भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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ध्वनि की तरह, किसी को भ्रमरगुञ्जन और किसी को सोऽहम् नाद तथा किसी को ॐकार ध्वनि की तरह होता है। १६. अनियामकत्व — उपनिषदों में कई स्थानों पर 'अनियामकत्व' शब्द प्रयुक्त हुआ है, जो 'नियामक' शब्द से बना है। प्रख्यात कोश ग्रन्थ वाचस्पत्यम् में इसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार दी है- नि+यम-णिच्-ण्वुल्, नियमकारके नियामकत्वम् अदृष्टकालादेः “कारणस्य कार्यं प्रति नियामकत्वम्” अर्थात् कारण का नियमन, नियन्त्रण करने वाला। हिन्दी विश्वकोश में भी इसका अर्थ नियम करने वाला, नियम या कायदा बाँधने वाला, व्यवस्था करने वाला आदि दिया है। इसी नियामक शब्द में अभावार्थक 'अ' उपसर्ग जोड़ने से भाववाचक संज्ञा में 'अनियामकत्व' शब्द बनता है, जो किसी को वश में-नियन्त्रण में न रखने वाले गुण के अर्थ में प्रयुक्त होता है। निर्वाण उपनिषद् में परमहंस की स्थिति का वर्णन करते हुए उपनिषदकार ने लिखा है- 'अनियामकत्व निर्मल शक्तिः' अर्थात् अनियामकत्व ही उनकी (परमहंसों की) निर्मल शक्ति होती है। ईश्वर के द्वारा सभी जीव नियन्त्रित हैं; क्योंकि वह उनका नियामक है- ईश्वरेण स्वस्वकार्ये नियम्यत इति नियम्यं जीवजातम्। तदन्तर्यामिनियामकः ईश्वरः (निर्वाण० ५२ टीका)। परमहंस लोग मायातीत हो जाने के कारण तथा सर्वसाक्षित्व के कारण अनियामकत्व गुण से ओत-प्रोत होते हैं अर्थात् वे न किसी के द्वारा नियन्त्रित होते हैं और न ही वे किसी को अपने वश में करते हैं, वरन् साक्षीभाव से युक्त रहते हैं-तयोः मायिकत्वेन तदतीतत्वं अनियामकत्वं सर्वसाक्षित्वम् (निर्वाण० ५२ टीका)। १७. अनुपवीत — भारतीय संस्कृति में द्विज को यज्ञोपवीतधारी होना आवश्यक माना जाता है। जिसका दूसरा जन्म हुआ हो, वह द्विज कहलाता है- द्वाभ्यां जन्मसंस्काराभ्यां जायते इति द्विजः अर्थात् जिसने वर्तमान ढर्रे के जीवन को छोड़कर आदर्शवादिता के क्षेत्र में प्रवेश करके नया जन्म धारण किया हो, वह द्विज कहलाता है और उसका प्रतीक होता है, यज्ञ का उपवीत (धागा) यज्ञोपवीत। यज्ञोपवीतधारी होने का अर्थ है कि वह व्यक्ति जो यज्ञीय जीवन (त्यागमयजीवन) जीता हुआ, अपने को पवित्र बनाता हुआ, परमार्थ परायणता के पथ पर अग्रसर होता है। अपने धर्म का पालन न करता हुआ, जो यज्ञोपवीत भी धारण नहीं करता, वह अनुपवीत कहलाता है। प्राचीन काल में वर्णाश्रम धर्मानुसार केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को ही यज्ञोपवीत धारण करने का अधिकार था। ये यदि यज्ञोपवीत धारण नहीं करते थे, तो इन्हें अनुपवीत कहा जाता था। उपवीतधारी को यज्ञीय जीवन जीने के साथ ही गायत्री उपासक होना आवश्यक है; क्योंकि यज्ञोपवीत वस्तुतः गायत्री की ही मूर्तिमन् प्रतिमा है। गायत्री मन्त्र के नौ शब्द यज्ञोपवीत के नौ धागे तथा एक प्रणव व तीन व्याहृतियाँ उसकी चार ग्रन्थियाँ हैं। उपवीत रूप में गायत्री की प्रतिमा को धारण न करने.वाला हो अनुपवीत है। अथर्वशिर उपनिषद् में उल्लेख है कि इस उपनिषद् का पाठ करने वाला श्रोत्रिय न हो, तो श्रोत्रिय और अनुपवीत हो, तो उपवीत वाला हो जाता है- य इदमथर्वशिरो ब्राह्मणोऽधीते अश्रोत्रियः श्रोत्रियो भवति, अनुपनीत उपनीतो भवति ........(अथर्वशिर० ७)। १८. अनुष्टुप्— महर्षि कात्यायन ने सर्वानुक्रमणिका में सात वैदिक छन्दों का उल्लेख किया है- गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप् और जगती। जिसमें अनुष्टुप् भी एक छन्द है। इसमें आठ-आठ अक्षर के चार पाद होते हैं। वैदिक काल में अनुष्टुप् छन्द का नाम मिलता है- “अनुष्टुभा सोम उक्थैः” (ऋ० १०.१३०.४)। अनुष्टुप् छन्द सरल और मधुर होने से श्लोक रचना में सहज पड़ता है। श्रुतबोध में अनुष्टुप् छन्द का लक्षण बताते हुए लिखा है-पञ्चमं लघु सर्वत्र सप्तमं द्विचतुर्थयोः। षष्ठं गुरु विजानीयादित्यनुष्टुभ लक्षणम् (श्रुतबोध) अर्थात् सभी पादों का पञ्चम वर्ण एवं द्वितीय-चतुर्थ पाद का सप्तम वर्ण लघु और षष्ठ वर्ण गुरु रहने से अनुष्टुप् छन्द कहलाता है। किसी-किसी स्थल में पञ्चम वर्ण भी गुरु रहता है। यथा- “तिथ्यादितत्त्वं तत् प्रीत्यै” (स्मार्त)। ऐतरेय आरण्यक में लिखा है कि अनुष्टुप् छन्द से स्वर्ग प्राप्ति की कामना पूर्ण होती है- अनुष्टुभै स्वर्गकामः कुर्वीतः। विष्णु पुराण में उल्लेख है कि एकविंशस्तोम, अथर्ववेद, आप्तोर्याम नामक याग, अनुष्टुप् छन्द और वैराजसाम ब्रह्मा के उत्तर मुख से उत्पन्न हुआ था- “एकविंशमथर्वाणमाप्तोर्यामाणमेव च। अनुष्टुभं स वैराजम् उत्तरादसृजन् मुखात्" (वि०पु० १.५.४५)। इसी प्रकार जगती छन्द में चार चरण होते हैं, जिनमें प्रत्येक में बारह-बारह वर्ण होते हैं। त्रिष्टुप् छन्द में भी चार चरण होते हैं, जिनमें प्रत्येक में ग्यारह-ग्यारह वर्ण (अक्षर) होते हैं। १९. अन्तर्यामी— द्र०-ज्ञानखण्ड -अन्तर्यामी साक्षी। २०. अन्तःकरण चतुष्टय — द्र० - ज्ञानखण्ड ।