१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 339, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ेंकहते हैं-अखण्डानन्दमात्मानं विज्ञाय स्वरूपतः । बहिरन्तः सदानन्द रसास्वादनमात्मनि (अध्यात्मो० २७)।
१०. अद्वैत - द्र०-ज्ञान खण्ड ।
११. अध्यारोप-अपवाद - अध्यारोप और अपवाद न्याय का उल्लेख वेदान्त दर्शन में मिलता है। जिसके माध्यम से
ब्रह्म-जीव का ऐक्य प्रतिपादित किया जाता है, उस प्रणाली को अध्यारोप कहते हैं। दूसरे शब्दों में अवस्तु में वस्तु का
आरोप अध्यारोप है। जैसे रज्जु (रस्सी) में सर्प का आरोप, सर्प रूप अवस्तु (जो वहाँ उपस्थित नहीं है) का रज्जु रूप-
वस्तु (जो वहाँ उपस्थित है) में आरोप ही अध्यारोप है; उसी प्रकार ब्रह्म रूप वस्तु में जगत् रूप अवस्तु का आरोप ही
अध्यारोप है। वेदान्त विमर्श पृ० १०३ में यह तथ्य इस प्रकार निर्दिष्ट है-"असर्पभूतायां रज्जौ सर्पारोपवद्
वस्तुन्यवस्त्वारोपोऽध्यारोपः। वस्तु सच्चिदानन्दानन्ताद्वयं ब्रह्म। अज्ञानादि सकलजड समूहोऽवस्तु।" इस अध्यारोप
को ही आचार्य शंकर ने अध्यास कहा है- अध्यासॊ नाम अतस्मिंस्तद्बुद्धिरिति (ब्र० सू० शां०भा० १.१.१)।
इसी प्रकार विपर्यय या विपर्यास (वस्तु के विपरीत प्रतीति), भ्रम आदि शब्द भी अध्यारोप के ही पर्यायवाची
हैं। अध्यारोप (मिथ्या-प्रतीति) का निराकरण अपवाद द्वारा होता है। अपवाद की व्युत्पत्ति अप उपसर्ग पूर्वक वद् धातु
से घञ् प्रत्यय से मानी गयी है, जिसका अर्थ निषेध या निराकरण है। अध्यारोप के कारण वस्तु में अवस्तु का आरोप हो
जाने से-रज्जु में सर्प के आरोप से वह सर्प ही प्रतीत होती है; पर जब प्रकाश के माध्यम से यह सिद्ध हो जाये कि यह
सर्प नहीं रज्जु ही है, तो यह प्रक्रिया (निराकरण प्रक्रिया) अपवाद कहलायेगी। वे०सा० में यह तथ्य इन शब्दों में निर्दिष्ट
है-अपवादो नाम रज्जुविवर्तस्य सर्पस्य रज्जुमात्रत्वाद् वस्तु विवर्तस्यावस्तुनोऽज्ञानादेः प्रपञ्चस्य वस्तुमात्रत्वम्
(वे०सा० खण्ड २१) अर्थात् अध्यारोप के कारण रस्सी सर्पाभास (सर्प होने का आभास) रज्जु का विवर्त [रज्जु का
अपने स्वरूप का त्याग न करते हुए, अन्यरूप (सर्प के रूप में) भासित होना] होने से रज्जु मात्र ही हो जाती है अर्थात्
सर्प की अधिष्ठान (आधार) रूप रज्जु को अपने मूल रूप में पहचान लेना ही अपवाद है। इसी प्रकार वस्तुरूप ब्रह्म में
अध्यारोपित अवस्तु जड़ जगत् को वस्तुतः ब्रह्म ही जान लेना अपवाद है। पैङ्गलोपनिषद् में भी अध्यारोप और अपवाद
