भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

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परिशिष्ट ३४९ अमानित्वगुण २१. अपरिग्रह - द्र०- यम। २२. अपरिग्रही - भारतीय योग दर्शन में यम-नियम के अन्तर्गत अपरिग्रह का बहुत महत्त्व है। योग दर्शन में यम के पाँच भेद निरूपित किये गये हैं- अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः अर्थात् अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (अधिक संग्रह न करना)-ये यम कहलाते हैं। इसी प्रकार गायत्री उपासक-यज्ञोपवीतधारी को शास्त्र वर्णित जिन नौ गुणों से युक्त होना अनिवार्य है, उनमें भी अपरिग्रह महत्त्वपूर्ण गुण है- अहिंसा सत्यमस्तेयं तितिक्षा चापरिग्रहः। आस्तिक्यं संयमं शान्तिः शुचिश्च नवसंख्यकाः। जो साधक आवश्यकता मे अधिक वस्तुओं का संग्रह करता है, वह परिग्रही तथा जो ऐसा नहीं करता वह अपरिग्रही कहलाता है। जैन धर्म के अनुसार मोह का परित्याग कर देना ही अपरिग्रह है। विषय वस्तुओं को अस्वीकार कर देना भी अपरिग्रह की श्रेणी में माना जाता है। महर्षि व्यास का कथन है कि विषयों में विविध दोष दर्शन कर, उन्हें ग्रहण न करना अपरिग्रह है- विषयाणामर्जनरक्षण- क्षयसंगहिंसादोषदर्शनादस्वीकरणमपरिग्रहः (सां०यो०द०व्या०भा०)। महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि अपरिग्रह स्थिर हो जाने पर साधक को जन्म-जन्मान्तरों के विषय में सम्पूर्ण ज्ञान हो जाता है- अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्ता-सम्बोधः (यो०द० २.३९)। समाज में अपरिग्रह धर्म का पालन करना सभी के लिए आवश्यक है। इस व्रत का समुचित रूप से पालन न होने से समाज में असमानता दिखाई देती है। यदि समाज के व्यक्ति अपनी आवश्यकता से अधिक धन-साधन अपने पास न रखें (अपरिग्रही बनें), तो उससे अनेक अभावग्रस्तों की पूर्ति हो सकती है और सम्पूर्ण समाज सुखी- समुन्नत बन सकता है। २३. अपान - पाँचों प्राणों में से यह एक है। वेदान्तसार के अनुसार ये प्राणादिवायु निम्नलिखित है- प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान- वायवः प्राणापानव्यानोदानसमानाः (वे०सा०, खण्ड १३)। ऊर्ध्वगमनशील नासाग्रवर्ती वायु को प्राण कहा जाता है। अपान मलादि का निःसरण करके जीवन प्रदान करता है, जैसा कि हलायुध कोश में कहा गया है- 'अपानयति मलादिनिःसारणेन जीवयति।' अपान वायु की अवस्थिति गुदा और उपस्थ में होती है। नाभि से नीचे की ओर जाना इसका स्वभाव है। अतः इसे अधोगमनशील कहा गया है। योग दर्शन के अनुसार मूत्र, पुरीष (मल), गर्भादि के बहिर्निःसरण को प्रक्रिया जिसके द्वारा सम्पन्न होती है, उसे अपान कहा जाता है (यो०सू० ३.३९)। योगी लोग मलद्वार से जल को ऊपर खींचकर आँतों का शोधन कर लेते हैं, इसी से इसका नाम अपान है। इस प्रक्रिया के लिए आधुनिक योगियों में श्री देवरहा बाबा विशेष ख्याति-सिद्ध थे। २४. अमनस्क स्थिति - योग को विभिन्न स्थितियों में एक उन्मनी अवस्था या उन्मनी भाव का भी वर्णन मिलता है। मण्डल ब्राह्मणोपनिषद् में उल्लेख है कि साधक जब ब्रह्म से एकाकार हो जाता है, तब उन्मनी अवस्था प्राप्त होती है। उन्मनी अवस्था अर्थात् तत्त्वज्ञान पूर्ण स्थिति-उन्मनी नाम तत्त्वज्ञानम् (मं०ब्रा०उ० २.२.४ टीका)। उन्मनी अवस्था के द्वारा मनरहित स्थिति हो जाती है, जिसे अमनस्क स्थिति कहते हैं- उन्मन्या अमनस्कं भवति (मं०ब्रा०उ० २.२.४) अर्थात् मन संकल्प-विकल्प से रहित हो जाता है। मन का प्रमुख कार्य इच्छा करना, संकल्प-विकल्प करना है; किन्तु अमनस्क स्थिति में साधक इन से रहित हो जाता है। संस्कृत के प्रख्यात कोश ग्रन्थ वाचस्पत्यम् में उल्लेख है- नास्ति कार्यक्षमं मनो यस्य। ........मनोवृत्तिहीने योगिनि च। सर्वथा मनःशून्य (वाच०पृ० ३१८)। इस अमनस्क स्थिति वाले साधक के लिए स्थूल पूजा-उपचार का कोई महत्त्व नहीं रहता, फिर तो निश्चिन्त (चिन्ता रहित) अवस्था ही उसका ध्यान है, सर्वकर्म निराकरण ही आवाहन है, निश्चयात्मक ज्ञान ही आसन है, उन्मनी भाव ही पाद्य है, अमनस्क स्थिति अर्घ्य है, सदैव दीप्ति और अमृतवृत्ति ही स्नान है, सबमें ब्रह्म भावना ही गन्ध है, दर्शन के स्वरूप में स्थित होना ही अक्षत है। ............मौन ही स्तुति है तथा सभी प्रकार से हर स्थिति में सन्तोष ही विसर्जन है- तस्य निश्चिन्ता ध्यानम्। सर्वकर्मनिराकरणमावाहनम् .....सर्वसंतोषो विसर्जनमिति ... (मं०ब्रा०उ० २.२.५)। इस प्रकार ब्रह्म-अनुसन्धान करने वाला साधक ब्रह्मरूप ही हो जाता है। २५. अमरोली मुद्रा - द्र०-मुद्रा। २६. अमानित्वगुण - अनेक सद्गुणों में अमानित्व गुण का बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसे एक प्रकार से लज्जाशीलता का गुण भी कह सकते हैं। निरहंकारिता या दम्भ शून्यता भी अमानित्व है। वाचस्पत्यम् पृ० ३२१ में उल्लेख है- अभिमानशून्ये "अमानित्वमदम्भित्वम्" गीता। निरहंकारी या अमानित्व गुण सम्पन्न व्यक्ति सबके हृदय में अपना