमं पञ्च प्रकारमज्ञानं ससर्ज। यथा तमः, मोहः, महामोहः, तामिस्रं, अन्धतामिस्रं इति श्रीभागवतम् (श०क० खं०१ पृ० २३)। ज्ञान के विरोधी भाव को अज्ञान कहते हैं, ऐसा वेदान्त का मत है। सत् और असत् के वास्तविक रूप को जानने के लिए त्रिगुणात्मक भावरूप ज्ञान आवश्यक है और जो इसमें अवरोध उत्पन्न करे, वही अज्ञान है। कई स्थलों पर 'अज्ञान' के साथ 'आवरण' शब्द का भी प्रयोग किया जाता है। इसका अर्थ यह है कि अज्ञान वस्तुस्थिति पर आवरण के समान होता है, जो मूल स्थिति से अवगत नहीं होने देता, इसी से जीव मोहित होते देखे जाते हैं। गीता (५.१५) में उल्लेख है- 'अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः'। वेदान्त के अनुसार अज्ञान की दो शक्तियाँ मानी गयी हैं- १. आवरण २. विक्षेप। अज्ञान अपनी प्रथम शक्ति-आवरण से रज्जु के वास्तविक स्वरूप को नहीं समझने देता और अपनी द्वितीय शक्ति-विक्षेप से उसमें 'सर्प' होने को नवीन कल्पना उत्पन्न कर देता है। आवरण शक्ति के विषय में श्री नृसिंह सरस्वती ने लिखा है कि जो सच्चिदानन्द स्वरूप को आवृत कर लेती है, वह आवरण शक्ति है- सच्चिदानन्द - स्वरूपमावृणोत्यावरणशक्तिः (वे० सा० सू०पृ० १३)। ९. अद्वयानन्द - ब्रह्म और जीव तथा आत्मा और जगत् को एक ही मानने वाली विचारधारा को अद्वैतवाद कहते हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार ये दोनों पृथक्-पृथक् हैं; पर आचार्य शंकर ने इन्हें एक ही माना है। वेदों और उपनिषदों में भी यही प्रतिपादन है कि ब्रह्म के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। सर्वं खल्विदं ब्रह्म' (छान्दो० ३.१४.१); नेह नानास्ति किंचन (बृह०उ० ४.४.१९)। ऋग्वेद में उल्लेख है कि 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति' (ऋ० १.१६४.४६)। द्वित्व का भेद जहाँ नहीं है, उस भाव की अनुभूति का नाम ही अद्वयानन्द है। कोश ग्रन्थों में उल्लेख है--नास्ति द्वयं द्वित्वं भेदः तज्ज्ञानं वा यस्य यत्र वा तादृश आनन्दः (वाच० पृ० ११९)। ब्रह्मरूप आनन्द ही अद्वयानन्द है-ब्रह्मरूपानन्दे अद्वैतानन्दे। अर्थतो ऽप्यद्वयानन्दमतीतद्वैतभानत इति वे० सा० (वाच०पृ० ११९)। हिन्दी विश्वकोश में उल्लेख है कि अद्वय से उत्पन्न आनन्द या ब्रह्मज्ञान से उत्पन्न आनन्द या आत्मबोध से उत्पन्न आनन्द ही अद्वयानन्द है-अद्वयात् लब्धः आनन्दः। ब्रह्मानन्द, ब्रह्मज्ञानोदित आनन्द (हि०वि० को० खं०१पृ० ३४३)। इसी प्रकार ब्रह्मज्ञान या आत्मबोध से उत्पन्न आनन्द को आत्मानन्द, ब्रह्मानन्द या परमानन्द कहते हैं। सतत स्थिर रहने के कारण इस आनन्द को अखण्डानन्द-सदानन्द भी