द्वारा स्वरूप का निश्चय करने के तथ्य की पुष्टि की गई है-.........अध्यारोपापवादतः स्वरूपं निश्चयीकर्तुं शक्यते
(पैङ्गलो० २.१.८)।
१२. अध्यास - द्र०-अध्यारोप-अपवाद ।
१३. अध्वर्यु - आर्ष ग्रन्थों में यज्ञ सम्पन्न कराने वाले ऋत्विजों (ब्राह्मणों) के अन्तर्गत 'अध्वर्यु' नामक ऋत्विज् का भी
उल्लेख मिलता है। विभिन्न विद्वानों के मतानुसार इनकी (ऋत्विजों को) संख्या प्रायः सोलह (ब्रह्मा, ब्राह्मणाच्छंसी,
आग्नीध्र, पोता, उद्गाता, प्रस्तोता, प्रतिहर्ता, सुब्रह्मण्य, होता, मैत्रावरुण, अच्छावाक्, ग्रावस्तुत, अध्वर्यु, प्रतिप्रस्थाता, नेष्टा
और उन्नेता) बतायी गई है; पर प्रमुखतः इनकी संख्या सात ही है। ऋग्वेद में इनका वर्णन इन शब्दों में मिलता है-तवाग्ने
होत्रं तव पोत्रमृत्वियं तव नेष्ट्रं त्वमग्निदृतायतः । तव प्रशास्त्रं त्वमध्वरीयसि ब्रह्मा चासि गृहपतिश्च नो दमे (ऋ०
२.१.२)। ये ऋत्विज् होता, पोता, नेष्टा, आग्नीध्र, प्रशास्ता, अध्वर्यु और ब्रह्मा हैं। इनमें होता का कार्य ऋचाओं का गान
करना तथा अध्वर्यु का कार्य प्रार्थना, निर्ऋतिनाशक मन्त्रोच्चारण तथा यज्ञ के व्यावहारिक कार्य करना है। वाचस्पत्यम् के
अनुसार अध्वर्यु का प्रमुख कार्य यजुर्वेदज्ञ होकर यज्ञ की विधि-व्यवस्था बनाना तथा होता को प्रोत्साहित करना है-
अध्वरमिच्छति ........... । यजुर्वेदज्ञे होमकारिणि ऋत्विजि।' निर्मिमीते क्रिया संघैरध्वर्युर्यज्ञियं वपु' रीति सा०भा० ।
.........होता प्रथमं शंसति तमध्वर्युः प्रोत्साहयतीति.....सि०कौ० (वांच०पृ०१४२)।
१४. अनन्त - द्र०- ज्ञानखण्ड ।
१५. अनाहत नाद - अनाहत शब्द दो पदों से मिल कर बना है। अन्+आहत अर्थात् जो शब्द बिना आघात या धक्का के
अपने आप उत्पन्न हुआ हो। योगीजन इस नाद को दोनों कानों में अँगुली लगाकर सुनते हैं। ओंकार ध्वनि या सोऽहम्
ध्वनि अनाहत या अनहद नाद कहलाती है। तन्त्र शास्त्र में वर्णन मिलता है कि हृदय स्थित सुषुम्ना के मध्य में द्वादशदल
कमल में स्थित शब्द ब्रह्ममय है, जो अनाहत है-तन्त्रशास्त्रे प्रसिद्धे हृदयस्थिते सुषुम्णामध्यस्थे द्वादशदलपद्मे शब्दो
ब्रह्ममयः, शब्दोऽनाहतो यत्र दृश्यते अनाहताख्यं तत् पद्मं मुनिभिः परिकीर्त्तित-मित्युक्तलक्षणे (वाच०पृ० १६१)।
शास्त्रों में उल्लेख है कि हठयोग में कुण्डलिनी को जाग्रत् किया जाता है। वह जब जाग्रत् होने की स्थिति में ऊर्ध्वमुखी
होती है, उस समय बिना किसी आघात के जो विस्फोट होता है, वही अनाहत नाद है। इसका अनुभव किसी को शंख