भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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अवधारणा ३५० परिशिष्ट

स्थान बना लेता है तथा कठोर से कठोर व्यक्ति से वह अपना कार्य अपनी विनम्रता द्वारा सम्पन्न करा लेता है। इस गुण का कोई मूल्य नहीं; किन्तु इससे सब कुछ क्रय किया जा सकता है। यह संत वचन है कि शालीनता बिना मोल मिलती है; किन्तु उससे सब कुछ खरीदा जा सकता है। सामान्य स्थिति में जहाँ अपनी थोड़ी सी निन्दा सुनकर व्यक्ति उत्तेजित हो जाते हैं, वहीं अमानित्व सम्पन्न व्यक्ति उसे (निन्दक को) अपनी साधना में सहायक मानते हुए उसका उपकार मानते हैं। एक सूफी संत ने लिखा है- 'निन्दक नियरे राखिये आँगन कुटी छवाय, बिन पानी साबुन बिना निर्मल करे सुभाय।' संन्यासी व्यक्ति को मान-अपमान से अलग रहना चाहिए। नारद परिव्राजकोपनिषद् के अनुसार दूसरों के द्वारा प्राप्त आदर साधक के तप-उपार्जन में बाधक है एवं दूसरों के द्वारा किया गया अपमान उसके तप-उपार्जन में सहायक है। इसी तथ्य की पुष्टि करते हुए संन्यासी के गुणों के सन्दर्भ में उपनिषद्कार ने लिखा है- न सुखं न दुःखं न निद्रा न मानापमाने च षडूर्मिवर्जितः, निन्दाहंकारमत्सरग-र्वादम्भेभ्यां.... निन्दास्तुतिर्यादृच्छिको भवेत् (ना०परि० ३.९०)। २७. अवधारणा- अवधारणा शब्द का उपयोग प्रायः किसी विषय में मन में उत्पन्न कल्पना, धारणा या विचार के उदय होने, बनने या स्थिर होने के सन्दर्भ में किया जाता है। कुछ कोश ग्रन्थों में इसका अर्थ किसी तथ्य के सम्बन्ध में निश्चय, पुष्टिकरण, (विषय की) सीमा निश्चित करना आदि किया गया है। संस्कृत हिन्दी कोश में इसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार निर्दिष्ट है — अवधारणा-अव+धृ+णिच्+ल्युट्, जिसके उपर्युक्त कई अर्थ बताये गये हैं। उपनिषदों में अन्तःकरण चतुष्टय के नियमों के सन्दर्भ में अवधारणा का उल्लेख हुआ है। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार ये अन्तःकरण चतुष्टय के अन्तर्गत आते हैं। शारीरकोपनिषद् में सङ्कल्प-विकल्प को मन का विषय, अध्यवसाय (निश्चित होने की प्रक्रिया) को बुद्धि का विषय, अभिमान को अहंकार का विषय तथा अवधारणा (किसी विषय का तथ्य निश्चित हो जाने) को चित्त का विषय कहा गया है- मनोबुद्धिरहंकारश्चित्तमित्यन्तःकरणचतुष्टयम्। तेषां क्रमेण संकल्पविकल्पाध्यवसा- याभिमानावधारणास्वरूपाश्चैते विषयाः (शारीरको० ४)। इसी उपनिषद् में मन का स्थान गलान्त (गले का अन्तिम भाग), बुद्धि का स्थान मुख, अहंकार का हृदय तथा चित्त का स्थान नाभि कहा गया है- मनः स्थानं गलान्तं बुद्धेर्वद- नमहंकारस्य हृदयं चित्तस्य नाभिरिति (शारीरको० ४)। २८. अवधूत- सनातन धर्म के अनुसार चार आश्रम माने जाते हैं, जिनमें जीवनावधि को चार भागों में विभक्त कर दिया गया है। ये हैं- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। इनमें अन्तिम आश्रम संन्यास है। इसे प्रव्रज्या आश्रम भी कहते हैं, क्योंकि इसमें परिव्राजक (संन्यासी) लोकमंगल और आत्म कल्याण के निमित्त निरन्तर परि+व्रज्या (परिभ्रमण) करता रहता है। संन्यासी व्यक्ति उसे कहते हैं, जिसने अपनी समस्त इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करके संसार के समस्त आकर्षणों का परित्याग कर दिया हो, साथ ही वह एक मात्र मोक्ष के उपाय में लगा हो। संन्यास आश्रम में प्रविष्ट होने वाले के लिए पञ्चमात्राएँ धारण करने का निर्देश दिया गया है- अथाश्रमं चरमं संप्रविश्य यथोपपत्तिं पञ्चमात्रां दधानः (शाट्यायनी० ६)। त्रिदण्ड, उपवीत, वस्त्र-कौपीन (उत्तरीय-लंगोटी), शिक्य (छींका) और पवित्रि ये ही स्थितिभेद से संन्यासियों के लिए निर्धारित पञ्चमात्राएँ कहलाती हैं। इन्हें स्थिति के अनुरूप यथा-शास्त्र-निर्देश यति को आजीवन धारण करना चाहिए-त्रिदण्डमुपवीतं च वासः कौपीनवेष्टनम्। शिक्यं पवित्रमित्येतद्विभृयाद्यावदायुषम् (शाट्यायनी० ७)। यति की इन पंचमात्राओं को ब्रह्म (ॐकार) में समाहित माना गया है- पञ्चैतास्तु यतेर्मात्रास्ता मात्रा ब्रह्मण्ये श्रुताः (शाट्यायनी० ८)। संन्यासोपनिषद् में संन्यासियों के छः प्रकार वर्णित हैं- कुटीचक, बहूदक, हंस, परमहंस, तुरीयातीत और अवधूत-संन्यासः षड्विधो भवति कुटीचकबहूदकहंसपरमहंसतुरीयातीतावधूताश्चेति (संन्यासो० २.२३)। अवधूत संन्यास की सर्वोच्च श्रेणी है। अवधूतोपनिषद् के मन्त्र २ में अवधूत को इन शब्दों में परिभाषित किया गया है- अक्षरत्वाद्धरेण्यत्वाद्वधूतसंसारबन्धनात्। तत्त्वमस्यादिलक्ष्यत्वादवधूत इतीर्यते अर्थात् जो अक्षर (अविनाशी), वरेण्य (श्रेष्ठ) तथा संसार के बन्धन से मुक्त हो गया हो, साथ ही तत्त्वमसि आदि महावाक्यों के लक्ष्य का अर्थरूप हो उसे अवधूत कहते हैं। इसी प्रकार संन्यासोपनिषद् में अवधूत की स्थिति का विवेचन करते हुए उपनिषद्कार ने लिखा है कि अवधूत अनियम वाला होता है (अर्थात् उसके लिए जप, यज्ञादि का कोई नियम अनिवार्य नहीं है)। वह पतित और निन्दित व्यक्ति के अतिरिक्त सभी वर्णों में अजगर वृत्ति (जो कुछ अपने आप प्राप्त हो जाए) से भोजन ग्रहण करता है। अवधूत सतत आत्मानुसंधान में निरत रहता हुआ पर्वत, वृक्ष, घास, तृणादि जड़ पदार्थों से अपने को पृथक् मानता है कि